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E-इश्क:जयपुर से दिल्ली आई और यहीं पर मिल गया दिल, सुबह उठी तो चेहरे पर रौनक थी, मुझे अपना प्यार मिल चुका था

13 दिन पहले
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कॉलेज से लौटते वक्त सोचा घर के लिए सब्जी भी लेते चलूं। सब्जियां खरीद ही रही थी कि तभी किसी ने पीछे हाथ रखा। मैं एकदम से सहम गई। मुड़कर देखा तो लगा कि जिंदगी भी न जाने किस मोड़ पर आ खड़ी हुई।

हां, वह विजय ही तो था। उसने मुझसे कहा, “गायत्री, पहचाना? मैं वही…” कहते-कहते उसके लफ्ज न जाने क्या सोचकर थम गए।

मैंने कहा, “अरे विजय, क्या से क्या हो गए! तुम तो पहचान में ही नहीं आ रहे हो। कितना बदल गए हो। लंबे बाल, घनी मूंछे और अस्त-व्यस्त से...। पहले तो तुम अपनी फिटनेस पर और लुक्स पर बहुत ध्यान देते थे। घंटों जिम में पसीना बहाते और पार्क में रनिंग करते थे। फिर ऐसा क्या हुआ, जो तुम ऐसे हो गए?” मैं हैरानी से उसे देखे जा रही थी।

विजय ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुरा दिया मुझे देखकर।

इतने सालों बाद मिले थे हम। मैं उससे ढेर सारी बातें करना चाहती थी। मैंने तुरंत उससे कहा, “आओ, घर चलते हैं, वहीं इत्मीनान से खूब सारी बातें करेंगे, अपने कॉलेज के दिनों की।”

मैं बातें किए जा रही थी और विजय कुछ बोल ही नहीं रहा था।

मैंने फिर टोका, “अरे बाबा! क्या हुआ, कुछ बोल क्यों नहीं रहे हो?”

विजय ने कहा, “कुछ नहीं, बस यूं ही... घर मत ले चलो, यहीं पास के रेस्तरां में बैठकर कॉफी पीते हैं, वहीं बैठकर बातें कर लेंगे।”

मैंने उसकी बात मान ली और हम पास ही के एक रेस्तरां की ओर चल दिए।

“अच्छा विजय, एक बात बताओ, कॉलेज के बाद तुम अचानक से कहां चले गए थे? न किसी को कुछ बताया, न किसी का हालचाल लेने की कोशिश की। अब अचानक से मिले भी तो जयपुर से दूर दिल्ली में।”

विजय ने कहा, “अरे, पहले कॉफी तो पिलाओ, फिर तुम्हारे सारे सवालों का जवाब दूंगा।” “लो आ गया कॉफी शॉप, यहीं बैठ जाते हैं। कुछ तुम कहो... कुछ मुझसे सुनो...।”

हम दोनों एक टेबल के आमने-सामने बैठ गए।

“अब बताओ…” मैंने फिर से विजय से उसके बारे में जानने की कोशिश की।

“जयपुर के कॉलेज का वो लड़का, जिस पर सब लड़कियां मर मिटती थीं, वो अचानक से कहां गायब हो गया? तुम्हारे जाने के बाद न मालूम कितने किस्से बुने गए। कोई कहता, तुमने अपने पैतृक शहर बीकानेर जाकर जिम पॅाइंट खोल लिया है, तो किसी ने कहा- तुम्हारे घर में किसी को कुछ हो गया है, इसीलिए अचानक चले गए,” उसके बारे में जानने की उत्सुकता के साथ-साथ मैं उसे वो किस्से भी सुनाने लगी, जो उसके जाने के बाद घटे थे।

विजय बोला, “बताता हूं, सब्र रखो, बहुत सी बातें हैं... जो आज करनी हैं।”

तभी आवाज आई, “सर आप लोग क्या लेंगे... चाय, कॉफी और साथ में कोई स्नैक्स?”

गायत्री तुरंत बोल पड़ी, “भाई, तुम हमें बढ़िया सी कॉफी पिला दो...और कुछ नहीं।”

सर्दियों की खूबसूरत शाम में गर्मागर्म कॉफी पीते हुए बातें करना बहुत अच्छा लग रहा था। विजय ने बताया कि वह कैसे दिल्ली आ गया। नोएडा में एक मल्टीनेशनल कंपनी में जाॅब करने लगा। वहीं, गायत्री ने भी दिल्ली के एक कॉलेज से पीएचडी की और उसी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर बन गई थी।

दोनों के बीच लंबी बात हुई, मगर कुछ देर बाद ही बात जहां से शुरू हुई थी, वहां आकर फिर ठहर गई। मैंने फिर पूछा, “बताओ विजय, क्या हुआ उस दिन, जब तुम अचानक से कॉलेज छोड़कर क्यों चले गए थे?”

“ओके, तो सुनो... उस दिन मैं जिम से लौटकर आया ही था कि मुझे फोन आया कि पापा को हार्ट अटैक आया है और वह अस्पताल में भर्ती हैं। मैं तुरंत वहां से चल दिया। घर पहुंचा तो पता चला पापा नहीं रहे। इसके बाद मेरी जिंदगी में जैसे तूफान ही आ गया। सब कुछ तहस-नहस हो गया। दो बहनों के बीच मैं सबसे बड़ा और इकलौता भाई। मां भी बुजुर्ग हो गई थीं... तो मुझे सब कुछ संभालना पड़ा। पापा के जाने के बाद घर चलाने के लिए मैं सबको लेकर दिल्ली आ गया और यहां एमबीए में दाखिला लिया और साथ में छोटी-मोटी नौकरी भी करने लगा। जैसे-तैसे घर की गाड़ी चलने लगी। उसके बाद मैंने दोनों बहनों की शादी की। इस बीच, मेरी जॉब ग्रेटर नोएडा में एक अच्छी कंपनी में लग गई। बस...अपनी तो यही जिंदगी है… तुम बताओ, तुम्हारी कैसी चल रही है?” अब विजय मेरे बारे में जानना चाहता था।

मैंने उसे बताया, “मेरी लाइफ भी बढ़िया चल रही है। पापा का दिल्ली ट्रांसफर हो गया तो मैं भी वहां से निकलकर दिल्ली आ गई। तब से यहीं पर नौकरी कर रही हूं। शादी के लिए रिश्ते भी आ रहे हैं। देख रही हूं, कोई मन का मिल जाए तो कर लूंगी उससे शादी।”

अब मुझे विजय की लाइफ पार्टनर के बारे में जानने की उत्सुकता हुई, मैंने उससे अगला सवाल यही पूछा, “अच्छा ये बताओ विजय, तुमने शादी की या फिर अभी तक वैसे ही हो? सुना था कॉलेज में किसी लड़की को तुम बहुत चाहते थे, मगर किसी को अपने दिल की बात बताए बिना ही गायब हो गए।”

“हां, चाहता तो था बहुत एक लड़की को, मगर उससे कभी कहने की हिम्मत नहीं हुई। फिर जब जिंदगी में उथल-पुथल मची तो हिम्मत और टूट गई।”

“अरे वाह!” अब मैं उस लड़की के बारे में जानना चाहती थी।

मैंने उत्सुकता से विजय से पूछा, “अब बता भी दो, आखिर वो दिल चुराने वाली कौन थी? अब तो कई साल बीत गए... न जाने वो कहां होगी और तुम कहां आ गए हो।”

“नहीं गायत्री, वो आज भी वैसी ही है। उसे अपने दिल की बात बताकर मैं उस पर कोई प्रेशर नहीं डालना चाहता। हर किसी की अपनी जिंदगी होती है। वह चाहे जैसे रहे। मैं उसे देखकर ही खुश हूं।”

गायत्री बोली, “अजीब पागलपन है! ऐसा भी क्या प्यार जो बताया न जाए, जताया न जाए। कुछ ताे हिंट दो, कौन थी वो?”

“नहीं गायत्री, इतना जान लो कि कोई है अपनी जिंदगी में, जो आज भी वैसी ही है... उसे देखकर मुझे आज भी उतना ही सुकून मिला है... मैं तो बस ऐसा ही हूं। हां, अगर उसने मेरे दिल की बात सुन ली तो शायद वो मुझे मिल जाए।”

“ कुछ कहो तो…” मैंने उससे कहा।

जवाब में विजय मुझे देखकर सिर्फ मुस्कुरा दिया।

मैं खीझ उठी और बोली, “अच्छा ठीक है, मुझे तुम्हारी बातें बिल्कुल समझ में नहीं आईं... एकदम सिर के ऊपर से गुजर गईं। चलो, ये मेरा नंबर ले लाे, हम बात करते रहेंगे और मिलेंगे भी। इस बार तुम्हें मेरे घर आना पड़ेगा। मां-पापा तुम्हें देखकर खुश होंगे।”

“ओके, ठीक है गायत्री। बॉय...मिलते हैं।”

विजय के जाने के बाद मैं घर आ गई। खाना खाने के बाद सोने गई तो नींद नहीं आ रही थी। विजय की बातें याद आ रही थीं। उसका जिम में बॉडी बनाना और लड़कियों की मदद करना मुझे भी अच्छा लगता था, पर मैंने कभी प्यार-व्यार के बारे में सोचा ही नहीं। फिर एक बात समझ में नहीं आई, कॉलेज में कौन सी लड़की थी, जिसे वो प्यार करता था। क्या उस लड़की को भी नहीं पता था... आज विजय ने कैसे अपनी बातें बताईं... अपने प्यार के बारे में भी... आज भी उसे देखकर उतना ही सुकून मिला है… वो किसके बारे में बात कर रहा था, उसे तो मैं ही मिली थी... तो क्या…वो लड़की मैं थी..?

गायत्री को पूरी रात नींद नहीं आई। सुबह उठी तो उसके चेहरे पर एक गजब की रौनक थी। उसे विजय की कल की गहरी मुस्कुराहट का मतलब समझ आ गया था। शायद दोनों को अपना प्यार मिल चुका था।

- जागृति त्रिपाठी

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