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E-इश्क:लड़का जिसे बूढ़ा होकर जॉर्ज क्लूनी लगना था

8 दिन पहले
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आज उसने फिर से अपनी शानदार तस्वीर के साथ जाने किसकी शायरी चिपका दी थी। उसमें ‘मोहब्बत’, ‘इबादत’, ‘सिफ़त’ जैसे कई शब्द भरे पड़े थे।

मैं उसके इनबॉक्स में गयी। लिखा, ‘अचार अगर पराठे के साथ हो तो लज़ीज़ लगता है। यह क्या कि आप इसे पिज़्ज़ा के साथ भी परोस दें।’ लेकिन इसके पहले कि एंटर दबाती, सब मिटा दिया और उसके इनबॉक्स से निकल आयी। सामने फिर से उसकी तस्वीर थी। तराशे हुए नाक और होंठ, ललाट तक आते घने सँवारे हुए बाल और गहरी काली आँखें। वह ग्रीस के किसी नायक सरीखा लग रहा था।

आज से दस साल पहले जब वह हमारे स्कूल आया था, उस छोटे से कस्बाई शहर में मैंने इतना खूबसूरत लड़का पहले कभी नहीं देखा था। उसके पिता रेंजर थे जो नये तबादले में हमारे उस ऊंघते टॉउन में आये थे। वह ग्यारहवीं क्लास के जिस सेक्शन में आया था, मैं उसकी मॉनिटर थी। टीचर के पहले मैंने ही उसका परिचय क्लास में सबसे करवाया था। वह कम बोलता। सबकी सुनता और मुस्कुराता रहता। मैं मॉनिटर थी, बावजूद उसके इस व्यक्तित्व से मुझे डर लगता। लगता आगे आने वाली कक्षाओं में यही लड़का मेरी जगह लेने वाला है। उससे दोस्ती की शुरुआत फिल्मों पर हुई बातचीत से हुई थी। मुझे तब रॉबरी की फ़िल्में पसंद थी, और हॉलीवुड की ‘ओसियन’ सीरिज ने मुझे पागल कर दिया था। उसमें जॉर्ज क्लूनी का बड़ा हाथ था जिसकी मैं दीवानी थी। मैंने कहा था, “तुम्हें पता है, तुम बूढ़े होगे तो जॉर्ज क्लूनी की तरह लगोगे?” उसने मुस्कुराकर पूछा था, “कौन जॉर्ज क्लूनी?” वह जॉर्ज क्लूनी को नहीं जानता था। मैंने उसे माफ़ कर दिया, और इसके पहले कि उसे मुझे और जाने कितनी माफ़ियाँ देनी पड़ती, महज़ आठ महीने में उसे स्कूल छोड़ना पड़ा। उसके ईमानदार जिद्दी पिता को फिर से कहीं तबादले में डाल दिया गया था।

और सालों बाद जब फेसबुक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने उसे संभावित फ्रेंड के तौर पर मेरे सामने रखा, मैं चौंक गयी। ध्रुव रॉय। यही नाम था उसका। शुरुआती हाय-हेलो के बाद पता चला, उसके पिता के दर्जनों तबादलों से हासिल दर्जनों स्कूल से मिले दर्जनों दोस्तों में उसे सिर्फ मैं याद रह गयी थी।

“क्यों..सिर्फ मैं ही क्यों?”

“तुम्हारे पूछने के बाद मैंने जॉर्ज क्लूनी को देखा था। मुझे अच्छा लगा।”

“क्या अच्छा लगा?”

“कि मैं जॉर्ज क्लूनी की तरह हूँ.”

उसकी खूबसूरत तस्वीर अब भी मेरे सामने थी। न चाहते हुए भी उसके ऊपर चिपकी सस्ती शायरी पर मेरा ध्यान चला गया। उसके सभी तस्वीरों का यही हाल था।

मैंने अपनी एक तस्वीर लगायी। वह एक श्वेत-श्याम तस्वीर थी, जिसमें मैं घास के एक मैदान में बैठी थी और ऊपर बादलों से भरा आसमान था। मैंने उसे टैग किया और एक सुंदर कैप्शन लिखने को कहा। सुंदर जो मेरा दिल जीत ले। कुछ देर में ही नोटिफिकेशन की भीड़ लग गयी। सबने दुनिया-ज़हान की शायरी चेप रखी थी। किसी ने ‘आज मैं ऊपर, आसमां नीचे’ लिखा था तो किसी ने ‘बहारों फूल बरसाओ’ लिखा था, और मेरे ‘जॉर्ज क्लूनी’ ने लिखा था, ‘रंग भरे बादल से..तेरे नैनों के काज़ल से..”

और बस यहीं से बचपन के क्लूनी का सारा जादू ख़त्म हो गया। मन किया लिखूं, "तुम क्लूनी की तरह नहीं हो। क्लूनी इतना डम्ब कैप्शन कभी नहीं लगाता।"

- मिथिलेश प्रियदर्शी

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