लड़की रात में छत पर पहुंच जाती:पहले प्रवीण को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन पीहू के मन की बात जानकर वह हैरान रह गया

5 महीने पहले
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डिनर करने के बाद रात को छत पर वॉक की प्रवीण की आदत थी। आज प्रवीण जल्दी छत पर आकर वॉक करने लगा। सामने की छत पर भी दो लड़कियां खड़े होकर बातें कर रही थीं। कभी थोड़ा चलती कभी रुक जातीं। बीच-बीच में प्रवीण की तरफ मुड़कर देखतीं।

आज ज्यादा देर तक वॉक कर लिया। अब पढ़ाई करनी है, यह सोचकर प्रवीण जल्दी जल्दी नीचे उतरा और पढ़ने के लिए बैठे गया।

दूसरे दिन सुबह तैयार होकर कॉलेज जाने को जैसे सीढ़ियां उतरना शुरू किया तभी सामने से रातवाली लड़की भी नीचे आ रही थी। वह प्रवीण को देखकर हल्का सा मुस्कुराई। प्रवीण भी मुस्कुराया। प्रवीण ने नोटिस किया कि रात वाली लड़की तो बहुत सुंदर है। वह उसके बारे में जानने को उत्सुक हो गया।

कॉलेज से आने के बाद प्रवीण ने अपने रूममेट पांडे से बात की, “भाई, सामने वाले फ्लैट में कौन लोग रहते हैं?”

पांडे ने जवाब देने के बजाय सवाल पूछ लिया, “तुम्हें 'लोगों' से मतलब है या किसी ‘खास’ से?”

प्रवीण हंसते हुए बोला, “तुम तो हमेशा उल्टी बात सोचते हो।”

रात को डिनर के बाद फिर से वॉक करने प्रवीण ऊपर गया। सामने दोनों लड़कियां टहल रही थीं। प्रवीण वॉक करने लगा।

थोड़ी देर बाद एक ने कहा, “हेलो!”

प्रवीण ने भी 'हेलो' कहा।

छोटी वाली लड़की ने पूछा, “आप क्या करते हैं?”

प्रवीण बोला, “पढ़ाई करता हूं, कॉलेज में लास्ट ईयर है।”

“ओके।”

फिर प्रवीण ने पूछा, “आप क्या कर रही हैं?”

“मेरा बोर्ड का पेपर है इस बार।”

“आपका नाम?”

“मैं प्रियंका हूं, ये मेरी बड़ी बहन पीहू है। पीहू मेडिकल की प्रिपरेशन कर रही है।”

“वाह! बहुत बढ़िया।”

थोड़ी देर और बातचीत होती, तभी नीचे से आवाज आई, 'बेटा, आ जाओ नीचे।' प्रियंका ने हाथ हिलते हुए बोला, “गुड नाइट भैया।” पीहू भी मुस्कुराती हुई नीचे चली गई। प्रवीण उन्हें जाते हुए देखता रहा। थोड़ी देर बाद प्रवीण भी नीचे आया गया।

अगली सुबह प्रवीण दूध लेने गया, तो लौटते वक्त उसे रास्ते में पीहू मिली। प्रवीण को देख वह मुस्कुराती हुई चली गई।

प्रवीण अब कुछ-कुछ समझ गया था। उसने महसूस किया कि वह पीहू कि तरफ खिंचा चला जा रहा है। अब उसे पीहू से बात करने की चाहत होने लगी। रोज रात को छत पर वॉक करने का सिलसिला चलता रहा।

एक दिन प्रवीण छत पर वॉक कर रहा था। सामने देखा तो आज पीहू अकेले छत पर आयी थी। वह नजरें बचाकर प्रवीण की तरफ देख रही थी। प्रवीण पीहू की तरफ आगे बढ़ा और दोनों ने एक दूसरे की आंखों में देखा। सफेद लाइट के झक प्रकाश में पीहू का चेहरा चमक रहा था। प्रवीण की धड़कन बढ़ गई। दोनों ने कुछ कहा नहीं। थोड़ी देर बाद दोनों नीचे चले गए।

दूसरे दिन भी पीहू अकेली ही थी। आज प्रवीण ने हिम्मत की। वह अपना मोबाइल नंबर छोटे से कागज के टुकड़े पर लिख कर नीचे से जल्दी जल्दी लेकर आया। रास्ते में पांव फिसलते-फिसलते बचा।

छत पर आकर प्रवीण ने पहले इधर-उधर देखा। जब तसल्ली हो गई कि आसपास कोई नहीं है, तब उसने वह पर्ची पीहू की तरफ फेंकी। पीहू ने झुक कर उस पर्ची को जल्दी से उठा लिया। पर्ची को बिना खोले पीहू सीधे नीचे उतर आई।

प्रवीण थोड़ा घबराया। तभी उसके मोबाइल की रिंग बजने लगी। उसने देखा लैंड लाइन से फोन आया है।

“हेलो… हेलो…” दो-तीन बार कहने के बाद भी उधर से कोई आवाज नहीं आई। प्रवीण ने एक बार फिर से ‘हेलो’ कहा। इस बार दूसरी तरफ से धीरे से आवाज आई, “हेलो, मैं पीहू।” अब तो प्रवीण की आवाज चली गई। कुछ सेकंड बाद प्रवीण बोला, “हां, अब बातचीत हो सकती है।”

तभी पीहू बोली, “कल बात करूंगी, पापा ऑफिस से आ गए हैं।”

“ओके” कहते हुए प्रवीण जैसे पीहू के ख्यालों में खो गया।

आज प्रवीण की खुशी का ठिकाना नहीं था। अगले दिन जल्दी-जल्दी तैयार होकर प्रवीण कॉलेज गया। कॉलेज में ही पीहू का फोन आया। अभी प्रवीण क्लास में था। उसने फोन कट कर दिया।

पीहू ने दुबारा फोन किया। तब प्रवीण को मोबाइल साइलेंट करना पड़ा। क्लास के बाद उसने उस नंबर पर फोन किया, लेकिन तब पीहू की मम्मी ने फोन उठाया। उसे फोन रखना पड़ा।

थोड़ी देर बाद फिर पीहू का फोन आया। बातचीत के दौरान प्रवीण ने पूछा, “क्या हम मिल सकतें हैं?”

पीहू ने कहा, “कल मैं आपके कॉलेज आती हूं।”

“ठीक है,” कहकर प्रवीण ने फोन तो रख दिया, लेकिन उसका दिल खुशी से जैसे उछल रहा था।

सुबह अच्छे कपड़े पहनकर प्रवीण कॉलेज के लिए निकला। उसे याद ही नहीं रहा कि आज उसका क्लास टेस्ट है। कॉलेज जाकर उसे ध्यान आया कि उसने तो कुछ भी पढ़ा नहीं। फिर भी टेस्ट ठीक-ठाक हो गया।

क्लास से बाहर निकलकर वह पीहू का इंतजार करने लगा। पीहू के पास मोबाइल नहीं था। उसने घर पर फोन किया, पीहू ने फोन रिसीव किया। प्रवीण ने पूछा “आप निकली नहीं?” पीहू ज्यादा बात नहीं करना चाहती थी, “बस थोड़ी देर में,” कहकर उसने फोन रख दिया।

प्रवीण को अब कम से कम एक घंटे तक इंतजार करना पड़ेगा। उसके लिए समय काटना मुश्किल हो रहा था। कभी कैंटीन में जाकर बैठता तो कभी लाइब्रेरी के बाहर से चक्कर लगा कर वापस आ जाता।

प्रवीण अब गेट के बाहर जाकर इंतजार करने लगा। घंटेभर से ज्यादा हो गया था। थोड़ी देर में एक ऑटो उसके पास आकर रुकी। अंदर से पीहू निकली। उसने बड़े अदब से प्रवीण की तरफ देखा। फिर पीहू ने अपने हाथ में प्रवीण का हाथ लेकर हल्के से दबाया। प्रवीण को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने देर से आने के लिए माफी मांगी हो। कैसे कई बार शब्द कहे बिना स्पर्श से ही सारी बातें कही जा सकती हैं।

ये पहला एहसास था। पहले दोनों कैंटीन गए, चाय पीकर वहां से निकले। फिर दोनों ने बस पकड़ी और घर की तरफ चल पड़े। बस में दोनों साथ बैठे। इस बार प्रवीण ने उसके हाथ को अपनी उंगलियों से छूना चाहा, पर पीहू ने धीरे से अपने हाथ को अलग कर लिया। पीहू ने इशारे से प्रवीण को बताया कि सब देख रहे हैं।

अब दोनों रोज ही मिलने का कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते। दोनों एक दूसरे के बिना रह नहीं पाते।

चार-पांच महीने गुजर गए। पीहू के घर के लोग किसी काम से तीन-चार दिनों के लिए गांव गए। पीहू के दादा जी की तबियत खराब थी। उन्हें देखने मम्मी- पापा को अर्जेंट जाना पड़ा। उनका गांव भी पास में ही था। शाम को पीहू ने मौका देखकर प्रवीण को घर पर खाने के लिए बुलाया। बगल वाले फ्लैट में पीहू के गांव के अंकल रहते थे।

पीहू के घर जाकर प्रवीण को बहुत अपनापन लगा। प्रियंका पानी का गिलास लेकर आई और बोली, “भैया पानी।”

तभी पीहू बीच में बोल पड़ी, “भैया?”

प्रियंका ने तुरंत ‘सॉरी’ कहा तो तीनों हंस पड़े। तीनों ने साथ डिनर किया।

प्रवीण अपने घर जाने को उठा, तभी पीहू ने कहा, “आइए, आपको अपना कमरा दिखाती हूं।”

कमरे की सजावट देखकर प्रवीण के कहा, “बहुत सुंदर डेकोरेट कर रखा है कमरा।”

पीहू ने बाहर झांक कर देखा, तो प्रियंका हॉल में थी। मौका देखकर वह धीरे से प्रवीण के गले लग गई। प्रवीण ने पीहू के माथे को चूमा। दोनों ने एक दूसरे को प्यार से थपथपया और बाहर चले आए।

- पंकज कुमार चौबे

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