बदनाम गलियों में शायद ही कोई गंगूबाई:रेड लाइट एरिया में कोई लीडर नहीं होती, बदतमीज ग्राहकों को खुद धो देती हैं लड़कियां

9 महीने पहलेलेखक: मीना
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100 करोड़ से ऊपर की कमाई कर चुकी फिल्म गंगूबाई अपनी रिलीज के दो हफ्ते बाद भी सिनेमा घरों में अपना परचम लहरा रही है। फिल्म में गंगूबाई की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री आलिया भट्ट वेश्या होने के साथ-साथ समाज सेविका बन वेश्यावृत्ति में लिप्त लड़कियों-महिलाओं की मसीहा भी नजर आती हैं।

वह मुंबई के रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा की रानी है। फिल्म के अंत में गंगा (आलिया भट्ट) को कमाठीपुरा की रानी के तौर पर पेश किया जाता है। फिल्म में वेश्यालयों, वेश्याओं और वेश्यावृत्ति को जितनी रंगीनियत और हक से चुना हुआ पेशा दिखाया गया है, इसी की सच्चाई दैनिक भास्कर ने जाननी चाही और हम चल पड़े दिल्ली के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया जीबी रोड की ओर।

वहां की दोपहरी, जहां आम चहल-पहल वाली दिल्ली भी अलसाई होती है। ऐसे में कोठा नंबर 64 में चहल पहल है। वो सीढ़ियां जो गिनती में जरूरत से ज्यादा हैं और ऊंचाई में भी जरूरत से ज्यादा ऊंची हैं, उनसे गुजरते हुए दूसरी मंजिल पर हम पहुंचते हैं। हर कोठे से महिलाएं-लड़कियां हमें ऐसे झांक कर देखती हैं जैसे ग्राहक नहीं कोई उनके धंधे में सेंध लगाने आया हो।

यहां कोई लीडर नहीं है…
शनिवार (छुट्टी का दिन) होने की वजह से दिन में भी ग्राहकों की भीड़ है। सेकेंड फ्लोर पर पहुंचकर जब पूछा कि क्या यहां ऐसी महिला है जो आप सभी की लीडर है? कोई जवाब दे, इससे पहले 60 साल की उम्र की एक महिला दरवाजे से झांकी और गुस्से में तमतमा कर बोली- ‘बताओ क्या काम है? यहां कोई लीडर-वीडर नहीं है। हम सभी खुद की मालकिन हैं। तुम्हें क्या जानना है और क्यों जानना है?’

दिल्ली का जीबी रोड रेड लाइट एरिया के नाम से जाना जाता है। यहां महिलाएं किसी मजबूरी में आती हैं और फिर यहीं की बनकर रह जाती हैं।
दिल्ली का जीबी रोड रेड लाइट एरिया के नाम से जाना जाता है। यहां महिलाएं किसी मजबूरी में आती हैं और फिर यहीं की बनकर रह जाती हैं।

‘क्या हम कहीं बैठकर बात कर सकते हैं?’ यह पूछने पर वो फिर गुस्से में तमतमाई और बोली-नहीं, यहीं बोलो, क्या काम है। ये गुस्सा शायद इसलिए था क्योंकि वहां ग्राहकों की भीड़ थी और हम शायद रुकावट बन रहे थे। बहुत मान-मनौव्वल के बाद बरामदे में ही बात हुई, क्योंकि कोई कमरा खाली नहीं था।

'आप गंगूबाई फिल्म देखकर आई हैं?'
क्या आप लीडर हैं? मेरे ये सवाल पूछने पर रीना (बदला हुआ नाम) (50 साल की महिला) नाम की एक महिला नजर आई, जो ढीली-ढाली सी मैक्सी पहने और बिखरे बाल व आंखों पर चश्मा पहने सामने आकर खड़ी हो गई और कमर पर हाथ रखकर बोली- यहां कोई किसी की लीडर नहीं होती। रीना कुछ जवाब देतीं उससे पहले सामने खड़ी किसी दू्सरी महिला ने कहा- आप शायद गंगूबाई फिल्म देखकर यहां आई हैं, फिल्म में जितना सबकुछ अच्छा-अच्छा दिखाया गया है, असल जिंदगी में कोई गंगूबाई नहीं होती। लोग अपने लिए लड़ेंगे या दूसरों के लिए।

मटमैले रंग के कपड़ों में सजी-धजी दिखने में करीब 35 साल की यह महिला अपनी बात रखते हुए कहती है-‘हममें से ज्यादातर महिलाएं पति की छोड़ी हुईं, विधवा या तलाकशुदा हैं, जो गांव में किसी की गर्लफ्रेंड थी और यहां आ पहुंच गई या जिसे गांव वालों ने निकाल दिया। बातों-बातों में रीना हंसी-हंसी में बोल पड़ीं, यहां सभी घिसी-पिटी महिलाएं आती हैं।

हमारे बच्चों को देखने वाला कोई नहीं है, इसलिए हम यहां कमाने खाने आती हैं। अगर हम मजदूरी भी करेंगे तो दिन के 200 से 250 मिलेंगे, उतने में बच्चे, मां-बाप और घर का किराया नहीं निकलता। अगर बाहर खाने के लिए सही मिलता तो जीबी रोड पर नहीं आते। जीबी रोड पर आने वाली लड़कियां अपनी मर्जी से आती हैं और अपनी मर्जी से चली जाती हैं।’

हमें कोई दिक्कत नहीं
क्रीम कलर की साड़ी और खुले बालों में सजी-धजी खड़ीं कविता (बदला हुआ नाम) कहती हैं-अव्वल तो यहां कोठों पर हमें कोई दिक्कत नहीं होती और अगर कभी कोई ऐसा कस्टमर आ जाता है, जो हमारे काम के पैसे न दे या हमारे साथ मारपीट करे तो हम सब मिलकर उसे धो देती हैं या फिर पुलिस के पास जाती हैं।

जब तक यह मटमैले रंग की ड्रेस पहने महिला अपनी बात खत्म करती तब तक वहां आए ढोल-नगाड़े वाले साइड में खड़े हो जाते हैं। सभी महिलाएं वहां खूब सजी-धजी घूमती नजर आईं और किसी त्योहार के ढोल की ताल पर नाचने को तैयार दिखीं।

जीबी रोड की महिलाओं का दावा है कि कोरोनाकाल में पुलिस वालों ने हमारी मदद की।
जीबी रोड की महिलाओं का दावा है कि कोरोनाकाल में पुलिस वालों ने हमारी मदद की।

त्योहारों में क्या करती हैं?
होली-दिवाली कैसे मनाते हैं? इस सवाल के जवाब में जरीना कहती हैं-यहां आने के बाद लड़कियां सभी एक-दूसरे की दोस्त बन जाती हैं और यहीं कोठे पर ही हम सारे त्योहार मना लेते हैं। कुछ लड़कियां अपने गांव चली जाती हैं। क्या आपको गांव जाने पर परिवार स्वीकार लेता है? इस पर जरीना कहती हैं, जो काम करती हूं, वही घर वालों को बताती हूं। 18 साल की थी जब यहां जीबी रोड पर काम करने आ गई थी। अब आंध्र प्रदेश के अपने गांव जाने पर सब जानते हैं कि जीबी रोड से आई है।

जरीना उस कोठे पर सबसे उम्रदराज हैं। वे कहती हैं- जीबी रोड पर आने से पहले मैं गांव में ही सेक्स वर्कर का काम करती थी, लेकिन वहां चोरी-छिपे काम करना पड़ता था। ‘कोई जान पहचान वाला मिल जाएगा’ इस बात का हमेशा डर रहता था। फिर एक दिन मेरी सहेली ने जीबी रोड के बारे में बताया और मैं उसके साथ यहां चली आई।

क्या कोई छुट्टी होती है?
इसी कोठे में तीसरे फ्लोर पर काम करने वाली रानी (बदला हुआ नाम) बताती हैं- यहां बीमार पड़ने पर पास के अस्पताल में चले जाते हैं। छोटा-मोटा बुखार होता है तो उसमें दवा खा लेते हैं। यहां लड़कियां पुणे-मुंबई से दिल्ली आती हैं। यहां किसी के साथ कोई जबरदस्ती नहीं है।

करीब 10 लड़कियों को संभालने वाली रानी (बदला हुआ नाम) कहती हैं-यहां सभी लड़कियां मुसीबत में आती हैं और हम उन्हें मदद पहुंचाते हैं। अगर लड़कियां बीमार हैं तो उस दिन धंधा नहीं करतीं। पीरियड्स हो गए तो आराम करती हैं। दुरुस्त होने पर काम शुरू करती हैं। कोविड के समय पर पुलिस स्टेशन से हमें खाना मिला। सुनने में अजीब लगेगा लेकिन यहां के पुलिस कर्मी हमेशा हमारी मदद के लिए तैयार रहते हैं।

सेहत का ख्याल कैसे होता है?
इसी कोठे पर ग्राउंड फ्लोर पर 30 साल की जयप्रदा कहती हैं, हम में से किसी को यहां कोई परेशानी नहीं है। हम पर कोई पाबंदी नहीं है। हम जिस कोठे में चाहें रह सकती हैं। यह तो हमारा चिड़िया घर है, आज यहां तो कल कहां। मध्य प्रदेश से आई जयप्रदा को थायरॉयड है वे दोपहर के खाने के बाद अपनी दवा लेने की बात कहती हैं।

अब यही परिवार है…
गुस्से से थोड़ी ठंडी होती हुई जरीना कहती हैं, ‘यहां कोई खुशी-खुशी नहीं आता। सभी किसी न किसी मजबूरी में आते हैं। यहां से बाहर भी जाएंगी तो दुनिया हमें गंदी नजर से ही देखेगी। जीबी रोड अब एक परिवार बन गया हैं और यहां से कहीं जाने का मन नहीं करता। पहले मैं इन लड़कियों की सेवा करती थी और अब ये मेरी करेंगी। एक-दूसरे की मदद से ही हम जिंदगी जीते हैं।’