E-इश्क:उसे दुनिया की सबसे चटख रंगों वाली साड़ी चाहिए थी

2 महीने पहले
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"मुझे दुनिया की सबसे चटख रंगों वाली एक साड़ी चाहिए।"
यह पांच साल पहले की बात है, जब इठलाती हुई उसने जीवन की पहली साड़ी के बारे में मुझसे कहा था। और अब इतने सालों बाद वह एक बार फिर मेरे सामने बैठी थी, साड़ियां चुनती हुई। चटख नहीं, फीकी और उदास साड़ियां। उसका चेहरा फीकी साड़ियों जितना ही उदास था।
बाकी दुकानदारों का मुझे नहीं पता पर एक साड़ी दुकानदार के अनुभव से कह सकता हूं, कई महिलाएं यहां आकर असीम सुकून और उल्लास महसूस करती हैं। पर वह खुशी जैसे भावों से कोसों दूर थी।
एक दुकानदार का दूसरों के जीवन में ताकाझांकी आपको अजीब लग सकता है, पर क्या करूं मैं चाहकर भी अपने पिता की तरह नहीं हो पाया जो अपने ग्राहकों की हजारों कहानियां लिए इस फ़ानी दुनिया से चले गए और केमेस्ट्री के एक शानदार ग्रेजुएट को अपनी पढ़ाई छोड़कर उनकी गद्दी संभालनी पड़ी। यह कोई राजगद्दी नहीं थी। यह साड़ियों की पुश्तैनी दुकान थी जिस पर मैं बैठा था।
शुरू में दिनभर महिलाओं-लड़कियों से घिरा रहना और उनसे भैया-भैया सुनना अजीब लगता था। मैं महज़ चौबीस का था और कइयों के लिए उनके बेटे की उम्र का था। उनसे 'भैया' सुनना दुनिया के सबसे नकली संबोधनों से गुजरना था। पर बाद में आदत होती गयी थी। कुछ लडकियां चहकती हुई आतीं और दुकान में हंसी की ढेरियां लगाकर चली जातीं।
गुनगुनी सर्दियों की एक शाम वह इसी तरह हंसती हुई दुकान पर आयी थी। उसकी हंसी इतनी संक्रामक थी कि अगले कुछ मिनटों में ही मैं साड़ियां दिखाता हुआ बेवजह मुस्कुरा रहा था। वह मोबाइल पर अपने बॉयफ्रेंड से जोकि अगले महीने उसका पति होने वाला था, बातें करते हुए हंसे जा रही थी। साथ आयी उसकी मां शादी की साड़ियां चुनने में व्यस्त थी। जब उसकी बातचीत खत्म हुई, वह मेरी तरफ मुड़ी और हंसती हुई पूछी, "आप बताओ, मुझ पर कौन-सी साड़ी जंचेगी? मुझे दुनिया की सबसे चटख रंगों वाली एक साड़ी चाहिए।"
मैं एक जवान और उम्मीदों से भरा लड़का था। मेरे हाथ पर अफीम के फूल का एक आकर्षक टैटू था, जिसके बारे में लड़कियां अक्सर पूछती थीं। मुझे भला लगता था। पर यह पहली लड़की थी जिसने एक अनजाने लड़के को जीवन की पहली साड़ी चुनने जैसी प्यारी जिम्मेदारी दी थी।
उसके बाद मेरी दुकान में उसका आना-जाना लगा रहा। 'आप एसी 27 पर क्यों रखते हो?' 'आप कुछ हटकर साड़ियां क्यों नहीं लाते?' 'हें..आप केमेस्ट्री में यूनिवर्सिटी गोल्ड मेडल हो?' 'तुम तो मेरी एज के लगते हो।' वह जाने कब आप से तुम पर शिफ्ट हो गयी थी। उसके सवाल बदलते जाते और मैं मुस्कुराता हुआ उसे सुनता रहता।
उसने मुझे अपना व्हाट्सएप नम्बर दिया था और नयी साड़ियों की तस्वीरें भेजने की बात कही थी। मैंने तस्वीरें तो नहीं भेजी लेकिन उसके स्टेट्स देखता रहता। कभी बेहद खिलखिलाती हुई तो कभी बेहद निराश।
वे दोनों कॉलेज के समय के दोस्त थे। यह दोस्ती मैनेजमेंट के बाद एक ही कम्पनी में नौकरी तक बनी रही। फिर लड़की ने लड़के को प्रपोज किया। लड़के ने हामी भर दी पर एक कठिन शर्त थोप दिया। उसकी मां राजी होती है तभी वह शादी कर पायेगा। यह प्रेम नहीं था। प्रेम में ‘शर्तें लागू’ की कोई नियमावली नहीं होती।
शुरू में लड़के की डॉक्टर मां ने लड़की की जाति, रंग, लंबाई आदि देखकर साफ मना कर दिया। लड़की इंतज़ार करती रही। मां ने लड़की से कहा, नौकरी छोड़ दो। लड़की ने नौकरी छोड़ दी। अंत में मां ने हामी भरी पर उसने लड़की को कभी अपना नहीं माना।
घर में प्रेम का एक अजीब त्रिकोण बन गया। लड़की लड़के को चाहती थी पर मां लड़की को नहीं। रिश्ता टॉक्सिक होता गया। कलह इतना बढ़ गया कि लड़की को मजबूरन वापिस आना पड़ा।
दुकान में लड़की का बेनूर चेहरा देख मेरा दिल धक्क से रह गया था। साड़ियां दिखाता हुआ मैंने धीमे से पूछा, “क्या हुआ, सब ठीक तो है?”
“कुछ नहीं, बस गलत ट्रेन में चढ़ गयी थी। समय रहते उतर गयी।” वह जैसे दर्द के बीच मुस्कुराई।
“अब?”
“अब क्या, पैदल चलूंगी। अकेले पैदल चलकर भी जहां चाहे पहुंचा जा सकता है। रास्ते में कोई ढंग की गाड़ी मिली तो ठीक, नहीं मिली तब भी ठीक।”

-मिथिलेश प्रियदर्शी

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