बीवी की बेवफाई:शादी के बाद अनीश गर्लफ्रेंड से मिलता रहा, लेकिन जब पत्नी के अफेयर के बारे में पता चला तो होश उड़ गए

10 दिन पहले
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सच्चाई के सबूत देखकर वीना सन्न रह गई। गिर ही पड़ती अगर पीछे सोफा न होकर जमीन होती। सोफे में धंसे हुए घंटो रोती रही। डोरबेल बजी तो चौंकी। जैसे जीवन में पहली बार डोरबेल सुनी हो। चेतना वापस आने में कुछ समय लगा। बच्चे स्कूल से वापस आ गए! क्या बताएगी बच्चों से? क्या वो पूछेंगे नहीं कि इतनी सूजी आंखें, उड़ा चेहरा क्यों है मेरा।

अनीश के सामने सबूतों के साथ बैठे जब बहुत समय हो गया और अनीश की चुप्पी नहीं टूटी तो बौखला गई वीना, “मैंने बच्चों को कैसे समझाया है कि कुछ नहीं बस सिर दर्द है, मैं ही जानती हूं। मुझे मजबूर न करो कि मैं इतनी तेज आवाज में बोलूं कि आवाज कमरे से बाहर जाए।” कहते-कहते वीना फिर से फ़ूटकर रो पड़ी।

अनीश ने आगे बढ़कर उसे संभालना चाहा पर उसकी आंखों में चिंगारी देखकर रुक गया, “पहले तुम खुद को संभाल लो फिर मैं सफाई दूं।” आखिर मुश्किल से थूक घोंटते हुए उसने कहा।

आखिर संभलने-संभालने का दौर खत्म हुआ और अनीश ने कहना शुरू किया।

“शीनू को मैं शादी से पहले से जानता था। वो मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। धीरे-धीरे हमें पता चला कि हम प्यार करने लगे हैं। शादी भी करना चाहते थे हम। पर तुम तो जानती ही हो कि हमारा परिवार, रिश्ते-नाते, इतना बड़ा बंग्लेनुमा घर, जमीन, पापा का जमा-जमाया बिजनेस, सिर्फ यहां, पटना में था और मैं हमेशा से यही जानता और मानता था कि बड़े होकर मुझे पापा का बिजनेस ही संभालना है। उसकी जॉब मुंबई में लगी और वो वहीं सेटल हुई। शादी की बात चलने पर न वो अपनी जॉब छोड़ने को तैयार हुई न मेरा परिवार जॉब करने वाली लड़की को अपनाने को तैयार था।”

“तो इसीलिए आपने पापाजी के बिजनेस की एक यूनिट मुंबई में स्टेबलिश की?”

“हां, कारण तो यही था, पर तब तक मुझे ये एहसास हो गया था कि मेरे घर वाले इस शादी को नहीं मानेंगे इसलिए हम कम ही मिलते थे। केवल सी-बीच पर हाथों में हाथ लिए हम घंटो साथ टहलते हुए घर वालों को मनाने की तरकीबें सोचते रहते।”

वीना को लगा कि उसके दिल में तीर सा चुभ गया है जिसकी टीस असहनीय होती जा रही है। ‘हाथो में हाथ लिए’ वो गुस्से से बुदबुदाई, “क्यों नहीं कह दिया घरवालों से कि अगर उससे शादी नहीं हुई तो किसी से नहीं करोगे।” न चाहते हुए भी वीना की आवाज तेज हो गई।

अनीश सकपकाया सा धीरे बोलने का इशारा करते हुए उसके करीब आ गया। उसने बड़े प्यार से वीना का हाथ अपने हाथों में लेने की कोशिश की पर वीना ने झटक दिया।

“यही किया था मैंने, पर तुम्हें देखकर मेरा ईमान डोल गया। तुम्हारी सादगी, तुम्हारी खूबसूरती और इतना अलग और निराला अंदाज। पता है, बुआजी ने पक्के यकीन के साथ कहा था कि इस लड़की को देखने के बाद कोई मना कर ही नहीं सकता। और उनकी बात सच साबित हुई। क्या कमी निकालता तुम में। तुम में कोई कमी थी ही नहीं।” कोई और समय होता तो इतनी प्यार और मनुहार भरी नजरों से खुद की ओर देखकर ऐसी बातें बोलते अनीश के सीने से लिपटकर एक प्यारा सा चुंबन जड़ चुकी होती। पहले भी कई शामों को अनीश ने ये बात बताकर रोमांटिक बनाया है। तब उसने खुद प्यार की पहल करके अनीश की फरमाइशों को पूरा भी किया है।

वीना की आंखों में अतीत की सुखद झलक देखकर अनीश को उसके करीब आने का मौका मिल गया। उसने एक बार फिर वीना का हाथ थामने की कोशिश की, पर वीना संभल गई, “आप किसी और से प्यार करते हुए किसी और पर फिदा कैसे हो सकते हैं? और जब मुझसे शादी कर ही ली थी तो उससे संबंध तोड़े क्यों नहीं?” उसकी पलकें फिर भर आईं। “इतना तो मैं भी समझती हूं कि अतीत किसी का भी हो सकता है। अगर ये सिर्फ अतीत होता तो मैं कभी इतनी दुखी न होती।”

“संबंध थे ही नहीं हमारे तो टूटते क्या? हम अच्छे दोस्त की तरह मिलते जब भी मैं मुंबई में होता। पर एक बार मेरे मुंबई जाने पर वो वहां नहीं थी। उसकी मां की डेथ हो गई थी। तो वो अपने शहर गई हुई थी। जिस दिन वो वापस आई उसके दूसरे दिन सुबह मुझे वापसी के लिए निकलना था। तो वो मुझसे मिलने मेरे कमरे में आई। हम बातें करते ही रहे। बारिश का मौसम था। उस दिन जो बारिश शुरू हुई तो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। वो बहुत उदास थी। मैंने उसकी उदासी दूर करने के लिए उसे बाहों में लिया और सांत्वना के लिए उसकी पीठ पर हाथ फेरता रहा।” अनीश चुप हो गया।

कुछ देर ठहरकर वीना को देखता रहा फिर बोला, “उन दिनों तुम्हारी पहली प्रेग्नेंसी चल रही थी। मैं बहुत प्यासा था। जाने कब और कैसे मेरे होंठ उसे चूमने लगे। जाने कब बाहर की बारिश हमारे प्यासे तन-मन को भिगाने लगी और बईमान मौसम ने हमें आशिकाना कर दिया। मेरी हथेलियां उसके कंधे से जैसे खुद-ब-खुद...”

“बस करो। तुम अपनी पत्नी से बात कर रहे हो...” वीना चीख-सी पड़ी।

“तुम्हारा बेटा तेरह साल का हो गया है। तेरह साल से तुम मुझे...नहीं, मैं तुम्हारे जैसे धोखेबाज इंसान के साथ नहीं रह सकती...नहीं रह सकती...” वीना बिस्तर पर औंधी गिर पड़ी और रोती ही गई।

एक हफ्ता बीत गया। वीना ने खुद को कुछ सामान्य करके फिर बात चलाई। इतने दिनों में अनीश भी खुद को सामान्य कर चुका था। “तुम्हें या तो मुंबई की यूनिट बंद करनी होगी या जब भी तुम मुंबई जाओगे, मैं तुम्हारे साथ चलूंगी।”

“ये दोनों ही बातें संभव नहीं हैं। यहां घर और बच्चों को अकेला छोड़कर तुम...”

“मुझे तलाक चाहिए।”

“ठीक है वीना। अगर तुम्हारा यही फैसला है तो यही सही। बच्चों की कस्टडी, हर्जाना जैसा तुम चाहो सब वैसा ही होगा, पर एक बार तसल्ली से मेरी बात सुन लो।”

वीना ने आहत निगाहों से अनीश की ओर देखा। “देखो, ये तो तुम मानती हो कि बच्चों का इसमें कोई दोष नहीं है। हमारे तलाक से वे तो टूटेंगे ही, तुम अपने मेरे मम्मी-पापा सबसे पूछकर देख लो, वो और समाज सब तुम्हें ही दोषी ठहराएंगे। फिर तुम करोगी क्या? जो खर्चा अदालत निश्चित करे अगर मैं वो पूरा तुम्हें दे भी दूं तो क्या उतने में तुम्हारा खर्चा चलेगा? क्या बढ़ते बच्चों को अकेले आकार दे पाओगी या उन्हें मेरे पास छोड़कर मुझ पर भरोसा कर पाओगी?”

वीना शॉक्ड सी हो गई। अनीश की बातों में सच्चाई थी, पर अब तो बात उसकी पहुंच से बाहर हो चुकी थी। अब अगर वो तलाक नहीं लेती है तो अनीश जो कुछ चोरी-छिपे करता था अब वो खुल्लम-खुल्ला करने की इजाजत देने जैसा होगा। और तलाक लेती है तो... वीना को जैसे चक्कर आने लगे।

अनीश ने मौका मिलते ही उसे बाहों में भरकर संभाल लिया और उसके थरथराते बदन पर अनीश के चुंबन मनुहार की कहानी लिखने में लग गए, “यकीन मानो, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं। मेरा सब कुछ तुम्हारा और बच्चों का ही है। वो बिल्कुल अकेली है। मेरे सिवा उसका कोई नहीं। मैं केवल मुंबई में होने पर उससे मिलता हूं। उससे तुम्हारा कुछ नहीं छिनता। जब वापस आता हूं तो उसकी यादों को भी साथ नहीं लाता, सच! मेरी इतनी सी बेवफाई को माफ कर दो प्लीज।”

फिर अनीश मुंबई के लिए रवाना हुआ। जाने के कुछ दिन पहले से उसका प्यार कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। पर वीना के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।

अनीश वापस आया तो घर में वीना नहीं थी। मां ने खाना लगवाया और अपनी आदत के अनुसार लाड़ आदि किया। “वीना कहां है?” आखिर अनीश की चोर निगाहें सब जगह ढूंढ़कर थककर बोलीं।

“उसने एक हॉबी कोर्स ज्वाइन कर लिया है। कंप्यूटर का कोई कोर्स है।”

“ओह!” अनीश ने चैन की सांस ली।

बच्चे आए, हंसी-खेल हुआ। पापा क्या-क्या लाए जैसे लाड़ हुए, बातें हुईं, फिर वे बोले “हमारी ट्यूशन का टाइम हो गया।”

“ट्यूशन?”

“हमारे ट्यूशन सर बहुत अच्छे हैं...” बेटी उनके गुण गा रही थी और अनीश देख रहा था पंद्रह दिनो में कितना कुछ बदल गया है।

शाम को वीना आई। एक बार उसे देखकर तो अनीश पहचान नहीं पाया। कटे बाल, नया आधुनिक सूट और आत्मविश्वास से भरा चेहरा। उसे ज्यादा आश्चर्य इस बात का था कि मां ने कैसे…

“क्या सोच रहे हैं? आधुनिक सास की आधुनिक बहू हूं। मां मेरे इस कोर्स से खुश हैं। खुश हैं कि उनकी बहू जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है।” वीना मुस्कुराते हुए बोली।

रात में वीना को सेक्सी नाइटी में देखकर अनीश की खुशी का ठिकाना न रहा। “मुझे खुशी है कि तुमने वक्त की जरूरत को समझा और माना। तुम्हें खुश देखकर मैं बहुत खुश हुआ। अनीश ने उसे बांहों में भरा ही था कि वो हौले से अलग हो गई। “मुझे तुमको कुछ बताना है।” अनीश मुस्कुराते हुए सुनने बैठ गया।

“उस दिन जब तुमने मुझे अपने प्यार के बारे में बताया तो मुझे पहले तो बहुत बुरा लगा फिर जैसे मेरे सिर का एक बोझ हल्का हो गया।” अनीश के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।

“तुम सब्र से सुनना, गुस्साना नहीं।” वीना ने करीब आकर अनीश के सीने पर अपना सिर रख दिया। शादी से पहले मैं किसी को दिलोजान से चाहती थी। पड़ोसी था वो मेरा। बचपन से साथ खेले, बड़े हुए, एक पसंद, एक मन कब और कैसे एक जीवन का सपना बन गए पता ही नहीं चला। पर हम दोनों जानते थे कि विजातीय होने के कारण हमारे घर वाले नहीं मानेंगे, इसलिए हमने कभी अपने संस्कारों के दायरे के बाहर कोई कदम नहीं रखा। हम दूर से ही एक-दूसरे को बस निगाहों से प्यार कर लेते थे। अपने घर वालों को प्यार से मनाने की कोशिश की पर बात बिगड़ गई। मेरे घर वाले उसकी जान के प्यासे हो गए तो उसे शहर छोड़ना पड़ा।

कुछ साल पहले वो पटना में ही सेटल हो गया। उसने एक कंप्यूटर ट्रेनिंग का इंस्टीट्यूट खोल लिया है, मैं ये जानती थी। तुम तो जानते ही हो कि मुझे कंप्यूटर सीखने का कितना शौक है और उसका इंस्टीट्यूट है भी पास में, पर मैं ज्वाइन नहीं कर रही थी।”

अनीश की निगाहों में नाराजगी के ढेर सारे भाव घुलते जा रहे थे। “क्योंकि मैं आग और फूस को साथ नहीं आने देना चाहती थी।” वीना बोलती गई, “पर तुम्हारे जाने के बाद मैं गुस्से में वहां चली गई। पर वहां जाकर मुझे बहुत राहत मिली। उससे बातें होने लगीं। जब मुझे पता चला कि आज तक उसने शादी नहीं की है तो मैंने उससे कारण पूछा, तो पता है उसने क्या कहा? कहा कि प्यार तो जिंदगी में सिर्फ एक बार होता है। बाकी तो सब समझौता है और मैं समझौता नहीं करना चाहता।”

वीना ने बात अधूरी छोड़कर अनीश के होंठो पर चुंबन जड़ दिया और उससे लिपटकर उसे प्यार करने लगी। “तुम्हें जो कहना था, कह चुकी हो न?” अनीश ने उसे अपनी बाहों से अलग करते हुए पूछा।

“नहीं। मैं तुमसे कुछ छिपाना नहीं चाहती। दरअसल उसकी बात सुनकर मुझे एक ओर तो इतनी खुशी हुई कि मेरी पलकें भर आईं, पर दूसरी ओर मेरा मन उसके लिए दुखने लगा। देखो, मेरा और तुम्हारा अनुभव उससे अलग है न? हमें दोबारा भी प्यार हुआ है। तो ये बात उसे समझाने के लिए, शादीशुदा जीवन के सुख का एहसास कराने के लिए मुझे वही सब कुछ करना पड़ा जो उस दिन तुमसे उसे सांत्वना देने के चक्कर में गलती से हो गया था। तुम लोगों की तरह हमारे तन-मन भी प्यासे थे। मेरी इतनी सी बेवफाई माफ कर दो प्लीज।”

“तुम जो चाहती हो वही होगा, पर कह दो कि तुम मुझे जलाने के लिए झूठ कह रही हो” अगले ही पल अनीश उसे झिंझोड़ता हुआ गुस्से में चीख रहा था। वीना के होंठों पर विजयी मुस्कान आ गई।

- भावना प्रकाश

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