प्यार में रिस्क पड़ा महंगा:अभिनव की लापरवाही से लड़की का दिल टूट गया, इरा को खोने के डर से उसने उठाया ऐसा कदम

3 महीने पहले
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“मन में कोई तो इच्छा होगी, वही मांग लो।” उसने बड़ी सहजता के साथ कह दिया और आंखें बंद कर लीं। आंखें बंद करके वो जाने क्या बुदबुदाने लगी। अभिनव ने उसके चेहरे की ओर देखा। कितनी मासूम लग रही थी। ईश्वर यदि सच में होता होगा तो उसके चेहरे पर भी ऐसे ही निश्छल भाव और शांति की अनुभूति होती होगी। दो मिनट तक चर्च में सन्नाटा रहा। वह यूं ही प्रार्थना में व्यस्त रही। वह यूं ही उसके चेहरे को अपलक देखता रहा।

दो मिनट बाद उसने जैसे ही अपनी बड़ी बड़ी आंखें खोलीं, अभिनव यूं सकपकाया जैसे उसकी कोई चोरी पकड़ ली गयी हो। उसने अपना चेहरा जीसस की मूर्ति की ओर घुमा लिया। वह मासूम थी, मूर्ख नहीं। उसने पूछा, “तुमने आंखें बंद नहीं की न?”

“हूं… नहीं…” अभिनव ने थोड़ा झेंपते हुये उत्तर दिया।

“तो फिर भगवान से कुछ मांगा भी नहीं होगा?” उसने धीरे से फुसफुसाते हुए अभिनव के कान में कहा। उसकी आवाज इतनी मीठी थी कि अभिनव उसी में खो गया। इतने पास आने पर वह अपने साथ महक का एक झोंका भी लायी थी। अभिनय ने उसकी सम्मोहिनी आंखों में देखा तो देखता ही रह गया और ये भूल गया कि इरा ने क्या पूछा। दोनों कुछ पल यूं ही थमे से रह गए जैसे फिल्मों में थोड़ी देर के लिए किसी दृश्य को फ्रीज कर दिया जाता है।

अगले दिन इरा घर से साइकिल पर निकली थी। काले रंग के शॉर्ट्स और गुलाबी रंग की टी-शर्ट पहने, कंधे पर छोटा सा बैग टांगे हुए। अभिनव ने उसे देखा तो 'हाय' बोला। दोनों में थोड़ी सी औपचारिक बातें हुईं। इरा ने अभिनव को बताया कि वह रविवार को चर्च नहीं जा पाएगी इसलिए कोचिंग से लौटते हुए उधर जाएगी। अभिनव की कई दिनों से चर्च को अंदर से देखने की इच्छा थी। इरा ने प्रस्ताव रखा अगर वह चाहे तो साथ चल सकता है।

रास्ते में इरा ने पूछा, “कुछ पैसे होंगे?”

अभिनव ने कहा, “हां, कितने चाहिए?”

इरा ने कहा, “बीस रुपए।” बीस रुपए से इरा ने चार मोमबत्तियां खरीदी और दो मोमबत्तियां अभिनव के हाथ में पकड़ा दी। अभिनव ने सुंदर सी कैंडल्स को हाथ में लेकर देखा। उसे तो ये भी पता नहीं था कि चर्च में कैंडल्स लेकर जाते हैं। उसे देव-स्थानों में कोई श्रद्धा नहीं थी। मंदिर भी बहुत कम ही जाता था। अगर कभी गया भी तो अपने माता-पिता के साथ। मंदिर में उसने माता-पिता को अगरबत्ती, फूल, प्रसाद लेकर जाते देखा था। मोमबत्ती लेकर पूजा के स्थान पर जाना उसके लिए नई बात थी।

अभिनव को इरा का दिल तोड़ना अच्छा नहीं लगा। उसने बिना कुछ कहे उन कैंडल्स को हाथ में ले लिया। कैंडल्स को हाथ में पकड़े वह इरा के साथ चर्च के अंदर आ गया। इरा यीशु की मूर्ति के सामने श्रद्धापूर्वक नतमस्तक हो गई। इसके बाद उसने कैडल्स को जलाया और उसने अभिनव को भी कैंडल्स जलाने का इशारा किया। अभिनव ने इच्छा न होते हुए भी यंत्रवत कैंडल्स जला दिए। इसके बाद इरा ने आंखें बंद कर लीं।

“जब कुछ मांगना ही नहीं था तो इतनी दूर मेरे साथ चर्च क्यों आये?" इरा का स्वर थोड़ा रूठा हुआ सा था।

अभिनव इरा के इस प्रश्न से तंद्रा से बाहर आया। उसने कहा, “हम्म… बताया तो था, मैंने चर्च अंदर से कभी नहीं देखा था। फिर तुम्हारी कंपनी मिल रही थी।”

“जानते हो कैंडल्स क्यों जलाए जाते हैं?” इरा ने सामने देखते हुए पूछा।

“क्यों?”

“ये कोई साधारण कैंडल्स नहीं हैं। ये वोटिव (मन्नत) कैंडल्स हैं। हमें सुंदर प्रकाश देने के लिए, मोमबत्ती अपने आप जल जाती है, जैसे हमारे यीशु ने हमारे लिए स्वयं को दे दिया। मोमबत्तियों की रोशनी हमारी प्रार्थना का प्रतिनिधित्व करती है और हमारे जाने के बाद भी ‘चल रही प्रार्थना’ के रूप में जलती रहती है।”

“हम्म… समझ गया।”

“पर अब क्या फायदा… अब तो तुम्हारी कैंडल्स पिघल कर खत्मभी हो गईं।”

“हम्म… दरअसल बात ये है कि… न जाने ऐसी कितनी चीजें हैं जिन्हें मैं पाना चाहता हूं, पर मुझे अपने ऊपर भरोसा है। मैं उन्हें खुद पा लूंगा। ईश्वर से क्यों कहूं भला?” अभिनव ने उसकी गहरी आंखों में झांकते हुए कहा।

इरा ने नाराज होकर अभिनव से मुंह मोड़ लिया। उसने अपना बैग उठाया और चल पड़ी। जाते जाते उसने कहा, “कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनमें रिस्क नहीं लेना चाहिए। उसके लिए एक बार भगवान से प्रार्थना कर ली जाए, तो कुछ घट तो नहीं जाएगा।”

अभिनव इरा के पीछे-पीछे आ गया। इरा चुप थी। उसने बिना बोले अपनी साइकिल उठायी और चलाने लगी। अभिनव को ये आभास हो गया था कि इरा उससे नाराज हो गयी है। पर उसे समझ नहीं आया कि इरा को मनाने के लिये क्या कहे? ये पहला मौका था जब कोई लड़की उससे यूं नाराज होकर चली गयी थी। फिर वो कोई भी लड़की नहीं थी... वो तो इरा थी। वो भी उसके पीछे-पीछे साइकिल चलाता हुआ चलने लगा।

दूसरे दिन सुबह इरा आयी, लेकिन अभिनव से मिल न सकी। अभिनव अपनी मां के साथ उस शहर चला गया जहां उसके पिता रहते थे। दो महीनों तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हो सकी। तब मोबाइल नहीं हुआ करते थे और दोनों ने चिट्ठी भी नहीं लिखी। इरा को तो अभिनव का पता नहीं मालूम था। अभिनव ने इस संकोच में पत्र नहीं लिखा कि न मालूम उसके घरवाले क्या सोचेंगे।

दो महीने बाद अभिनव अपनी मां के साथ किसी काम से इरा के शहर वापस आया। 'इरा के शहर' क्योंकि अब ये अभिनव का शहर नहीं रहा था। थोड़ी देर में वो इरा के घर पहुंच गया। इरा का घर काफी बड़ा था। जमीन के पिछले हिस्से में मकान बना था, आगे लॉन के लिए जगह खाली थी। सामने लकड़ी की खपच्चियों वाला छोटा सा दरवाजा था।

अभिनव ने घंटी बजाई और मुख्य द्वार से अंदर आकर प्रतीक्षा करने लगा। अंदर से इरा निकली। घुटनों तक गुलाबी रंग की फ्रॉक में वो बहुत सुंदर लग रही थी। उसके बाल गीले और खुले थे। उसने अभिनव को सामने देखा और आश्चर्य से चहकते हुए कहा, “अभिनव..?”

इरा के चेहरे पर आये खुशी के भाव और लाज भरी मुस्कान को देखते ही अभिनव को कुछ नया नया सा आभास हुआ, उसके मन में स्पंदन हुआ, “शायद यही तो प्यार है..!”

अभिनव ने कहा, “इरा, चलो, मुझे चर्च में ईश्वर से कुछ प्रार्थना करनी है। मैं रिस्क नहीं लेना चाहता!”

- टि्वंकल तोमर सिंह

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