E-इश्क:उसका नाम जिन होंठों से निकला था, जो नजरें उसे एकटक देख रही थीं, कुछ है क्या उनमें उसके लिए?

एक महीने पहले
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वह बॉन फायर के सामने बैठी थी। गोल दायरे में लकड़ियां लगी थीं। बूंद-बूंद गिरती चिंगारियां मानो कोई तारा टूट-टूट कर गिर रहा हो। सुर्ख लाल और पीला तारा, चमकदार, चटकीला तारा। लकड़ियों की दरारों से टूट-टूट कर गिरती चिंगारियां, पता नहीं कितने असंख्य तारों की तरह गिरता तारा। पता नहीं कितने असंख्य तारे उस पल उसके मन के आकाश पर ओढ़नी पर लगे सितारों की तरह बिखर रहे थे। ऑफ सीजन होने के कारण रिसोर्ट में भीड़ नहीं थी। तीन कॉटेज में ही लोग रह रहे थे। बाकी सारे कोटेज खाली थे। खामोशी को जीने के लिए वह आग के सामने वहीं आकर बैठ गई थी। धीमे-धीमी गिरती ओस की बूंदें, गुनगुनाती हवा और भीतर का चुभता सन्नाटा। माहौल भी एक इश्क की तरह होता है, लबालब भर देता है एहसासों से। चारों ओर अंधेरा था, केवल रिसोर्ट के पीले बल्ब की रोशनी से लकीरें खिंच रही थीं। पहाड़ों पर रात जल्दी हो जाती है। कोहरे ने पहाड़ों की हर परत को ढक लिया था, हरियाली का केवल आभास हो रहा था, तब लगा खामोशी भी रुला सकती है।

होंठों पर एक गीत आ गया, ‘बावरा मन देखने चला एक सपना।’

जब भी शहर की भागदौड़ उसके मन-प्राणों को निस्तेज करने लगती है, वह चली जाती है पहाड़ों पर, उसने उसकी बहन से सुना था कि उसे पहाड़ों से प्यार है। न जाने हर बार इसी आस से कि शायद किसी रास्ते पर चलते हुए मुलाकात हो जाए। बस एक बार, वह यह भी जानती है कि सामने आ भी गया तो शायद वह पहचान ही न पाए। पंद्रह बरसों का अंतराल कम नहीं होता, खासकर जब किशोरावस्था को लांघ जवानी का एक पड़ाव पार हो चुका हो ।

उसने शॉल को कसकर लपेट लिया। ठंड काफी थी। अभी कुछ देर और बैठना चाहती है वो, उसने रिसोर्ट के चौकीदार को इशारे से बताया।

बस खिड़कियों से एक-दूसरे को देखने भर का इश्क था उनके बीच। कभी बात तक नहीं हुई, मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता था। उसके सरकारी फ्लैट के कमरे की खिड़की के ठीक सामने उसके कमरे की खिड़की थी, जहां से दोनों के खुले बरामदे दिखते। उसी खिड़की के पास बैठा वह पढ़ता रहता था। एक बार उसकी बहन के साथ उसके घर गई थी, तब देखा था कि उसकी स्टडी टेबल खिड़की के पास ही लगी थी। पढ़ाकू भैया को उसकी बहन फौरन कमरे से बाहर खींच लाई थी।

दोनों की नजरें मिली थीं। वह चाहने लगी थी आशीष को और सच कहे तो उसकी प्रेरणा बन गया था वह। जितनी देर तक वह पढ़ता, वह भी पढ़ती। कुछ बनने की धुन जगा दी थी उसने उसके भीतर। इश्क की लहरें उसे देख कर किनारे से टकराने को बेचैन हो उठतीं। सजना-संवरना अच्छा लगने लगा था उसे। ट्वेल्थ में उसने टॉप किया और वह भी फर्स्ट आई।

वह चला गया उसके बाद। एनडीए ज्वाइन कर लिया था उसने। पापा रिटायर हो गए और वह वहां से आ गई। न जाने क्यों उसके बाद वह किसी से प्यार नहीं कर पाई। बहुत समझाती खुद को कि वह एक सपना था, उसके बावरे मन का ख्वाब जो कब का हवा के साथ बहकर उड़ चुका है। भूल चुका होगा वह उसे। खिड़कियों से नजरों का टकराना भी क्या किसी को याद रह सकता है। तू ठहरी बावरी, सपनों में जीती है, वह खुद पर हंसती, खुद को समझाती, पर फिर भी एक तलाश उसे हर आते-जाते चेहरे में उसे ढूंढने के लिए मजबूर कर देती। ‘‘चौकीदार, थोड़ा गर्म पानी चाहिए,’’ एक आवाज, एक चेहरा, वहीं कुछ दूर खड़ा था कॉटेज नंबर 3 का मेहमान।

अचानक वह उसे अपने करीब आता महसूस हुआ। दिल क्यों धड़क रहा है उसका, एहसासों के पुलिंदे क्यों खुल रहे हैं, वह ठीक उसके सामने खड़ा था। टूट-टूट कर गिरते आग के चटकीले तारों की रोशनी उसके सुर्ख चेहरे पर पड़ी। कुर्ता-पाजामा और शॉल से ढका, ‘‘कुछ देर के लिए क्या यहां बैठ सकता हूं, रीमा?’’

वह चुप थी। होंठ सूखते महसूस हुए उसे। कान तपने लगे, उसका नाम जिन होंठों से निकला था, जो नजरें उसे एकटक देख रही थीं, कुछ है क्या उनमें उसके लिए?

आशीष... उसे लगा कि उन दोनों के बीच कुछ सुलगने लगा है।

लंबे समय का अंतराल इश्क की कुछ तो चमक छोड़ ही जाता है शायद।

- सुमन बाजपेयी

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