वुमन एंटरप्रेन्योर की कठिन राह:किसी को लोन लेने में दिक्कत, तो किसी के ट्रैवल न कर पाने से कई प्रोजेक्ट्स हाथ से निकले

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: पारुल रांझा
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सुनीता देवी दिल्ली के एक व्यस्त इलाके की पतली सी गली में रहती हैं। वह हर सुबह 4 बजे उठकर घर का काम निपटाकर अपने सिलाई सेंटर पर पहुंच जाती हैं। सुनीता पिछले पांच सालों से अपना सेंटर चला रही हैं। लेकिन उन्हें केवल कपड़े सिलकर फैमिली की इनकम में योगदान करने वाली महिला भर समझा जाता है, उद्यमी नहीं माना जाता।

सुनीता को अपने कारोबार की पैनी समझ है। सारे बिजनेस ऑर्डर अपने पुराने फोन पर ही लेती हैं। कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन में उन्हें मजबूरन सिलाई सेंटर से कई महिलाओं को हटाना पड़ा। वह अब अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए लोन लेना चाहती हैं, ताकि फिर से सब पटरी पर आ सके। लेकिन कई चुनौतियां हैं, जिनसे निपटना आसान नहीं। ये कहानी सिर्फ 48 साल की सुनीता की नहीं, बल्कि कम आय वर्ग की कई महिला उद्यमियों की है।

आईवेज की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 100 एंटरप्रेन्योर्स में सिर्फ 7 महिलाएं हैं। यही वजह है कि ग्लोबल लेवल पर बिजनेस में जेंडर गैप वाले देशों में भारत का तीसरा स्थान है। यहां शुरुआती फेज के एंटरप्रेन्योर्स में सिर्फ 33% महिलाएं हैं। वहीं, फीमेल एंटरप्रेन्योरशिप इंडेक्स में 77 देशों में भारत का स्थान 70वां है।

बिजनेस में फीमेल की कम भागीदारी की वजह जानने के लिए दैनिक भास्कर की वुमन टीम ने ऐसी महिलाओं से बात की, जो अपने जुनून और जज्बे से कारोबारी दुनिया में पैठ बनाए हुए हैं।

नौकरी छोड़ शुरू किया बिजनेस
उत्तर प्रदेश की निधि अरोड़ा और निहारिका मेहरा हैंडीक्राफ्ट साड़ियों का कारोबार करती हैं। इन्होंने अपने इस नए ब्रांड का नाम तिलोरी रखा है। उनके पास चंदेरी, अजरक प्रिंट, बनारसी, चिकनकारी, कोसा सिल्क सहित दर्जनों वैराइटी की साड़ियों का कलेक्शन है। देशभर के करीब 50 बुनकर उनसे जुड़े हैं।

बुनकर फैमिली से कोई ताल्लुक न होने के बावजूद करीब 5 वर्ष पहले निधि और निहारिका ने तय किया कि उन्हें कुछ नया करना है। लिहाजा, प्राइवेट कंपनी से नौकरी छोड़ने के बाद दोनों ने मिलकर 6-7 बुनकरों के साथ एक स्टार्टअप की शुरुआत की। आज इनकी डिजाइन की साड़ियां टीवी शो में कई एक्ट्रेसेस पहनती हैं।

यूपी की निधि अरोड़ा और निहारिका मेहरा का हैंडीक्राफ्ट साड़ियों का बिजनेस है।
यूपी की निधि अरोड़ा और निहारिका मेहरा का हैंडीक्राफ्ट साड़ियों का बिजनेस है।

ट्रैवल न कर पाने के चलते कई प्रोजेक्ट्स हाथ से निकल गए...
निहारिका मेहरा बताती हैं, महिला होना और बिजनेस करना.. ये अपने आप में बड़ी बात है। कई लोग अब भी सोचते हैं कि महिलाओं को सिर्फ घर संभालना चाहिए। मुझे भी बिजनेस के शुरुआती दौर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बिजनेस ट्रैवल न कर पाने की वजह से कई प्रोजेक्ट लटक गए या हाथ से निकल गए। फिर भी मैं कारोबार को सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचाने में जुटी रही। घर में देर रात तक कॉल अटैंड करना और फिर हर चीज मैनेज करने में पहले थोड़ी परेशानी हुई।

निहारिका मेहरा ने बताया कि वेस्टर्न फैशन की चकाचौंध के आगे जब हैंडीक्राफ्ट साड़ियां गुमनामी में कहीं खोने लगीं, तब भी न तो मेरा विश्वास डगमगाया और न कभी अपने बिजनेस से किनारा करने की सोची। जब हमारे पास ठीक-ठाक ऑर्डर्स आने लगे तो देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले बुनकरों को भी अपने काम से जोड़ा।

महिलाओं पर होता है दोहरा कार्यभार

निधि अरोड़ा कहती हैं, 'मुझे लगता है जिस तरह मां बनना एक चुनौतीपूर्ण काम है, उसी तरह बिजनेस को आगे बढ़ाना भी कठिन काम है। एक बिजनेसवुमन को कारोबार संभालने के अलावा पारिवारिक दायित्वों को भी पूरा करना पड़ता है। इसकी वजह से ज्यादातर महिलाएं बिजनेस पर पूरा ध्यान या समय नहीं दे पातीं, क्योंकि उन पर दोहरा कार्यभार होता है। वहीं, पुरुष प्रधान कार्यों में जाने से महिलाएं हिचकिचाती है।'

हर तरफ सवाल उठ रहे थे, तुम्हें बिजनेस का जोखिम उठाने की क्या जरूरत है?
बिहार के समस्तीपुर जिला की किरण कुमारी अपने हुनर के दम पर बांस से तरह-तरह के प्रोडक्ट्स बनाने की हस्तकला को न केवल आगे बढ़ा रही हैं, बल्कि दुनियाभर में नई पहचान देने की कोशिश में भी जुटी हैं। वह बांस से होम डेकोरेशन के लिए लैंप, पेन स्टैंड, गुलदस्ता, बैग, फाइल, ट्रे, टाइटेनिक जहाज, ताजमहल बनाती हैं। बिहार के मुख्यमंत्री भी उनकी कारीगरी की सराहना कर चुके हैं।

वह कहती हैं, 'मेरे लिए घर और बिजनेस एक साथ संभालना आसान नहीं है। शादी होने के बाद पत्नी और बहु का धर्म निभाने के साथ-साथ बिजनेस शुरू करना काफी कठिन था। मुझे सब्सिडी और आर्थिक प्रोत्साहन के रूप में मिलने वाले बिजनेस लोन की योजनाओं के बारे में पता नहीं था। हर तरफ सवाल उठ रहे थे कि तुम्हें बिजनेस का जोखिम उठाने की क्या जरूरत है? महिलाएं घर संभालने को बनी हैं, बिजनेस नहीं। लेकिन मैंने ठान लिया था कि कोई कुछ भी कहे पर मेरे लिए किसी काम को शुरू करने का जुनून काफी है।'

बिहार की किरण कुमारी अपने हुनर के दम पर बांस के प्रोडक्ट्स बनाकर दुनियाभर में नई पहचान बनाने में जुटी हैं।
बिहार की किरण कुमारी अपने हुनर के दम पर बांस के प्रोडक्ट्स बनाकर दुनियाभर में नई पहचान बनाने में जुटी हैं।

अविवाहित महिलाओं या लड़कियों को लोन देने में झिझकते हैं बैंक
किरण कहती हैं, 'मैं उस समय घर से बाहर निकली, जब महिलाओं को किसी भी क्षेत्र में काम करने पर अनकही पाबंदी थी। फिर एक बार जब लोगों को मुझ पर भरोसा हो गया, तो सभी का सपोर्ट मिलने लगा। कोरोना महामारी के कारण मेरा कारोबार रुक गया और महिलाओं को काम पर रखना मुश्किल हो गया। लेकिन अब मैं वित्तीय संसाधनों का सही इस्तेमाल करना समझ गई हूं। लेकिन आज भी अविवाहित महिलाओं या लड़कियों को फाइनेंशियल हेल्प या लोन देने में बैंक झिझकते हैं। उन्हें डर रहता है कि इसे कौन चुकाएगा। ऐसे में लोगों को नजरिया बदलने की जरूरत है।'

अपना बिजनेस शुरू करना चाहती हैं 75% महिलाएं
बॉबल एआई के शोध की मानें तो देश में 75% महिलाएं अब अपना कारोबार शुरू कर अपने पैरों पर खड़े होना चाहती हैं। 55% से अधिक महिलाएं अब अपनी सेहत, फिटनेस पर ध्यान दे रही हैं। कोविड-19 के कारण बहुत सी भारतीय महिलाओं को अपना व्यवसाय बीच में छोड़ना पड़ा। फिर भी तमाम मुश्किलों के बावजूद उनके हौसले बुलंद हैं।

सेंटर ऑफ एंटरप्रिन्योरशिप के एक शोध के अनुसार महिलाएं पुरुषों से बेहतर उद्यमी होती हैं। इतना ही नहीं नया ब्रांड बनाने और उसे सक्सेसफुली चलाने में भी वे पुरुषों से आगे हैं। महिलाएं मैदान छोड़कर भागने की बजाय डेवलपमेंट की दिशा में काम करती हैं। सर्वे में करीब 73% पुरुषों की तुलना में 87% महिलाओं ने कहा कि वे बिजनेस के लिए वित्तीय जोखिम उठाने को तैयार हैं।

महिला उद्यमी: साल 2025 तक जीडीपी में कर सकती हैं 18% का योगदान
कंसल्टेंसी फर्म मैकिंसे की हाल ही में जारी रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से साल 2015 तक देश की जीडीपी में 57,281 अरब रुपये यानी कि 18% की वृद्धि हो सकती है। महिलाओं के लिए काम करने वाली संस्था 'शी द पीपल्स' की संस्थापक शैली चोपड़ा कहती हैं, 'भारतीय महिलाएं देश की आधी और दुनिया की 10% आबादी हैं। कोरोना महामारी के बाद महिलाओं ने डिजिटल प्लेटफार्म का उपयोग कर स्टार्टअप और व्यवसाय शुरू करने में रुचि ली है।

ऐसे में सरकार को कार्यबल में महिलाओं की संख्या बढ़ाने पर जोर देना होगा। इसके लिए जरूरी है कि महिला उद्यमियों की मदद की जाए। निजी क्षेत्र में भेदभाव दूर करने वाली नीतियां लागू हों। महिलाओं के पक्ष में कानूनी प्रावधान और उनका पालन सख्त किया जाए। ऑफिस और समाज में महिलाओं की भूमिका के प्रति नजरिया बदलें।

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