E-इश्क:पता नहीं क्यों उस दिन उसे इतनी घुटन महसूस हुई कि आंसुओं की झड़ी रोके नहीं रुक रही थी

19 दिन पहले
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“अरे सो गयी क्या?” राजेश की आवाज़ सुनकर उसने हड़बड़ा कर इधर-उधर देखा। याद आया लाइट चली गयी थी तब वो ऐसे ही बाहर बरामदे में आकर लेट गयी थी दीवान पर। आंख ऐसी लग गई कि मोमबत्ती जलाना ही भूल गयी "नहीं सोई नहीं।"

फिर उसने पूछा "खाना लगा दूं?"

"क्यों अभी तक लंच टाइम नहीं हुआ है क्या?"

उत्तर के व्यंग को सुने बिना उसने चौके में जाकर थाली परोसी और राजेश के सामने रख दी। राजेश ने एक बार भी उसे अपने साथ बैठकर खाना खाने के लिए नहीं तो वो अपने कमरे में आकार सोने की कोशिश करने लगी। लेकिन नींद तो आंखों से कब की टहल कर निकल चुकी थी। विगत धुल-पुँछ कर सामने आ गया था।

"अरे धन्नो रानी आ गयी," अचानक भाईसाहब का हंसता-मुस्कुराता चेहरा उसकी आंखों के सामने आ गया। पता नहीं क्यों वो उसके कई कई नाम रखते थे। रूपमती, सुनीति, और न जाने क्या क्या! नाम बिगाड़ने की उनकी पुरानी आदत थी। शालू को आलू,पूनम को नूपुर। गोल मटोल से छोटे भाई को मोदक राज, थे तो भाई साहब उसकी सहेली मिनी के बड़े भाई लेकिन, न जाने कब वो सभी बच्चों के भी भाई साहब बन गए थे। हंस कर कहते "भई तुम सबने तो मुझे जगत भाईसाहब बना दिया" और सभी बच्चे उनकी बात सुनकर, अपने मोती जैसे दाँत निकाल कर जोर-जोर से खिलखिलाने लगते।

उन दिनों वो बीएससी कर रहे थे लेकिन, कोई भी कभी भी उनसे, कैसा भी सवाल पूछता वो चुटकियों में हल कर देते थे। सभी बच्चों के लिए जैसे वो एक चलता-फिरता इनसाइकोपीडिया थे। पूरी गली में जिसके भी नंबर अच्छे आते तो, भाईसाहब की शाबाशी उसे जैसे, पुरस्कार स्वरूप जरूर मिल जाती थी। चिड़चिढ़ाते तो उनको कभी किसी ने नहीं देखा था।

भाईसाहब को नए नए खेल ईजाद करने में भी बड़ा मजा आता था। हर रोह बच्चे इंतज़ार करते कि कब छुट्टियां हों और भाई साहब उनके साथ खेलें! उन्हें किसी बच्चे का हारना कतई पसंद नहीं था। कोई बच्चा हारता तो वो अपना गेम उसे देकर उसे विजयी घोषित कर देते।

भाई साहब से दस वर्ष छोटी होने के बावजूद, वो पता नहीं कब, भाई साहब को कैसे पसंद करने लगी ? खेल-खेल में वो उन्हें संसार का सबसे आदर्श पुरुष मानने लगी थी। वो अक्सर उसे चिढ़ाते, “हमारी धन्नो रानी कहां ब्याह करेगी?"

वो उनके गले में बाहें डालकर कहती,"जहां बड़ा सा बंगला हो बड़ा गुसलखाना हों!" अपने घर के बाथरूम में, दरवाजा बंद करके नहाना उसे कतई अच्छा नहीं लगता था।

अगले दिन भाईसाहब उसे, सब बच्चों के सामने चिढ़ाते, "धन्नो! बड़ा बड़ा बंगला, बड़ा सा गुसलखाना।"

भाईसाहब की मुखमुद्रा देखकर सभी सहेलियां उसे कुरेदतीं, "भाई साहब क्या कह रहे थे?" तो शिकायत भरी नजरों से भाई साहब को सबके सामने भांडा फोड़ने पर दुत्तकारती, लेकिन अंदर ही अंदर उसे ये सब अच्छा भी लगता था। उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के प्रयास में, उसे सजना संवरना अच्छा लगता था। कभी नए फैशन के कपड़े पहनती, कभी अपना हेयर स्टाइल बदलती।

एक दिन यूं ही तैयार होकर वो भाईसाहब के घर किताबें लेकर पहुंच गयी। वैसे भी शाम हो चुकी थी। भाई साहब भी घर आ चुके थे।

दरवाजे पर खड़ी उनकी अम्मा ने उसे देखते ही ड़पट दिया, "अभी तो निरंजन पहुंचा ही है और तुम आ भी गयीं।"

बुझे मन से वो बाहर निकल कर अपनी सहेलियों के साथ खेलने लगी, लेकिन नज़र बार बार घड़ी पर जाकर अटक जाती थी, जो सरकने का नाम ही नहीं ले रही थी। तभी उनकी अम्मा ने उसे बुला लिया और वो पढ़ने बैठ गयी। लेकिन उस दिन उसका मन पढने में नहीं लग रहा था। सोच रही थी भाई साहब उसकी ओर देखें, उसके कपड़ों की, उसके चेहरे की सराहना करें। लेकिन भाईसाहब उस समय न जाने क्या सोच रहे थे, अलबत्ता उसी दिन उनकी अम्मा ने सहज भाव से जरूर उसकी मां को समझा दिया था कि,"आकांक्षा को अब ट्यूशन की ज़रूरत नहीं है।"

"क्यों किया उनकी अम्मा ने ऐसा?" उसके जी में आया, अम्मा से चिल्ला-चिल्ला कर पूछे। पूछने को तो भाई साहब से भी पूछ सकती थी, लेकिन किस बहाने उनसे बात की जाय वो स्वयं समझ नहीं पा रही थी।

इधर उसने भी दसवीं की परीक्षा पास कर ली थी। कई बार उसका जी चाहता कि एक बार वो भाईसाहब को इतना ज़रूर बता दे कि वो उसे बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन जब तक ये शब्द उसके मुंह से निकलते, भाईसाहब की नौकरी लग गयी और उन्हें, चिराग दिल्ली में सरकारी क्वॉर्टर भी मिल गया। उनके परिवार में सभी बहुत ख़ुश थे। सबसे ज्यादा भाईसाहब खुश थे, क्योंकि उनका ऑफिस उनके आवंटित सरकारी क्वॉर्टर से कुछ ही कदम के फासले पर था।

उदास मन से वो, मिनी और अम्मा के साथ, उनकी पैकिंग में मदद करती रही। उधर भाईसाहब उसके मन की उदासी को समझने के बिना उससे बराबर उसी तरह मजाक करते रहते थे, "धन्नोरानी, अब तो पढ़ने की छुट्टी हो गई। दिनरात गप्पें और मौज मस्ती।"

उस दिन पहली बार भाईसाहब के मजाक से उसे चिढ़ सी हुई। कम से कम एक बार कोशिश तो करते कि उसका मन उदास क्यों है? मन ही मन उसने निश्चय कर लिया कि "वो अब कभी उनसे नहीं मिलेगी।" मिनी ने क़ई बार बुलाया भी था, अम्मा भी संदेश भिजवाती रहीं कि "एक बार उनके शिफ्ट करने से पहले वो उंनसे जाकर मिल ले " लेकिन उसे नहीं जाना था सो वो नहीं गयी।

अम्मा का कोलोनी की लड़कियों को कलेजे से लगाकर बिलख-बिलख कर रोना, घर छोड़ कर टैक्सी में बैठकर हाथ हिला हिला कर सबसे विदा लेना वो अपने कमरे की खिड़की से ही देखती रही।

दूर होने के बावजूद मिनी ने अभी तक पुराने स्कूल से नाम नहीं कटवाया था। दोनों सहेलियां लंच ब्रेक में इधर उधर की खूब खूब बातें करतीं। मिनी को अपनी पुरानी कालोनी की बातें सुनकर बड़ा मज़ा आता था लेकिन उसके कान भाईसाहब की बातें सुनने के लिए तरसते थे। मन करता, मिनी घंटों सिर्फ और सिर्फ उन्ही की बातें करती रहे और वो सुनती रहे,

तभी उसकी सगाई, राजेश जी के साथ तय हो गयी। राजेश जी का चेहरा जितना सुंदर था, व्यक्तित्व उतना ही प्रभाव शाली। बिल्क़ुल भाई साहब की तरह, लेकिन उनका स्वभाव भाई साहब से ज़रा मेल नहीं खाता था। वो काफ़ी रोबीले और अपनी चलाने वाले दिखायी दे रहे थे। बिल्क़ुल ऐसे कि उठना बैठना भी उन्ही की मर्ज़ी से होना चाहिए।

उसके मन में आया वो राजेश जी का रिश्ता ठुकरा दे लेकिन,अपनी अम्मा के चेहरे पर छायी संतोष की चिलमन ने उसे रिश्ता स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया।

कुछ दिन बाद मिनी ने उसे बताया भाईसाहब की सगाई तय हो गई है.भावी दुल्हन जितनी सुन्दर है उतनी ही सुशील भी है। घराना भी बहुत अच्छा है।

पता नहीं क्यों, उस दिन उसे इतनी घुटन महसूस हुई कि,आँसुओं की झड़ी रोके नहीं रुक रही थी।" घरवाले और सहेलियां यही समझती रहीं कि वो अपनी शादी को लेकर रो रही है.बड़ी बुज़ुर्ग औरतों ने समझाया भी की, हर लड़की को शादी के बाद ससुराल तो जाना ही पड़ता है, पर असल में वो क्यों रो रही थी, ये बात कोई नहीं समझ पा रहा था।

ससुराल आकर उसे भाईसाहब का "बड़ा बंगला और बड़ा गुसलखाना "कहकर चिढ़ाना याद आता रहा। लेकिन कहां मिला "बड़ा गुसलखाना"और कहाँ मिला "बड़ा बंगला?"

मिला तो ऐसा पति जिसे हँसी मज़ाक़ से सख़्त चिढ़ थी.हर बात पर झिड़कना और व्यंग करना ही भाता था। उन्होंने पहले दिन ही जतला दिया था कि उन्हें पत्नी से नौकरी करवाना ज़रा पसंद नहीं, वुमन लिंब पर भी उन्हें ज़रा विश्वास नहीं। उनकी दृष्टि में बीबी का वजूद सिर्फ़ घर संभालना और बच्चों की परवरिश करने तक ही सीमित है।"

एक सरल और सहज सान्निध्य से भरे जीवन की कल्पना, उनके व्यंग की छुरी से कब की कट चुकी थी। जब भी मन उदास होता भाई साहब का मुस्कुराता चेहरा उसे ज़रूर याद आ जाता। हालांकि उस कल्पना के अवशेषों का कोई चिन्ह ही नहीं था, फिर भी जब तब आकर ये सपना उसके मर्म को घायल कर जाता। मन में आता एक बार भाईसाहब मिल जाएँ और वो उनसे अपने मन की बात कह कर इस मारक सपने से मुक्त हो जाय।

अचानक मंदिर से घंटियों का स्वर सुनकर उसकी नींद खुल गई। उसे झुँझलाहट सी महसूस हुई। अच्छा ख़ासा सपना टूट गया। इस महानगर में घूमते समय, प्रदर्शनियों में पार्क में उसकी दो जोड़ी आंखें हमेशा भाईसाहब को तलाशती रहती, लेकिन वो कहीं भी दिखायी नहीं दिए थे।

तभी एक दिन वो अपने पीहर गई थी। पंडिताइन भाभी के घर से एक जानी पहचानी हंसी की आवाज़ आ रही थी। वो वहीं खड़ी रह गयी। आवाज़ नज़दीक से नज़दीक आती गई। बड़ी हिम्मत करके उसने आँख उठाई। भाई साहब एक महिला के साथ जो निश्चित रूप से उनकी पत्नी थी,खड़े थे,और बच्चे के साथ पंडिताइन भाभी के घर से बाहर निकल रहे थे। उसे देखकर वो क़िलक उठे, लेकिन अपनी पत्नी को देखकर उनकी आवाज़ दब सी गयी, "सुनो ये आकांक्षा है"फिर उनकी नज़र उसके बेटे पर पड़ी।

"अरे तुम्हारा बेटा इतना बड़ा हो गया?" आश्चर्य और स्नेह के चिन्ह भाईसाहब के चेहरे पर झलक आए। बच्चे तो उन्हें सदैव से ही भाते थे।

"देखो बेटा मुझे प्रणाम करो ,मैंने तुम्हारी माँ को भी पढ़ाया है।"

उसके बेटे ने पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया। उनकी पत्नी मूकदर्शक सी उन दोनों को देख रही थी, बोलीं कुछ नहीं। भाईसाहब इतने दिनों के बाद आज फिर उसके सामने थे। वैसे के वैसे खिलखिलाते हुए। उसकी आँखों में कड़वा सा पानी भर आया। क्या कहे, कैसे कहे, इतनी छिछोरी बात कि, "भाईसाहब आप मुझे इतने अच्छे लगते थे और आज भी अच्छे लगते हैं?"

उनकी गरिमामयी पत्नी और बेटा कैसे समझेंगे, "कोई ऐसा संबंध भी हो सकता है,कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को इतना भाता है कि वो उसे संसार का पूर्ण पुरुष समझ बैठे?"

वो एक बार यह स्वीकार करके अपने मन पर लदा वर्षों पुराना बोझ उतारना चाहती थी, "आज भी संसार में तुम्हें आदर्श पुरुष मानती हूँ"एक सामान्य सा वाक्य जिसमें अब तक जिए गए हर क्षण की कचोट, तिलमिलाहट, लालसा, उत्तेजना और प्रतीक्षाएँ शामिल थीं। उसके शरीर की मुद्राएँ बोल रही थीं लेकिन वाणी अभी भी मूक थी, होंठों पर जैसे बर्फ़ जम गयी हो।

"अरे धन्नो रानी, तू इतनी शांत कब से हो गयी?" खिलखिलाते हुए भाईसाहब बोले तो वो हंसी उसके दिमाग पर छाने लगी। और बिना कुछ कहे उसके कदम अपने घर की तरफ़ मुड़ने लगे। भाईसाहब और उनका परिवार,अवाक सा अभी भी सड़क पर खड़ा उसे निहार रहा था।

- पुष्पा भाटिया

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