आज रो लेने दो:जिंदगीभर कठोर होने की एक्टिंग की, लेकिन जब कोमलांगी से बिछड़ने का वक्त आया तो वह फूट फूट कर रोने लगा

एक महीने पहले
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“क्या तुम छोटी-छोटी बातों पर रो पड़ते हो? अच्छा लगता है क्या? चाहे खुशी की बात हो या दुख की, बस तुम्हारी आंखों से आंसू झर-झर करने लगते हैं। सामने से तो नहीं, पीछे से लोग मजाक उड़ाते हैं तुम्हारा कि पुरुष होकर रोते हो। चार दिन के लिए मायके चली जाऊं तो कैसे नम आंखें लिए मायके पहुंच जाते हो। कितनी शर्म आती है मुझे,” कोमलांगी बोली।

उसके स्वर में उलाहना जरूर था, पर रजत को देखती उसकी आंखों में असीम प्यार था। वह नहीं जानती कि ऐसा पति बड़ी किस्मत से मिलता है!

“प्यार जो करता हूं, तुमसे बेशुमार,” रजत ने उसे बांहों में भरते हुए कहा। तुमसे एक पल भी अलग नहीं रह सकता। क्या करूं तुम हो ही इतनी अच्छी। तुम्हारा प्यार मेरी रगों में लहू बनकर जो दौड़ता रहता है।”

“तुम्हारी सब बातें मानती हूं, पर पुरुष होकर रोने वाली बात…अच्छी नहीं लगती।”

“क्यों पुरुष रो क्यों नहीं सकते? क्या उनके आंसू नहीं बनते? क्या उनकी पुतलियों और पलकों के बीच स्थित लैक्रिमल ग्लैंड यानी वह ग्रंथि नहीं होती जो विशेष तरह के रसायनों का स्राव करती है, जिससे आंसू बनते हैं? क्या उनकी आंखों में नमी नहीं उतरती? क्या उनके भीतर भावनाओं का ज्वार-भाटा नहीं उमड़ता है?

वे भी तो किसी को खो देने से दुख में डूबते हैं, वे भी तो आघात पाने पर पीड़ा की उस नदी के किनारे जाकर चुपचाप बैठना चाहते हैं, जहां स्त्री अपने आंसुओं को तेज-तेज रोते, चिल्लाते या फिर सुबकियां लेते बहने देती है, बिना किसी संकोच के। कोई हिचकिचाहट नहीं होती उसे कि कोई उसके बहते आंसू देख क्या कहेगा। रोना उसका जन्मसिद्ध अधिकार जो है। फिर पुरुषों को इस अधिकार से वंचित क्यों किया गया है?” वह अड़ गया था उस दिन। कोमलांगी से बहस करने लगा था इस बात पर।

कठोरता का पर्याय न जाने क्यों पुरुषों को ही माना जाता है। स्त्रियां भी तो पत्थर दिल होती हैं। नहीं-नहीं, वह यह सब इसलिए नहीं कह रहा, क्योंकि वह पत्नी पीड़ित है। उसकी पत्नी कोमलांगी, अपने नाम के अनुरूप ही कोमल, शांत और प्यार से लबालब स्त्री है।

है..? प्रश्न चिह्न क्यों लगाया? बताता हूं यह भी।

पर अभी तो मैं केवल रोना चाहता हूं। लेकिन फिर न रो पाने के सवाल का जवाब तो देना होगा आपको! समाज को! परंपराओं को! न जाने किसने यह नियम बनाया होगा? किसने इस बात को लगातार दोहराते और इसे एक प्रामाणिक सत्य बनाने की हठ की होगी? और न जाने कौन यह करने में सफल हो पाया होगा? यह तो निश्चित है कि केवल स्त्री रोती है, पुरुष नहीं, एक सदियों पुरानी प्रथा है जो जड़ जमा चुकी है और इसको हमें यानी पुरुषों को भुगतना पड़ रहा है।

किसी काले पानी की सजा की तरह या उससे भी बढ़कर अपने दर्द को खुलकर, बेझिझक छलका न पाने की विडंबना की तरह। उसे तो लगता है कि पुरुष के ऊपर होने वाला यह सबसे बड़ा अन्याय है।

आज भी किसी के मर जाने पर रुदालियों को बुलाया जाता है ताकि वे आकर छाती पीट-पीट कर रोएं। ये रुदालियां विधवा होती हैं।

पुरुषों को क्यों नहीं यह काम सौंपा गया उनके विधुर हो जाने के बाद? जाओ किसी स्त्री की मौत पर जाकर रुदाला बनकर रो। काश! ऐसी भी परंपरा होती तो भीतर जमा सारा दर्द इसी बहाने निकल जाता। दुनिया यही समझती कि दूसरे के दुख का मातम बना रहा है, काम है, क्योंकि पैसे मिल रहे हैं ऐसा करने के लिए। कौन जान पाता कि वह सच में अपनी भोगी पीड़ा, मन में उठते असंख्य तूफानों को आंखों के रास्ते बाहर कर खुद के भारीपन को हल्का करने की कोशिश कर रहा है।

रोने को इतना महत्व क्यों दे रहा हूं? बकवास लग रही होंगी मेरी बातें आपको। मुझे पूरा यकीन है कि सब यही सोच रहे होंगे कि एकदम बे-सिर पैर की बात है, लेकिन ऊपरी तौर पर भीतर ही भीतर सोच रहे होंगे कि सही तो कह रहा है और स्त्रियां भी फुसफुसा रही होंगी, ‘रो लेने दो, इन बेचारों को भी रो लेने दो। कम से कम इस तरह इनकी कठोरता की एक सिलवट तो हटेगी, वरना जिम्मेदारियों को कंधों पर ढोते-ढोते ये यूं ही असमय बूढ़े होते रहेंगे और श्मशान में जलती चिताओं को देख मुंह पर रुमाल रखकर टकटकी बांधे आग की लपटों को उठता देखते रहेंगे।

यकीन मानिए, मैं कोई लेखक नहीं हूं जिसने रोने पर कोई विशारद की है, मैं एक पुरुष हूं, घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा, एक पति और पिता, एक बेटा, एक भाई और बहुत सारे रिश्ते-नातों में बंटा एक साधारण इंसान। बहुत सामान्य सी जिंदगी जीता हूं। जैसी मेरी परिस्थितियां और आर्थिक हालात हैं, उन्हें देखकर विश्वास से कह सकता हूं कि भविष्य में भी एक साधारण जीवन जीने वाला हूं।

मैं वह आम पुरुष हूं जो चक्करघिन्नी की तरह नौ से पांच की नौकरी करता है और घर आकर माता-पिता, पत्नी से, बच्चों से बातें करने के बाद खाना खा कर सो जाता है। बहुत हुआ तो कुछ देर टीवी भी देख लेता हूं या पत्नी के संग-साथ का आनंद ले सो जाता हूं।

इसे प्रेम कहते हैं तो यही सही। पर सेक्स संबंध अनिवार्यता है, इसे जो नकारता है, वह झूठ बोलता है। लेकिन मैं अपनी पत्नी से सचमुच बहुत प्यार करता हूं। उसकी अच्छाई के कारण, उसकी सुघड़ता के कारण या घर को बखूबी संभालने के कारण… हिसाब-किताब में क्या पड़ना कि मैं उससे क्यों और कितना प्यार करता हूं।

बस प्यार करता हूं। चाहे उसके लिए चांद-सितारे तोड़कर लाने की हैसियत नहीं रखता, पर हथेलियों में उसके चेहरे को समेट उसकी आंखों में झांक कर उसके मन के हर ताप को झंकृत कर, उसके शरीर के हर रेशे को सिहरा कर खूब प्यार करता हूं। मैं मजनूं नहीं हूं, न ही कोई खिलंदड़ा, उतावला किशोर। 40 साल का अधेड़ हूं, पर खुलकर कहने की हिम्मत रखता हूं कि मैं कोमलांगी से प्यार करता हूं।

कभी-कभी हंसकर छेड़ देती, “लोग मजाक उड़ाते हैं कि बीवी के दीवाने हो। इतनी दीवानगी भी अच्छी नहीं होती, मेरे भोले।” जब भी ज्यादा लाड़ में आती कोमलांगी तो मुझे भोले कहकर मेरे गालों को चूम लेती।

‘‘कहने दो जिसे जो कहना है। दीवानगी कहो या प्यार। वैसे कितनी मुसीबत है, बीवी से प्यार करो तो भी दिक्कत, उसका ख्याल न रखो, तब भी सौ-सौ बातें सुनने को मिल जाती हैं। इसलिए वही करो जो दिल कहे और मेरा दिल मांगे मोर…’’ मेरे शायराना अंदाज पर वह फिर मुझे भोले कह मेरे बालों से खेलने लगती।

मां-बाबूजी दबी जबान से मुझे जोरू का गुलाम कह देते, पर मैं मस्त-मलंग, मैंने कभी परवाह नहीं की। हर सामान्य पुरुष की तरह मेरा सामान्य जीवन अपनी गति से, तमाम उतार-चढ़ावों को झेलता चल रहा था कि अचानक यह हो गया… रोने का मन कर रहा है। पर सब समझाने में लगे हैं, ‘‘सब्र कर, हिम्मत रख। तू आदमी है, कमजोर नहीं पड़ सकता। अभी जिम्मेदारियां हैं तुझ पर, पहले से भी कहीं ज्यादा। अब तो तुझे ही सब संभालना है। उसके लिए पहले तुझे खुद को संभालना होगा।’’

‘‘उठ बेटा। कितनी देर तक यूं ही बैठा रहेगा,’’ बाबूजी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। चेतन हुआ जैसे। मेरे इसी कंधे को अभी एक काम करना था। एक बार फिर मैंने उसे देखा- एकदम शांत चेहरा था, कोमल, किसी गुलाब की ओस में भीगी पंखुड़ी की तरह।

मुझे उठते न देख और वहां उपस्थित लोगों को बार-बार अपनी घड़ियों या मोबाइल पर टाइम देखते देख, समय की होने वाली बरबादी का आकलन करते हुए, जीजाजी ने मेरे मौसेरे भाई को इशारा किया कि वह कंधा लगा दे। जीजाजी, मेरे दोनों साले, पहले ही खड़े थे कंधा देने को।

‘‘राम नाम सत्य है,’’ जीजाजी ने हुंकार-सी भरी। और अर्थी उठाकर दरवाजे से बाहर निकलने लगे।

‘‘कोमलांगी,’’ मैं चीत्कार कर उठा। आंसू पुरुष की संवेदनाओं पर बांधे सारे बांधो को तोड़कर बहने लगे।

मैं रो रहा था, फूट-फूट कर रो रहा था।

- सुमन बाजपेयी

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