E-इश्क:जब पति छेड़ते ‘कोई प्रेमी तो नहीं छोड़ आई हो जो इतना उदास रहती हो’ वो सकबका जाती, मानो चोरी पकड़ी गई हो

2 महीने पहले
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कृतिका की शादी हुए बरसों गुजर गए। समझदार पति और दो प्यारे बच्चों को जन्म देकर भी, मन में खालीपन का अहसास होता। जब कृतिका किसी बात से दुखी होती तो उसके मन के रीतेपन में ऋषभ उतर आता। कुल जमा चार मुलाकात हुई होंगी और हजार दो हजार शब्द साझा हुए थे। उससे क्या फर्क पड़ता है। दिल को मचलने को इतना ही काफी है। सोलह साल की अल्हड़ उम्र में ऋषभ से टकराकर उसका दुनिया देखने का नजरिया ही बदल गया। फूल, पत्ती, तितलियां अचानक से सभी के रंग चटक हो उठे। सारे गाने रूमानी और नजारे हसीन लगने लगे।

उस दिन कृतिका अपनी सहेली संगीता के गेट पर पहुंची थी कि वो मोटर साईकिल पर सवार हो पहुंच गया और उससे पूरा गेट खोलने का इशारा करने लगा, जिससे वो अपनी बाइक अंदर ले जा सके।

गोरा रंग, काली पैंट, नीली टी शर्ट और काले चश्मे में गजब ढा रहा था। बाइक रोककर उसने अपने घुंघराले बालों को हाथों से पीछे को संवारा और गेट के पूरा खुलने का इंतजार करने लगा।

उसके चुंबकीय व्यक्तित्व से प्रभावित हो वो भी गेट खोलकर खड़ी हो गई थी।

फिर दुबारा मुलाकात संगीता की बड़ी बहन की शादी में ऋषभ के साथ रातभर जाग कर, एक दूसरे की पसंद नापसंद जानते रहे।

तीसरी मुलाकात होली के रंगों के बीच हुई, दोनों ने एक दूसरे को प्रेम में भीगे रंगो से सराबोर कर दिया और चौथी मुलाकात जब ऋषभ और संगीता के भाई रोहन दोनों यूपीएससी की तैयारियों के लिये शहर छोड़कर जा रहे थे। वो तो संगीता की पड़ोसन ही थी, जब मौका मिलता अपनी खिड़की से उसके घर की ओर टकटकी लगाए ऋषभ का इंतजार करती।

दो साल गुजर गये ख्वाबों-खयालों में, ऋषभ अपनी कोचिंग में व्यस्त था और कृतिका उसके प्यार में गुम थी| इधर कृतिका के लिए रिश्ते आने लगे। लैंड लाइन फोन का जमाना था और उसके पास कोई नंबर नहीं था जिसे मिलाकर वो ऋषभ का मन टटोल ले। इंतजार करे भी तो किस भरोसे पर, उसने कोई संदेशा भी न भिजवाया। काश, वो संगीता के घर ही फोन कर अपनी कुशल बता देता। आखिर वो डोली में बैठ शहर से ही विदा हो गई।

गृहस्थी की शुरुआत में जब पति छेड़ते ‘कोई प्रेमी तो नहीं छोड़ आई हो जो इतना उदास रहती हो’ वो सकबका जाती, मानो चोरी पकड़ी गई हो। डर कर कभी अपनी सहेली से भी उसका हाल चाल न पूछ पाई।

शहर-शहर पति के संग तबादले में घूमती, कभी किसी पर्यटन स्थल पर उससे मिलती कद काठी को देख चिहुंक जाती। सोचती रहती ऋषभ अचानक से सामने आ जायेगा तो वह उसका परिचय कैसे देगी।

समय तेजी से गुजरता गया। बच्चे घर से दूर चले गए। पति अपनी नौकरी में व्यस्त हो गए।

खाली समय के साथ पुराना समय हर समय आंखों के सामने उभर आता। आज जब चारों तरफ प्रेम विवाह की स्वीकृति सुनाई दे रही है तब उसके मन में ऋषभ के वर्तमान को जानने की उत्सुकता बढ़ती जा रही है। मन के खालीपन में वो नाम जब तब उतर आता है।

संगीता से तो वो आज भी इस विषय में चर्चा नहीं कर सकती, उसे कोई और जरिया तलाशना होगा।

कृतिका को उपाय सूझा, उसने फेसबुक का सहारा लिया। संगीता की फ्रेंडलिस्ट में ऋषभ मिल गया। उसने तुरंत उसकी प्रोफाइल को खोल कर देखा।

ऋषभ की खूबसूरत पत्नी उसके गले में बाहें डाले हुए खड़ी थी। उसने मोबाइल स्क्रीन को स्क्रॉल किया।

‘ओह इसके दो बेटे भी हैं’, वो बुदबुदाई।

वापस स्क्रीन स्क्रॉल कर उसकी पत्नी को घूर घूर कर देखने लगी और बोली, “इतनी खूबसूरत पत्नी हैं इसकी, ऋषभ तो मुझे भूलकर भी याद नहीं करता होगा।”

फिर निराश होकर फोन रख कर बैठ गई। उसके हृदय में रीतापन पैर फैलाकर पसर गया।

उधर ऋषभ अपनी प्रोफाइल खोल कर बोला, “सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी झलक देखने के लिए फेसबुक ज्वाइन किया था| तुम्हारा परिवार देखकर तसल्ली तो हो गयी, मगर तुम्हारी फ्रेंड रिक्वेस्ट का आज भी इंतजार है।”

- दीपा पाण्डेय

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