E-इश्क:आराधना के गालों में लाली दौड़ गई, जो हरदम उसके ख्यालों में रहता है वो सामने खड़ा है

7 महीने पहले
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आराधना मनसा देवी के दर्शन कर बाहर चबूतरे पर बैठ सामने के नजारों में खो गयी। कुछ देर बाद वही चिरपरिचित आवाज कानों में पड़ी, “आराधना, तुमने होम वर्क कर लिया है तो मुझे कॉपी दे दो। पता है, आज हॉकी के कोच क्या बोले? कह रहे थे, नीलेश यदि तुम इसी तरह खेलते रहे, तो जल्द ही नेशनल लेवल जूनियर हॉकी टीम में चुन लिये जाओगे।”

नीलेश हमेशा ही साइकिल पर हॉकी टांगे स्टेडियम से सीधे उसके घर पहुंच जाता। आधे घंटे वही बैठकर अपना होमवर्क करता और उसे कोई न कोई नया मजेदार किस्सा सुना कर चल पड़ता।

वो रोज स्कूल से आकर अपना होमवर्क समाप्त कर अपनी दो चोटियां गूंथती, आंखों में काजल लगा उसके इंतजार में बैठ जाती। किसी दिन होमवर्क न होने पर भी वो रुकता, खेल के मैदान के किस्से सुनाता और चल पड़ता। नवी, दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई यूं ही चलती रही। पहले नीलेश को जूनियर हॉकी टीम का चस्का था, फिर फौज में भर्ती होने का लग गया। उसका दोनों में ही चयन न हो सका।

आराधना का मेडिकल में चयन हो गया और वो बिजनौर छोड़कर आगरा मेडिकल कॉलेज चली गयी। आराधना के बाल रोग विशेषज्ञ बनने की प्रक्रिया पूर्ण होने तक नीलेश का परिवार बिजनौर छोड़ कर जा चुका था। आराधना अपने प्यार के साथ अतीत में ठहर कर रह गई। अपने शहर में उसने बेहतरीन बाल चिकित्सक के रूप में अपनी पहचान बना ली है। फिलहाल वह पैंतालिस की वर्ष उम्र में अपने माता-पिता और क्लीनिक के साथ संतुष्ट जीवन जी रही है। उसकी कल्पनाओं में अक्सर नीलेश का अक्स तैरता रहता है। जब भी फुर्सत में होती, पुरानी यादों में गोते लगा लेती और उसके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर जाती। आज भी अपने भाई-भाभी के साथ हरिद्वार आई है, मगर एकांत होते ही उसकी कल्पनाओं में नीलेश अपनी साइकिल पर बैठ आ धमकता।

“दीदी, अच्छे से दर्शन हो गये। अभी समय है, थोड़ा ऋषिकेश भी घूम लें?” रितिका ने अपनी ननद आराधना से कहा।

आराधना ने पीछे मुड़कर मंदिर में हाथ जोड़े और मन ही मन प्रार्थना की, “मां, यहां आकर सभी के मन की कामना पूर्ति हो जाती है, मेरे मन की कामना भी पूर्ण कर दो। एक बार ही सही, उसकी झलक दिखा दो।” फिर मन ही मन मुस्कुरा उठी, यह कामना तो उसके मन में बरसों से मचल रही है।

कुछ कदम चलते ही उसकी नजर पंडित से कलावा बंधाते पुरुष पर पड़ी। वो चिहुंक पड़ी, नीलेश जैसा दिख रहा है, पर वो नहीं है। उसकी कल्पनाओं का नीलेश तो किशोरावस्था में ही अटक कर रह गया है।

नीलेश ने उसके भाई को पकड़ कर कहा, “धीरज पहचाना नहीं, मैं नीलेश, बिजनौर में था पहले।”

आराधना के गालों में लाली दौड़ गयी। जो हरदम उसके ख्यालों में रहता है वो सामने खड़ा है। क्या कहे? कहां से शुरुआत करें?

हमेशा की तरह नीलेश ने अपनी बीती जिंदगी का पन्ना खोल कर रख दिया। उसकी पत्नी पिछले वर्ष कैंसर से झूझते गुजर गयी, उसका देहरादून में सफल बिजनेस है, उसके किशोर उम्र के दो बेटे हैं। सबका आपस में फोन नंबर का आदान प्रदान हुआ और सभी अपने गंतव्य की ओर चल पड़े।

आराधना के फोन में रोज ही गुड मॉर्निंग, गुड नाइट के मैसेज आने लगे। फिर अपने किशोरवय बेटों की समस्याओं पर राय ली जाने लगी और चार महीने बीतते न बीतते नीलेश ने विवाह करने का प्रस्ताव रख दिया।

आराधना उलझन में पड़ गयी। ये वो नीलेश नहीं है जो उसकी यादों में बसा है- स्वछंद, हंसता-हंसाता, ये तो किशोर उम्र बेटों का पिता है, जिसे अपने बेटों की परवरिश के लिये सुघड़ मां चाहिए। अगर शादी के बाद नीलेश के परिवार में रच-बस न सकी तो कड़वी यादों के साथ अलग होना पड़ जायेगा, न हुई तो घुट-घुटकर जीवन जीना पड़ेगा। उसकी पुरानी मीठी यादें भी नीलेश के वर्तमान के सामने दम तोड़ देंगी। क्या करे?

दो हफ्ते लग गये उसे जवाब देने में, मगर उसने जवाब में लिख ही दिया, “मैंने आज तक शादी इसीलिए नहीं की, क्योंकि मैं किसी को अपने से भी ज्यादा प्यार करती हूं। वो आज भी मेरे सपनों में आता है, मुझसे ढेर सारी बातें करता है। शायद तुम्हें यह पढ़कर अजीब लगे, लेकिन उम्र के इस पड़ाव में अपने रूटीन को बदलना मेरे लिये बहुत मुश्किल होगा। तुम्हें अपने घर-परिवार के लिए सुघड़ गृहणी की जरूरत है, कोशिश करने पर मिल ही जाएगी, लेकिन मेरे शहर के मरीजों से एक समर्पित डॉक्टर छिन जाएगी। कभी भी कोई समस्या हो तो निःसंकोच कहना।” मैसेज लिखकर उसने चैन की सांस ली और आंखें बंद कर लीं। सामने से साइकिल पर पैडल मारता, पसीने से भीगा नीलेश चला आ रहा था।

- दीपा पाण्डेय

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