E-इश्क:देवदूत जीवन में कुछ समय के लिए आ तो सकते हैं, लेकिन वो आपकी जिंदगी नहीं बन सकते

एक महीने पहले
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सरगम को कंपनी की तरफ से अमेरिका का एक साल का प्रोजेक्ट क्या मिला मानो उसके सपनों के पंखों को उड़ान मिल गई। अब उसे किसी भी तरह अमेरिका में समय सीमा बढ़ाकर ग्रीन कार्ड पाना है। फिर अपनी मां को भी वहीं बुला लेगी।

वॉशिंगटन में घर से ऑफिस आने जाने के लिए सरगम को ट्रेन से करीब आधा घंटा लगता है। मुंबई लोकल से अलग यहां ट्रेन का सफर धक्का-मुक्की और छेड़खानी से मुक्त होने के कारण वह काफी निश्चिंत है। फिलहाल उसका पूरा ध्यान अपने भविष्य को संवारने पर है।

लेकिन हर दिन एक जैसा नहीं होता। एक दिन शाम को वापसी में ट्रेन में 4-5 बदमाशों ने सरगम को घेर कर भद्दे कमेंट करने शुरू कर दिए। जब तक वे कोई गलत हरकत करते, तब स्टेशन नजदीक आता देख उसके सामने बैठे को-पैसेंजर ने उठकर एक झटके में सरगम का हाथ पकड़ा और ट्रेन के रुकते ही स्टेशन पर कूद गए।

यह सब इतनी जल्दी में हुआ कि सरगम को कुछ समझ ही नहीं आया। थर-थर कांपती सरगम ने अपने उस देवदूत से को-पैसेंजर की बांह कसकर पकड़ ली। उसकी स्थिति को समझते हुए देवदूत सरगम को कॉफी हाउस तक ले गया और कॉफी ऑफर की। गरम-गरम कॉफी के हलक में उतरते ही सरगम मानो होश में आई और वह देवदूत के सामने बिलख कर रो पड़ी।

“घर नहीं चलना?” देवदूत ने पूछा।

सरगम ने ‘हां’ कहते हुए सिर हिलाया।

“मैं भी इंडियन हूं। यहां कई वर्षों से रह रहा हूं। कई रोज से ट्रेन में तुम्हें आते जाते देख रहा था। परदेस में अपनों का दिख जाना भी बहुत तसल्ली देता है।”

“सही कह रहे हैं आप, अपने ही अपनों के काम आते हैं। आज आप न होते तो मेरा क्या होता!”

“ऐसा नहीं है, मेरी जगह कोई भी होता तो इंसानियत के नाते तुम्हारी मदद जरूर करता।”

फिर देवदूत ने माहौल को हल्का बनाने के लिए सरगम को छेड़ा, “अपना कहती हो, लेकिन तुमने तो मेरा नाम तक नहीं पूछा। मैं सौरभ हूं और तुम्हारा नाम क्या है?”

“मैं सरगम,” वो समझ रही थी कि देवदूत उसके मन का डर निकालने के लिए मजाक कर रहा है।

सौरभ का अपार्टमेंट सरगम के ऑफिशियल गेस्ट हाउस से थोड़ी दूर पर है इसलिए अब दोनों ने इकट्ठे ऑफिस आना जाना शुरू कर दिया। परदेस में देवदूत को पाकर मानो सरगम को एक नई जिंदगी मिल गई। बिल्कुल ऐसे ही मैच्योर और डैशिंग लाइफ पार्टनर की चाहत थी उसकी। सरगम ने इशारों में मां को भी अपने देवदूत यानी सौरभ के बारे में फोन पर बता दिया था। मां खुश थी कि अच्छी नौकरी के साथ ही सरगम को अच्छा जीवनसाथी भी मिल गया है।

आज सरगम बहुत खुश थी, क्योंकि आज वो आज अपने देवदूत से दिल की बात कहने वाली थी इसलिए उसने सौरभ को घर बुलाया था। सौरभ को घर बुलाने की तैयारी के लिए उसने आज ऑफिस से छुट्टी ले ली थी। शाम को जब सौरभ घर आया तो सरगम को यूं सजा-धजा देख पूछ बैठा, “आज क्या स्पेशल है सरगम? कहीं तुम्हारा बर्थडे तो नहीं?”

“नहीं, उससे भी स्पेशल दिन है आज। आज मैं तुमसे कहना चाहती हूं कि परदेस में घर बसा लेते हैं, फिर ऑफिस के बाद अलग-अलग नहीं रहना पड़ेगा, हम हर पल साथ रह सकते हैं।”

सरगम की बात सुनकर सौरभ चौंक गया। उसने बात को संभालते हुए कहा, “सरगम, गलती मेरी है, मैंने तुम्हें बताया नहीं। मैं शादीशुदा हूं। कविता मेरी पत्नी है और चेरी मेरी 9 साल की बेटी। यकीन मानो, तुम्हारे लिए मेरे मन में कोई गलत भावना नहीं है, बस डरता था कि शादी की बात जानकर तुम कहीं मुझसे दूरी न बना लो। तुम्हारा साथ मुझे अच्छा लगने लगा है। घर पहुंचकर भी तुम्हारे बारे में सोचता हूं अक्सर।”

“मेरा देवदूत ऐसा छलिया होगा ये मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।” सरगम की आंखें छलक आईं। अगले ही पल उसने खुद को संभालते हुए कहा, “गलती मेरी है, मैं सिर्फ अपने बारे में सोचने लगी थी, तुम क्या सोचते हो, क्या चाहते हो, इसके बारे में मैंने कभी सोचा ही नहीं।”

“ऐसा मत कहो सरगम, हम अच्छे दोस्त बने रह सकते हैं।”

“मेरे लिए ये अब मुश्किल होगा देवदूत। अब परदेस में मेरा गुजारा नहीं हो सकेगा। अब मैं अपने देश जाना चाहती हूं मां के पास। देवदूत जीवन में कुछ समय के लिए आ सकते हैं, लेकिन वो आपकी जिंदगी नहीं बन सकते। मेरी जिंदगी से लौट जाओ देवदास।

- शोभा बंसल

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