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E-इश्क:तुम्हारे समाज का यह दोगलापन ही तो मुझे चुभता है। यहां राधा-कृष्ण तो पूजनीय हैं, किंतु प्रेमी युगल दंडनीय।

14 दिन पहले
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“संसार इंद्रधनुष नहीं है!” “इंद्रधनुष ही तो है। इतनी विविधताओं से भरा हुआ। किंतु संसार के इंद्रधनुष में रंगों को गिन पाना संभव नहीं !” मैंने उसकी बात का जवाब दिया और पुनः पेंटिंग बनाने में तल्लीन हो गई। “मैं कौन सा रंग हूं!” उसकी आवाज़ की तल्खी मुझे थप्पड़ सी लगी। पर मैं मुस्कुराई। बोली, “तुम स्लेटी रंग हो!” “माने?” “माने नीरस!” “इतना नीरस हूं तो छोड़ क्यों नहीं देती?” “क्योंकि मैं क्रिम्ज़न हूं, रक्तिम लाल। ये दोनों ऐसे क्लासिक और परिष्कृत रंग हैं कि जब इन्हें एक साथ जोड़ा जाता है तो वे एक दूसरे पर पॉलिश प्रभाव छोड़ते हैं। स्लेटी की नीरसता में क्रिम्ज़न के रहस्य के घुलते ही, क्रिम्ज़न थोड़ा मुखर और स्लेटी थोड़ा सरस हो जाता है। रंगों की यदि रूह होती तो मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि ग्रे और क्रिम्ज़न, एक ही रूह के दो टुकड़े हैं!” “बातें बनाना कोई तुमसे सीखे।” “मैं तो मन की कहती हूं, बातें बनाना ही तो नहीं जानती!” “इतना गहरा प्रेम, तो शादी से इंकार क्यों?” “प्रेम है तो विवाह की अनिवार्यता क्यों?” “तुम समझती क्यों नहीं! इस समाज में प्रेम नहीं, विवाह सम्मानित है।” “तुम्हारे समाज का यह दोगलापन ही तो मुझे चुभता है। यहां राधा-कृष्ण तो पूजनीय हैं, किंतु प्रेमी युगल दंडनीय।” “क्या एक तुम्हारे विवाह न करने से समाज में क्रांति आ जाएगी?” वो चीखा। “तुम क्यों नहीं समझते कि मेरी प्रॉब्लम शादी नहीं, शादी करने का कारण है। समाज मुझे नहीं बता सकता कि मुझे शादी कब और किससे करनी है। मैं जब भी शादी करूं, हमारे लिए करूं, समाज में अपने रिश्ते को सम्मानजनक बनाने के लिए नहीं।” “हमें आज न कल तो शादी करनी ही है! फिर आज क्यों नहीं?” “क्योंकि अभी प्रेम का कोंपल फूटा भर है! उसे विकसित होने में समय लगेगा!” वो धीरे-धीरे उठ बैठा। बोला, “क्या यह प्रेम नहीं?” “अभी नहीं!” “फिर प्रेम है क्या?” मैंने क्षण-भर मौन रहकर पूछा, “क्या तुमने मेरी नई पेंटिंग देखी?” मेरे निर्विकार पत्थर-मूर्ति के समान चेहरे को देखकर उसने लंबी सांस भरकर कहा, “इतना तो समझ गया कि मेरे सवाल का तुम कभी सीधा जवाब तो नहीं दोगी। सो, अपनी पेंटिंग ही दिखा दो। तुम्हें तो नहीं पढ़ पाया, शायद उसे ही समझ लूं!” मैंने उसकी गर्म हथेली को अपनी ठंडी उंगलियों में बांधा और पेंटिंग के सामने खड़ा कर दिया। उसने देखा, पूरे कैनवास पर लाल, पीला और नारंगी रंग ऐसे बिखरा हुआ है, जैसे ये रंग अलग होकर भी एक हों, जैसे तीन रूहों के मिलन ने एक काया का निर्माण किया हो। ध्यान से देखने पर पता चला कि कुछ महीन रेखाओं से उन रंगों को बांधने का प्रयास किया गया है। इतना ही नहीं ब्रश के स्ट्रोक यूं मारे गए हैं कि रौशनी से दूर जाते ही पेंटिंग के रंग सिकुड़ते से लगते। “शायद ये कोई फूल है!” वो मानो स्वप्न से जागकर बोला। “सही पहचाना। इसे लेपर्ड लिली कहते हैं। पिछले वर्ष जब त्रिपुरा गई, तब वहां इसे पहली बार देखा। यूं तो इसकी सुंदरता भी मन को मोहने के लिए पर्याप्त है, लेकिन मैं इसके आकर्षण में किसी और वजह से बंधी।” “कौन सी वजह?” “एक दिन मैंने देखा कि इसकी पंखुड़ियां सूरज के आने के साथ खुलतीं और उसके ढलते ही बंद हो जातीं।” “हम्म। ऐसा तो कुछ और फूलों के साथ भी होता है! इसमें क्या विशेष है?” वो यूं बोला जैसे बात समाप्त करना चाह रहा हो। “विशेष यह है कि मैं गलत थी। पहले-पहल मैंने भी इसके अनुराग को सूर्य के साथ जोड़कर देखा। लेकिन फिर एक दिन मेरा यह भ्रम तब टूटा जब मैंने दिन के समय भी इसकी बंद पंखुड़ियों को देखा!” “क्या!” “हां! और यह विशेष था। हुआ यूं कि उस दिन सूरज और बादलों के बीच लुका-छिपी का खेल चल रहा था। सूरज आता और फिर चला जाता। धूप थी, पर लिली नहीं खिली। उस पूरे दिन वह नहीं खिली। और तब मैंने जाना कि लेपर्ड लिली का प्रेम सूरज नहीं, उसकी किरणों से बना एक विशेष तापमान है। क्या प्रकृति के इस इंद्रजाल से सुंदर प्रेम की कोई परिभाषा हो सकती है! क्या मिलन और विरह की इस कथा में प्रेम की पवित्रता नहीं है! प्रेम की वह गहराई, जहां संवाद मौन हों और भावना मुखर।” वो इसके उत्तर में जरा हंसकर बोला, “अब समझा।” “क्या समझे?” “यही कि स्पर्शहीन स्पर्श को पढ़ लेना ही प्रेम है!”

- पल्लवी पुंडीर

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