डार्क डायरी:जब बाकी लड़कियां नींद में कुनमुनाती हैं, मैं तब भी इनकार नहीं करती

एक वर्ष पहलेलेखक: मृदुलिका झा

खुशहाल परिवार का विज्ञापन बनी कोई खूबसूरत बीवी परेशान है कि पति मुंह फेरकर सोता है।कोई रोती है कि उसकी कविता पोतड़े चमकाने में स्वाहा हो गई। घर से निकली युवती रोज सड़क, मैट्रो, बस और रिक्शा में अनचाही छुअन झेलती है। कोई लड़के की चाह में कोख को झोला बना चुकी। तो किसी ने बाढ़ या बम धमाके में सब गंवा डाला। #DarkDiary के तहत हम अलग तबके और इलाके की महिलाओं की तकलीफ जियेंगे।

इस बार की कहानी है घर-बार वाली मालती* की, बदकिस्मती ने जिसे रेड लाइट इलाके में ला बिठाया।

सबको विरासत में कुछ न कुछ मिलता है। किसी को दौलत, किसी को दुकान। कोई अपने बच्चों के लिए कर्ज का पहाड़ छोड़कर जाता है तो कोई धन्ना सेठ बनाकर। मुझे भी विरासत मिली- अकेलेपन की! पिता काफी पहले मां को छोड़कर चले गए थे। मां की खाली आंखों में अक्सर अपने लिए परेशानी देखती। वो दुआ मांगती कि मेरा शौहर मुझे खूब प्यार दे।

मां जब दुआ कर रही थी, ऊपरवाला शायद कुछ उलझा हुआ था। उसने दुआ कुबूली तो, लेकिन आधी-अधूरी।

हम चार भाई-बहन थे। मैं सबसे बड़ी। मां जब रोजी कमाने जाती, मैं घर समेत भाई-बहनों को संभालती। मां लौटते हुए सौदा लेकर आती- दो रुपये की चीनी, दस रुपए का आटा या फिर थोड़ा चावल। सब्जी के नाम पर मैंने केवल आलू ही आलू खाए थे, या किसी खास दिन बैंगन। साथ में लाल मिर्च हुआ करती। यही हमारा खाना था। लेकिन जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। पिता नहीं थे तो क्या! मां से भर-भरकर लाड़ मिला। दिनभर काम के बाद लौटी मां रात में मेरे पैरों की मालिश करने बैठ जाती। इसी वक्त वो मुझसे दिनभर का हिसाब लेती, सिर्फ अपने बारे में कभी कोई बात नहीं की।

वो इतवार की दोपहर थी, जब सौदा-सुलुफ लाने को मां ने मुझे भेजा। राशन की दुकान पहुंची तो वहां भद्दे-से कपड़ों वाला कोई लड़का खड़ा था। कपड़ों से भी ज्यादा भद्दी थी, उसकी नजर। जितनी देर मैं सामान खरीदती रही, वो मुझे घूरता और घिसी हुई आवाज में फब्तियां कसता रहा। इसके बाद तो लगभग रोज ही ऐसा होने लगा। वो घर के आसपास मंडराने लगा। सहेलियां मुझे उससे जोड़कर मजाक किया करतीं।

मैं गुस्सा करती लेकिन बिन-बाप और गरीब मां की बेटी का गुस्सा तो कपूर की डली है। हवा लगते ही फुर्र हो जाता।

एक रोज वो मेरे घर पहुंचा। कपड़े और भी ज्यादा भद्दे। इशारे और भी अश्लील। मां के हाथ में लाल कागज में लिपटी मिठाई का डिब्बा थमाते हुए सीधा कह दिया कि वो मुझसे शादी करना चाहता है। मैं सामने ही खड़ी थी। अवाक! साफ था कि उसे मेरी रजामंदी की कोई परवाह नहीं। दसियों वादे करके उसने मां को राजी कर लिया। मां मेरे लिए प्यार करने वाला शौहर चाहती थी। उसकी नजर में ये प्यार ही था कि कोई उनकी बेटी को मांगने खुद दरवाजे पर आया और मिन्नतें कर रहा है। ये पहली दफे था कि मुझसे बिना पूछे मां फैसला ले रही थी। वो भी मेरे लिए।

रात मां ने कहा- अब शायद इसका नसीब ही तेरा नसीब खोल दे! मां पहली बार मेरे सामने रो पड़ी। मैंने बिना सोचे हां कर दी।

बिना तामझाम की शादी के बाद बिदाई हुई। उसके शहर पहुंची। ये इलाका बारिश में बाढ़ के पानी से बजबजाता रहता है। शाम के धुंधलके में दृश्य बदलता है। कमउम्र लड़कियां बित्ते-बित्ते कपड़ों में घरों के सामने खड़ी रहती हैं। मैं शाम को पहुंची। माथे तक घूंघट की ओट से सब देखा, लेकिन समझ नहीं सकी। कुछ मां से अलगाव की चोट थी तो कुछ तमाम उम्र भद्दे इशारे और छुअन झेलने का डर। खैर! ये डर कुछ नहीं था। अगली सुबह का सूरज मेरे लिए नया और सबसे खौफनाक सच लाने वाला था।

मैं बेची जा चुकी थी। भद्दी नजरों से घूरते हुए ही पति उर्फ दलाल ने राज खोला- ‘नथ उतराई हो चुकी। अब तू दूसरे कस्टमर के पास जाएगी। सामान बांध ले’।

फिर तो सबकुछ बदल गया। नए घर में खिचड़ी दाढ़ी और सफाचट सिर वाले एक आदमी ने मेरा बलात्कार किया। मैं कूड़े की तरह कमरे में पड़ी रही। धूप चढ़ने पर एक औरत आई और मुझे कपड़े बदलकर कुछ खा लेने कहा। मेरे चुप रहने पर मारा-पीटा। कई दिनों तक रोज नए-नए आदमी आते। मेरे लिए अब दिन-रात का फर्क खत्म हो चुका था। माचिसनुमा उस कमरे में एक रोशनदान था और वो भी बहुत ऊंचाई पर। उसे ही देखती और दिन-रात का फर्क समझती। भूख से कुलबुलाती अंतड़ियों के साथ एक रोज मैंने हां कर दी।

अब सेक्स-वर्कर या धंधेवाली सुनना मेरे दिल में हौल नहीं उठाता। यही मेरी पहचान है।

शहर के जिस इलाके में हूं, वहां ज्यादातर घर बांस की टट्टियों से बने हैं। वहां फटी-गंधाती चादरों की ओट में उससे भी ज्यादा मैला बिस्तर बिछा होता है। यही बिस्तर मेरा दफ्तर है। यहां तक आने वाले लोग मेरे क्लाइंट। मैं उनकी हर बात पर जोर-जोर से मुंडी हिलाती हूं। कमरा भले गंधाए लेकिन खुद को सस्ते पाउडर और गाढ़ी लिपस्टिक से पोते रखती हूं।

जब बाकी लड़कियां नींद से कुनमुनाती हैं, मैं तब भी राजी रहती हूं। शराब में डूबा क्लाइंट मुझपर अपना पूरा वजन डाल खर्राटे लेने लगता है तो भी मैं उसे धक्का नहीं मारती, मुर्दा पड़ी रहती हूं। बचपन में मां से कहानी सुनी थी, उस हिरण की, जो शेर के आने पर सांसें रोककर पड़ा रहता था। किस्मत ने मुझे हमेशा के लिए वही हिरण बना दिया।

(*बिहार-नेपाल बॉर्डर पर बसे कस्बे की इस युवती की पहचान छिपाई गई है। कहानी एक इंटरनेशनल एनजीओ- अपने आप वीमेन वर्ल्डवाइड की मदद से की गई।)

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