E-इश्क:क्या उसे मेरे बारे में पता है, मुझे देखकर कहीं उसके सिर से इश्क का भूत उतर तो नहीं जाएगा?

5 महीने पहले
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सुबह सूरज की पहली किरणें जैसे ही बेला के घर की खिड़की पर आतीं, वह झट से खिड़की खोलकर सूरज की तरफ देखकर हौले से मुस्करा देती। ये उसका रोज का काम था, लेकिन कुछ दिनों से वह सुबह खिड़की पर आने से हिचकिचाने लगी है। इसकी वजह है सामने की खिड़की वाला लड़का। बेला जैसे ही खिड़की खोलती और सूरज की तरफ देखने की कोशिश करती, उससे पहले ही सामने वाली बिल्डिंग की खिड़की से एक लड़के को अपनी तरफ देखते पाती। पहले उसे लगा यह महज संयोग है, लेकिन जब ऐसा रोज होने लगा तो वह असहज हो गई।

यह रोज की बात हो गई थी। वह लड़का बड़ी संजीदगी से उसे देखता रहता, इस उम्मीद में कि उसे देखकर बेला शायद मुस्करा दे, पर बेला ऐसा नहीं करती। कभी-कभी वह खिड़की की झीरी से आंख लगाकर देखती, तो पाती कि वह लड़का पहले से ही वहां इंतजार में बैठा है। वह उगते सूरज की किरणों देखने आती तो जरूर, पर झट से खिड़की बंद कर वापस लौट जाती। बेला ने यह भी देखा कि वह लड़का रोज एक तय समय पर अपना बैग पीठ पर टांगे बाइक लेकर निकल जाता था। वह सोचती, हो न हो यह लड़का किसी कॉलेज का स्टूडेंट है और रोज वहीं के लिए निकलता है।

उस दिन रविवार था। रोज की तरह बेला खिड़की खोलने गई, तो लड़का वहां दिखाई नहीं दिया। फिर लगातार तीन-चार दिनों तक वह नजर नहीं आया। बेला बेचैन हो गई। वह सोचने लगी कि उसे खिड़की पर न देखकर वह असहज क्यों हो रही है। उसने मन ही मन अपने आप से सवाल किया, ‘क्या मैं उसे चाहने लगी हूं?’

जब बेचैनी बढ़ने लगी, तो बेला ने उसी बिल्डिंग में रहने वाली अपनी खास सहेली सीमा को अपने मन की बात बताई। बेला को आश्चर्य तो तब हुआ जब सीमा बोली, “बेला, मुझे तुम्हारी लव स्टोरी के बारे में पहले से मालूम है। उस लड़के यानी सुमित को मैं अच्छी तरह जानती हूं। वह मुझसे कई बार कह चुका है कि वह तुम्हें चाहता है और तुमसे मिलना चाहता है।

बेला ने हैरानी से कहा, “तो तुमने ये सब पहले क्यों नहीं बताया?”

“मैं देखना चाहती थी कि क्या तुम्हारे अंदर भी उसके लिए चाहत है। चार दिन से जब वह दिख नहीं रहा है, तो तुम बेचैन होकर मुझसे पूछने आई हो। तुम भी उसे चाहने लगी हो बेला,” सीमा ने छेड़ते हुए कहा।

“सीमा, क्या उसे मेरे बारे में पता है? मुझे देखकर कहीं उसके सिर से इश्क का भूत उतर तो नहीं जाएगा?” बेला ने कहा।

सीमा बोली, “मैं नहीं जानती, लेकिन तुम एक बार मिल तो ले।”

दूसरे दिन जब सुबह बेला ने खिड़की खोली, तो सामने सुमित मुस्कुराता हुआ नजर आया। आज उसने भी सुमित को स्माइल दी और अंदर चली गई।

शाम को बेला और सीमा पार्क में धीरे-धीरे टहल रहे थे। पहले से ही मौजूद सुमित उन्हें देखकर खड़ा हो गया।

बेला ने देखा कि सीमा खुद ब खुद पीछे हो गई है। वह धीरे-धीरे सधे हुए कदमों से सुमित की तरफ कदम बढ़ाने लगी। बेला के मन में कई सवाल चल रही थी, “मुझ जैसी लड़की को देखकर सुमित के सिर से इश्क का भूत भाग तो नहीं खड़ा होगा।”

लेकिन यह क्या, सुमित उसके पास आया और अपने हाथ से सहारा देकर उसे बेंच पर बैठाते हुए बोला, “बेला, मैंने तुम्हें बहुत दिनों तक ढूंढा, लेकिन तुम्हारा पता नहीं मिल सका। तुम्हारे एक्सीडेंट हो जाने के बाद मैंने ही तुम्हें अस्पताल पहुंचाया था। सोचा था दूसरे दिन अस्पताल जाकर तुम्हारा हाल पूछूंगा, लेकिन मेरे पहुंचने से पहले ही तुम्हारे घरवाले केस बिगड़ने की वजह से तुम्हें उस अस्पताल से डिस्चार्ज कराकर इलाज के लिए बैंगलोर ले गए थे,” कहते हुए सुमित ने बेला का हाथ अपने हाथ में ले लिया। बेला को कुछ सूझ नहीं रहा था। उसने सुमित का हाथ अपने घुटने पर रखते हुए कहा, “सुमित, असलियत बहुत कडुवी होती है। लेकिन सामने खड़े सुमित उसे अपनी बांहों में समेट लिया और बोला, “लेकिन प्यार मीठा होता है।” बेला को लगा कि सुबह की सारी किरणें उसकी आगोश में समा गई हैं।”

- पी. एन. वर्मा

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