पति से धोखा:गिरीश के शहर छोड़ते ही चारु उससे मिलने चली जाती, शादी के बाद भी उससे मिलने का मोह वह नहीं छोड़ पाई

2 महीने पहले
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पुरानी डायरी का पहला पन्ना खोलते ही जिंदगी का पन्ना खुल सा गया। उसने डायरी खोली और डायरी के बीचोंबीच पेन रखकर कुछ सोचने लगी कि शायद मिलन उस पन्ने पर उसका नाम लिखेगा। कुछ पल सोचने के बाद वो पेन को डायरी के बीच फंसाकर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। वह भी कुर्सी से उठकर खड़ी हो गई।

उसने डरते डरते पूछा, “क्या बात है मिलन?” वह यानी चारु। बैंक में एक जूनियर क्लर्क।

बिना कुछ कहे-सुने मिलन कमरे से बाहर निकल गया। वो कैशियर था। चारु उसे काफी दिनों से पसंद करती थी। वह ये नहीं जानती थी कि मिलन उसे कितना पसंद करता है, लेकिन इतना जरूर जानती थी कि वो भी चारु से मिलने के लिए उतना ही उत्सुक रहता है जितना चारु होती है।

‘शायद उसे बॉस का काम याद आ गया होगा इसलिए उठकर चला गया,…’ चारु सोचने लगी। न जाने वो डायरी में क्या लिख रहा था या क्या लिखना चाह रहा था, चारु कुछ समझ नहीं पाई। यह भी तो हो सकता था कि वो ऑफिस के रुपए-पैसे का हिसाब-किताब लिखने जा रहा हो।

इसके बाद उसने मिलन से कोई प्रश्न भी नहीं किया। चुपचाप उठी और अपने कमरे में आ गई।

मिलन को चारु के परिवार का हर सदस्य पसंद करता था।

एक बार उसकी बड़ी बहन ने कहा भी था, “यदि मिलन से तेरी शादी हो जाए तो तुम दोनों की जोड़ी कितनी सुंदर होगी!”

चारु को दीदी की बातें बहुत अच्छी लगती थीं, लेकिन उसे समझ में नहीं आता था कि मिलन उसकी बातों को गंभीरता से समझने के बजाय उसे ही क्यों समझाना चाहता था!

चारु जब भी पहल करती तो मिलन का यही जवाब होता, “दोस्ती अलग चीज है और शादी बिल्कुल अलग।”

‘हो सकता है मिलन सही कह रहा हो,’ चारु खुद को तसल्ली देने लगी।

फिर मन में खयाल आया कि अब तक शायद मिलन कमरे में वापस लौट आया होगा।

वह अनमने मन से उठी और मिलन के कमरे तक पहुंच गई। कमरा खाली था। मिलन कमरे में नहीं लौटा था। डायरी में फंसी पेन अभी भी टेबल पर रखी थी।

उसने टेबल पर रखी डायरी को उठा लिया। जहां पेन फंसा था, उस पन्ने को उसने खोलकर देखा। हाशिए पर उसका नाम लिखा था- चारु।

हाशिए पर अपना नाम देखकर चारु बुरी तरह चौंक गई। वह सोचने लगी, मिलन ने पन्ने पर लिखने के बजाय हाशिए पर उसका नाम क्यों लिखा? उसके दिल-दिमाग के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। दिल कहता ‘ये गलत है, लेकिन दिमाग कहता,’हाशिए पर ही सही, कहीं तो जगह मिली। आज हाशिए पर जगह मिली है, हो सकता है, कल डायरी के हर पन्ने पर उसका नाम हो।’

काफी देर तक जब मिलन नहीं आया तो डायरी फिर से टेबल पर रखकर चारु अनमने मन से अपना काम समेटकर बाहर निकल गयी।

घर के किसी काम में उसका मन नहीं लग रहा था। उसे अकेले बैठना अच्छा लग रहा था।

तभी उसने भाई को मां से बात करते सुना, “क्या हुआ? चारु से बात की?”

“मैंने अभी उससे बात नहीं की है। कल-परसों छुट्टी है तब उससे बात करूंगी,” मां ने भाई को टाल दिया।

लेकिन चारु जानती थी कि मां उससे क्या बात करनेवाली हैं?

रात में चारु मां के पास सोती थी, लेकिन मां उससे रात में बात न करें इसलिए उसने भाभी के पास सोने का निर्णय लिया।

मां ने भाभी से कहा भी कि चारु को मेरे कमरे में भेज दो, लेकिन भाभी ने बात संभाल ली।

भाभी ने मां से कहा, “मुझे लगता है चारु की तबियत ठीक नहीं है, उसे मेरे कमरे में ही सोने दीजिए। वैसे भी इसके भैया टूर पर गए हैं, मैं अकेले सोऊँगी।”

मां मान गईं।

कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। उसने अपने पैर पेट में मोड़ रखे थे। उसे नींद कब आ गयी पता ही नहीं चला। भाभी ने उसे ठंड से ठिठुरते हुए देखा तो एक चादर उसके ऊपर डाल दी। रात में उसने करवट बदली और पैरों को सीधा किया, तो पैर चादर से बाहर निकल गए। चारु ने सोचा, उसने शायद चादर ठीक से नहीं ओढ़ी है इसलिए उसने चादर को उठाकर फिर से ओढ़ा। फिर भी उसके पैर चादर से बाहर ही निकले हुए थे। अब सिकुड़ कर सोने के अलावा उसके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। वो पूरी रात उस चादर में सिकुड़ कर सोई रही।

उसके मन में विचार आया कि औरत सिकुड़ने की आदत न भूल जाए शायद इसीलिए समाज ने उसकी चादर छोटी कर दी है। चारु को ये एहसास कराने के लिए उसके घरवालों ने भी ये प्रयोग उस पर कर दिया। क्या भाभी ये नहीं जानती होंगी कि ये चादर छोटी है?

सुबह चारु की लाल आंखें देखकर भाभी ने पूछा, “रात में कोई तकलीफ तो नहीं हुई चारु?”

“नहीं, बस मैं पैर नहीं पसार पायी।”

“वैसे भी औरतों को पैर नहीं पसारने चाहिए, अपनी हद में रहना चाहिए।”

भाभी अपने रोजमर्रा के काम में व्यस्त हो गईं।

चारु समझ गई कि उन्होंने जानबूझकर उसे छोटी चादर दी थी। उसकी ‘हां’ पर एक तरफ परिवार की खुशी थी और दूसरी ओर उसके दिल का टूटना था।

चारु की ‘हां’ और ‘ना’ दोनों ही स्थितियां मिलन की ‘हां’ और ‘ना’ पर निर्भर थीं।

उसने तय कर लिया कि अब जल्दी ही उसे ये निर्णय लेना होगा कि वो ‘हां’ कहे या ‘ना’ कहे।

मिलन बैंक से लाए रुपए गिन रहा था। चारु खामोशी से उसे निहार रही थी। कुछ देर बाद उसने सारी नगदी लॉकर में रख दी और तिजोरी बंद करते हुए बोला, “हां, बोलो क्या बात है?”

चारु बोली,”मिलन, मुझे तुम्हारी ‘हां’ या ‘ना’ सुननी है।”

वह बोला, “चारु, मैं अपने घर में बहन और भाइयों से उम्र में छोटा हूं। मुझ से पहले मेरे दो बड़े भाई और एक बहन का नंबर है। मान लो, यदि मैं उनसे पहले शादी कर लेता हूं, तो समाज में मेरे घर वालों के सामने मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।”

उसने मना नहीं किया, लेकिन ‘हां’ भी नहीं की।

उसे लगा, शायद वह छोटी चादर में पैर पसारने की कोशिश कर रही थी। उसे तुरंत भाभी के कमरे में गुजारी रात याद आ गई। समय ने उसे मजबूर कर दिया। उसने घरवालों की मर्जी में अपनी मर्जी को शामिल कर लिया।

नियत समय और तिथि पर उसकी शादी गजेटेड ऑफिसर गिरीश से कर दी गई।

वह खुश थी, लेकिन ऑफिस में आने के बाद, मिलन के सामने पड़ते ही पुरानी यादें ताजा होने लगीं।

समय ने परिस्थितियां निर्मित कर दीं। परिस्थितियां भी ऐसी जिन्हें टाला नहीं जा सकता था।

गिरीश का ट्रांसफर राज्य के बंटवारे के कारण छत्तीसगड़ हो गया। मजबूरन पति को जाना पड़ा।

व्यक्ति जब दूर चला जाता है तो दिल से भी दूर होता चला जाता है। शायद यही कारण था कि पति की अनुपस्थिति से उपजे हुए खालीपन को मिलन ने भरना शुरू कर दिया। पति महीने में एक या दो बार ही आ पाते थे। उन दिनों चारु नॉर्मल रहने की कोशिश तो करती, लेकिन उनके जाने के बाद खुद को आजाद भी महसूस करती।

लताओं को ऊपर चढ़ने के लिए ठोस आधार की जरूरत होती है। चारु खुद को उस लता की तरह महसूस कर रही थी, उसके सामने मिलन एक ठोस आधार था, लेकिन कब तक? ये सवाल उसके सामने खड़ा था।

गिरीश को शायद ये महसूस हो गया था कि चारु उन्हें अब उतना महत्व नहीं दे रही जितना उसे देना चाहिए। इसीलिए अब उन्होंने भी दो महीने के बजाय घर आने की अवधि बढ़ा दी। पति की मौजूदगी में चारु के लिए मिलन के साथ समय बियाना मुश्किल हो गया।

वक्त के साथ जैसे-जैसे गृहस्थी की जिम्मेदारियां बढ़ने लगीं, चारु की जिंदगी में मिलन के लिए समय कम होने लगा।

नौकरी छोड़ते ही चारु के पास मिलन से मिलने की कोई वजह नहीं बची।

साल-दर-साल वक्त गुजरता गया, चारु के मन में मिलन की तस्वीर धुंधली पड़ती गई।

मिलन की डायरी चारु ने कब अपनी अलमारी में लाकर रख डी, उसे खुद भी याद नहीं था।

वर्षों बाद आज जब चारु फिर से अपनी अलमारी साफ कर रही थी, तो उसे मिलन की पुरानी डायरी मिली।

उसने खोलकर देखा, तो पूरी की पूरी डायरी खाली थी। सिर्फ हर पन्ने के बीचोंबीच पेन की नोक रखे जाने का बिंदु नजर आ रहा था, जिससे ये एहसास हो रहा था कि व्यक्ति ने पेन को काफी देर तक रखकर कुछ लिखने की कोशिश की, लेकिन हौसला न जुटा पाने के कारण हर पन्ने के हाशिए पर सिर्फ चारु का नाम ही लिख पाया।

मिलन के फैसले से चारु नाराज थी, लेकिन खुशी इस बात की थी कि हाशिए पर ही सही, उसे जगह तो मिली। गहरी सांस लेकर उसने डायरी का आखिरी पन्ना बंद कर दिया।

- पुष्पा भाटिया

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