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मौत का डेंजर जोन:महिलाओं के लिए देश में महज 50 हजार स्त्री रोग विशेषज्ञ, हर 3 में से 1 ही उठा पा रहीं स्वास्थ्य सुविधाएं

नई दिल्ली10 दिन पहलेलेखक: पारुल रांझा
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भगवान के बाद धरती पर अगर किसी को भगवान का दर्जा दिया जाता है, तो वे हैं डॉक्टर। लेकिन हाल ही में ब्रिटेन में किए गए एक शोध मुताबिक, जिन महिलाओं का ऑपरेशन पुरुष सर्जन करते हैं, उनके मरने, जटिलताओं का अनुभव करने और अस्पताल में भर्ती होने की संभावना ज्यादा होती है। मेडिकल जर्नल जामा सर्जरी में प्रकाशित रिपोर्ट की मानें तो 1.3 मिलियन मरीजों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जब एक महिला के बजाय एक पुरुष डॉक्टर सर्जरी करता है, तो महिलाओं का 32% अधिक जान जाने का जोखिम होता है। ये दावा कितना सच है और भारत में स्थिति क्या है? इन सब सवालों का जवाब टटोलती दैनिक भास्कर वुमन टीम की रिपोर्ट...

स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी महिलाओं की मौत की एक वजह
फेडरेशन ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज इंडिया FOGSI के सदस्य डॉ. अल्पेश गांधी बताते हैं कि जब बात महिलाओं की सर्जरी और हेल्थ की आती है तो ये सब समय से मिलने वाली सुविधाओं पर निर्भर करता है। क्योंकि, देश में मेल या फीमेल डॉक्टर एक मुद्दा कभी नहीं रहा है। इन्हें जेंडर के आधार पर नहीं बांटा जा सकता। ये दोनों ही स्किल्स के आधार अपना काम करने में सक्षम हैं।

देश में महिलाओं की मौत की वजह कई हैं। इसमें सुविधाओं के साथ ही समय से पहले अस्पताल न पहुंच पाना, जन्मजात बीमारियों का समुचित इलाज न होना, संक्रमण, हार्ट और ब्रेन संबंधी बीमारियों की वजह से भी शामिल है। ज्यादातर सुविधा संपन्न लोग निजी अस्पतालों को तरजीह देते हैं। लेकिन, ग्रामीण इलाकों में जब किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ जाती है तो उनके पास अस्पताल तक पहुंचने के पर्याप्त संसाधन नहीं होते हैं। ऐसे में ट्रांसपोर्टेशन, इन्फ्रास्ट्रक्चर, पैसों की कमी, हेल्थ एजुकेशन सहित तमाम चीजें शामिल हैं।

न्यूट्रिशन की कमी के कारण महिलाओं को कई हेल्थ प्रॉब्लम्स से जूझना पड़ता है।
न्यूट्रिशन की कमी के कारण महिलाओं को कई हेल्थ प्रॉब्लम्स से जूझना पड़ता है।

अपने स्वास्थ्य को लेकर स्वयं सजग रहने की जरूरत
डॉ. अल्पेश गांधी बताते हैं कि स्वस्थ समाज के लिए महिलाओं का स्वस्थ व शिक्षित होना बेहद जरूरी है, क्योंकि उन पर दो परिवारों की जिम्मेदारी होती है। युवतियां और महिलाएं अपनी हेल्थ को लेकर पूरी तरह से स्वस्थ रहें, इसके लिए उनको स्वयं सजग रहना होगा।

आज के समय में भी ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अपनी हेल्थ को पीछे रखती हैं। न्यूट्रिशन की कमी के कारण उन्हें कई हेल्थ प्रॉब्लम्स से जूझना पड़ता है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि वे अपने हक और अधिकारों के साथ स्वास्थ्य को लेकर भी जागरूक रहें। स्वास्थ्य के प्रति दूसरों को भी जागरूक करें।

महिलाओं के लिए देश में करीब 50 हजार स्त्री रोग विशेषज्ञ
डॉ. अल्पेश गांधी बताते हैं कि वर्तमान में करीब 38 हजार ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल FOGSI से जुड़ें हैं। वहीं, कुल मिलाकर, देश में करीब 50 हजार गायनेकोलॉजिस्ट हैं। अनुमान के मुताबिक इनमें 75% फीमेल और 30% मेल ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल हैं। देश में 1,300 की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए।

सबसे पहले यह भी समझने की जरूरत है कि क्षेत्र में प्रशिक्षित सभी विशेषज्ञ दोनों तरह के काम नहीं करते हैं, कुछ केवल प्रसूति से जुड़े हैं और कुछ केवल स्त्री रोग विशेषज्ञ होते हैं। अब नए मेडिकल कॉलेज की संख्या बढ़ रही है। इससे चिकित्सकों की कमी के साथ मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी भी दूर हो रही है।

'सर्जिकल कॉप्लिकेशन' मरीज की स्थिति पर निर्भर, न कि जेंडर पर
जयपुर के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल के डायरेक्टर लेप्रोस्कोपिक सर्जरी व स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सीपी दधीच बताते हैं कि पुरुष डॉक्टरों द्वारा ऑपरेशन के दौरान महिलाओं की ज्यादा जोखिम होता है, इस बात पर टिप्पणी करना व्यर्थ है। क्योंकि सर्जिकल कॉप्लिकेशन किसी भी प्रकार से पुरुष या महिला डॉक्टर होने से जुड़े हैं। स्किल के आधार पर फीमेल डॉक्टर्स और मेल डॉक्टर्स, दोनों ही बराबर होते हैं। किसी तरह की सर्जिकल कॉप्लिकेशन मरीज की स्थिति, उसकी गंभीरता, उसकी बिमारी पर ज्यादा निर्भर करते हैं। बजाय चिकित्सक के मेल या फीमेल होने पर।

वहीं, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल की स्त्री रोग एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ शालू कक्कड़ बताती हैं कि आज की नई पीढ़ी अपने खान पान का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखती है। इसके कारण उनके शरीर में खून की कमी हो जाती है। शादी के बाद गर्भावस्था के दौरान उन्हें अनेक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हो जाती हैं। इसलिए अवेयरनेस की जरूरत है।

वर्तमान में देश के करीब 38 हजार ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल FOGSI से जुड़ें हैं।
वर्तमान में देश के करीब 38 हजार ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल FOGSI से जुड़ें हैं।

देश में करीब 13 लाख डॉक्टर्स
देश में इस वक्त 12 लाख 89 हजार रजिस्टर्ड डॉक्टर्स हैं। पेशे में जुटे हुए डॉक्टर्स की संख्या 10 लाख 31 हजार है यानी कुल रजिस्टर्ड डॉक्टर्स का केवल 80% है। कोरोना की दूसरी लहर में भी कई डॉक्टर्स अपनी जान गंवा चुके हैं।

सिर्फ 33% महिलाओं को ही मिल पाती हैं स्वास्थ्य सेवाएं
जेएनयू और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस की रिसर्च में सामने आया है कि भारत में पुरुषों के लिए इनपेशेंट खर्च लगभग 24 हजार रुपये है, जबकि महिलाओं के लिए सिर्फ 16 हजार रुपये। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को अस्पताल में भर्ती करने पर बहुत कम खर्च किया जाता है।

वहीं, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अनुसार एम्स में इलाज कराने आए 23,77,028 मरीजों के रिकॉर्ड का अध्ययन किया, जिसमें ये बात सामने आई कि सिर्फ 33% महिलाओं को ही स्वास्थ्य सेवा मिल पाती है।

मासूमों की पुकार- मां को मौत के मुंह में जाने से बचा लो
दिल्ली-एनसीआर में समाज कल्याण संस्था की अध्यक्ष श्वेता त्यागी बताती हैं, कि देश में हर साल हजारों महिलाएं डिलीवरी के दौरान दम तोड़ देती हैं। सैकड़ों मासूमों की पुकार है कि उनकी मां को मौत के मुंह में जाने से बचा लो। इसकी सबसे बड़ी वजह स्वास्थ्य केंद्र में सुविधाओं की कमी है। इलाज के दौरान काम आने वाली दवाओं की कमी बनी रहती है। विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं मिलते।

वह बताती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों में वर्षों पुराने उपकरण इलाज के काम में लिए जाते है। कई बार स्टाफ के रूखे व्यवहार की शिकायत है। कई बार आउटडोर रहने पर जब प्रसूता की तबीयत बिगड़ती है तो डॉक्टर को ऑन कॉल बुलाया जाता है। इस प्रोसेस में काफी समय लग जाता है। ग्रामीण क्षेत्र के स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। इसलिए इलाज के दौरान महिला की स्थिति बिगड़ जाती है। इसके अलावा सीएचसी और पीएचसी में लेबर रूम में गंदगी से संक्रमण का खतरा रहता है। वहां खतरनाक बैक्टीरिया मौजूद रहता है।

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