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मुंह खोलने का टाइम आ गया:रेप के बाद शरीर से घिन होने लगी, कांच के गिलास तोड़कर मैं हाथों-पैरों में घाव करती, बाल काट लेती

एक वर्ष पहलेलेखक: मीना
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ये नया भारत है और नए दौर की लड़कियां हैं। जो किसी भी ज्यादती को छिपाती या सहती नहीं। कभी रेप को दुनिया इज्जत गंवाने से जोड़ती थी। आज की लड़कियों ने समझ लिया है कि इज्जत उसकी जाती है, जो रेप करता है। इसलिए ये खुलकर सामने आ रही हैं और अपने साथ हुई दरिंदगी की कहानी साझा कर रही हैं। ताकि, ऐसे हैवानों को मुंह छिपाने को जगह न मिल सके और इन पर खुलकर बात हो सके। ऐसी ही दो बहादुर बेटियों ने वुमन भास्कर के साथ अपनी कहानी शेयर की है।
पहली कहानी: 4 साल की थी, तभी रिश्तेदार ने किया था सेक्सुअल असॉल्ट, फिर तो ये सिलसिला चलता ही गया
‘मैं 4 साल की थी तब मेरे रिश्तेदार ने ही मेरे साथ सेक्सुअल असॉल्ट किया। 8 साल की हुई तब अपार्टमेंट के केयरटेकर ने मेरे साथ छेड़छाड़ की। 14 साल की हुई तब मुझसे बड़ी उम्र का लड़का मेरा ब्वॉयफ्रेंड बन गया। उसके साथ जो संबंध बनते, वे जोर जबरदस्ती के होते। मैं उसका कहा इसलिए मानती क्योंकि वह उम्र में बड़ा था और मुझे डर लगता था कि अगर मैंने इसकी किसी बात को मना किया तो ये मुझे मार डालेगा।

इस आपबीती को आगे पढ़ने से पहले अपनी राय भी हमें बताते चलिए

बड़े होने पर मुझे समझ आया कि वो लड़का जो मेरा ब्वॉयफ्रेंड था और जोर जबरदस्ती के साथ जो कुछ भी मेरे साथ करता था उसे रेप कहा जाता है। इस तरह ढाई साल मैंने रेप झेला। मैंने बचपन से जो कुछ झेला उसके बारे में मुझसे बात करने वाला कोई नहीं था। एक बार एक आंटी को बताया भी तो वे मुझ पर ऐसे हंसीं जैसे मैं उन्हें किसी कॉमेडी फिल्म का कोई सीन सुना रही हूं। पेरेंट्स को इसलिए कुछ नहीं बता पाई क्योंकि मैं खुद उनकी गोद ली हुई बेटी हूं। पेरेंट्स कुछ वक्त के लिए एक-दूसरे से अलग रहने लगे तो रिश्तेदारों ने उनके अलग होने के लिए मुझे ही जिम्मेदार ठहराया। इस डर से मैं मम्मी-पापा को कुछ नहीं बताती थी कि कहीं उनके बीच झगड़ा न हो। मैं डरती थी कि अगर मैं झगड़े की वजह से बनी तो वे फिर कभी साथ नहीं रहेंगे। और मैं दोनों का साथ चाहती थी।

मैं बचपन से गोलू-मोलू सी रही। बाल लंबे थे। इसलिए अक्सर लोग मुझे छूकर कहते- ‘कितनी क्यूट है।’ बचपन से अपने साथ छेड़छाड़, रेप जैसी वारदातें देखकर खुद से चिढ़ होने लगी। खुद को ‘अगलीफिकेशन’ टर्म दिया। मुझे लगता मेरे साथ हर छेड़छाड़ मेरी शक्ल-सूरत की वजह से ही होती है। इसलिए अपने शरीर से इतनी नफरत होने लगी। पांच साल की उम्र में हुई छेड़छाड़ के बाद मैंने खुद को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया।
जब भी किसी तरह का सेक्शुअल अब्यूज मेरे साथ होता उसके बाद मैं कांच के गिलास को तोड़कर खुद के हाथों और पैरों पर निशान लगा देती। इस सारी छेड़छाड़ की वजह मैं खुद को मानती थी। कभी ज्योमैट्री बॉक्स से कंपस निकालकर हाथ-पैरों को खरोंचती या कभी खुद को चोट पहुंचाती।
बहुत बार सुसाइड करने की कोशिश तक कर चुकी हूं। खुद को नुकसान पहुंचाने की जैसी आदतों में और राहत ढूंढ़ती। छेड़छाड़ होने के बाद अपने बाल खुद ही कैंची से काट देती। खुद को बदसूरत बनाकर रखना मुझे अच्छा लगता।
मेरे बारे में जब मम्मी-पापा को मालूम हुआ तो पापा ने बताया कि उनके साथ भी बचपन में गलत तरीके से छेड़छाड़ हुई थी। स्कूल में सहेली ने बताया कि उसके साथ भी ऐसा हो चुका है। सबके अनुभव सुनने के बाद पेरेंट्स की मदद से मैंने 10 साल की उम्र में सेक्शुअल वायलेंस के खिलाफ मूवमेंट शुरू किया। अपने स्कूल के बच्चों से कहना शुरू किया कि आप अपने साथ होने वाली छेड़छाड़ के खिलाफ बोलें।’
ये आपबीती है 36 साल की प्रणाधिका सिन्हा देवबर्मन की। प्रणाधिका अब एक एक्टिविस्ट हैं और बचपन में बच्चों के साथ होने वाले यौन शोषण को रोकने के लिए कोलकाता में ‘वन मिलियन अगेंस्ट अब्यूज’ कैंपेन चला रही हैं। प्रणाधिका ने चेंज डॉट ओ आरजी पर पिटीशन भी डाली है। जिसमें वे मांग कर रही हैं कि स्कूलों के सिलेबस में सेक्सुअल अब्यूज को जोड़ा जाए।
दूसरी कहानी: गर्भाशय में हो गया था इंफेक्शन, मगर पति जबरन बनाते थे संबंध, दर्द से कराह उठती

शादी के बाद सेक्सुअल वायलेंस झेलने वाली प्रो. रजनी मुर्मु झारखंड के गोड्डा कॉलेज में पढ़ाती हैं। अपनी आपबीती साझा करते हुए वे कहती हैं, दूसरे बच्चे के बाद मेरे गर्भाशय में इंफेक्शन हो गया। इसके बाद भी पति की जबरदस्ती नहीं रुकी। वो अक्सर मेरे साथ जबरदस्ती संबंध बनाते और मैं दर्द से कराहती रह जाती। एक तो इंफेक्शन दूसरा बिना मंजूरी के शारीरिक संबंध बनाने से मैं एक हफ्ते तक बिस्तर से उठ नहीं पाती। चलती तो दर्द होता और बिस्तर पर औंधे मुंह पड़ जाती। पति की मर्जी के बिना घर से बाहर जाने या किसी किसी की पीड़िता मदद करने पर पति भी मुझे पीटता। घरेलू हिंसा से लेकर सेक्शुअल वायलेंस से अक्सर गुजरती। इसके बाद मैं पति से अलग रहने लगी और आज मामला कोर्ट में है।’
हर 10 में से 1 लड़की को जबरन संबंध बनाने पर किया जाता है मजबूर
छोटी बच्चियां हों, जवान लड़कियां या बुजुर्ग महिलाएं छेड़छाड़, रेप, यौन शोषण जैसी वारदातें उम्र के हर पड़ाव पर झेलती हैं। यूनिसेफ फॉर एवरी चाइल्ड के मुताबिक, 20 साल से कम उम्र की लगभग 10 में से 1 लड़की को यौन संबंध बनाने या अन्य सेक्सुअल एक्ट करने के लिए मजबूर किया जाता है। जबरदस्ती संबंध बनाने वाले 90 फीसदी अपराधी अपने जान पहचान के व्यक्ति होते हैं। यह जबरदस्ती पति या ब्वॉयफ्रेंड के अलावा रिश्तेदार भी कर सकते हैं।
क्यों नहीं बदल रही सोच?
तमाम आधुनिकता के बाद भी लड़कियों के साथ छेड़छाड़, रेप जैसे सेक्शुअल अब्यूज क्यों नहीं खत्म होते। माएं क्यों अपने बच्चों से इस मुद्दे पर बात नहीं कर पातीं और मुंह खोलते बच्चों का मुंह बंद करती हैं। इस सवाल के जवाब में दिल्ली विश्वविद्यालय में साइकोलॉजी की प्रोफेसर बिनुषा जोयसेल का कहना है कि सेक्स को लेकर हमारे समाज में आज भी चुप्पी है। पीढ़ियों से बेटियों को चुप रहना सिखाया जाता है और यह चुप्पी उनके दिमाग में रच-बस गई है। जिस वजह से वे बड़ी होने पर भी खुद के साथ हुई छेड़छाड़ पर बोल नहीं पातीं। सेक्स को एक टैबू बनाकर इसे ढका-छुपा मानकर कोने में खिसका दिया जाता है। सेक्शुअल वायलेंस जैसी घटनाएं रोज आसपास घटती देखी जाती हैं और माहौल सुधरता नहीं। वक्त आ गया है लड़कियों को अब बेहिचक और बेधड़क बोलना होगा। क्योंकि एक चुप्पी सौ दुखों को न्योता देती है।’

अब चुप्पी तोड़ने का वक्त आ गया। (Credit-Freepik)
अब चुप्पी तोड़ने का वक्त आ गया। (Credit-Freepik)

महिलाओं के दिमाग में भर दी जाती है सहनशीलता
प्रो. बिनुषा का मानना है कि भारतीय समाज में महिलाओं में सहनशीलता कूट-कूट कर भरी जाती है। सब कुछ सहने के बावजूद चुप रहना सिखाने की इस मानसिकता को हमें चुनौती देने की जरूरत है। यौन हिंसा को समाप्त करने के लिए खुलकर बात करनी जरूरी है, तभी हम बदलाव को देख पाएंगे। स्त्री का चुप्पी तोड़ना बदलाव की रोशनी का किरण बनेगा, वरना समाज का ये अंधेरा दिन पर दिन गहराता ही जाएगा।
प्रणाधिका और रजनी मुर्मु जैसी लड़कियां अब आगे बढ़कर अपने साथ होने वाले सेक्शुअल अब्यूज के खिलाफ आवाज उठाने लगी हैं, लेकिन यह स्थिति एक-दो लड़कियों के आवाज उठाने से सुधरने वाली नहीं।धीरे-धीरे परिस्थितियां बदल तो रही हैं। अब लड़कियां बिंदास बोल रही हैं, अपना टाइम आ गया, लेकिन बहनों टाइम तो आ गया पर अब हर एक को अपना मुंह खोलना होगा। चुप्पी हमारे लिए और हमारे आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरनाक हो सकती है।

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