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E-इश्क:तुम चाहो तो मैं मदद कर दूं... शाम ढलने को थी, बातें साहित्य से शुरू हुईं और न जाने कैसे पतली गलियों से होते हुए इश्क पर आ गईं

14 दिन पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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ये जनवरी महीने की कोई सातवीं-आठवीं शाम रही होगी। बुक फेयर के चलते उन दिनों दिल्ली का माहौल किताबी था और किताबों के पन्नों से आने वाली खुशबू राहुल और संध्या को भी प्रगति मैदान तक खींच लाई थी। नोटबंदी वाला दौर थोड़ा परेशानी वाला रहा होगा, लेकिन इन दोनों के लिए बहार जैसा था। संध्या को एक किताब की पेमेंट में दिक्कत आई और राहुल ने इसे सॉल्व कर दिया। बस, दो किताबी कीड़ों को बात करने के लिए इतने ही बहाने की जरूरत थी।

संध्या के हाथ में थे जौक के सुखन, और राहुल ने थाम रखी थी गालिब की शायरी। ओह, तो आप भी शायरी में दिलचस्पी रखती हैं। सधी हुई आवाज में राहुल का ये सवाल संध्या को अच्छा लगा। जैसे भीड़ से अलग किसी ने उसकी मनपसंद बात पूछ ली हो। संध्या ने कहा- हां, मुझे पसंद हैं शेर। लेकिन हमारे जौक साहब आपके गालिब से तूतू-मैंमैं करते रहते थे। राहुल के हाथ में ग़ालिब की शायरी देखकर संध्या ने यूं ही कह दिया था। ये सुनकर राहुल हंस पड़ा। बोला- ओह, अच्छा। हम ऐसा नहीं करेंगे, डोंट वरी। इसके बाद दोनों खिलखिला कर हंस पड़े और प्रगति मैदान के बुक स्टॉल की दूरियां तय करने लगे।

सिलसिला चलता रहा, किताबों के पन्ने पलटते रहे और एक रोज जब शाम ढलने को थी, बातें साहित्य से शुरू हुईं और न जाने कैसे पतली गलियों से होते हुए इश्क पर आ गईं। अब दोनों के बीच बातें थीं तो मुहब्बत की, इश्क की और प्रेम की। अच्छा इश्क, बुरा इश्क, रुलाने वाला इश्क, हंसाने वाला इश्क, दिल तोड़ने वाला इश्क और दिल जोड़ने वाला इश्क, सफलता के शिखर तक पहुंचाने वाला इश्क और तबाही की देहरी पर लाकर खड़ा करने वाला इश्क। काफी देर तक राहुल इश्क-इश्क कहता रहा, संध्या सुनती रही। राहुल अब चुप हो गया और संध्या की ओर देखने लगा।

संध्या ने कुछ कहने से पहले राहुल को गौर से देखना चाहा, लेकिन इतने सारे इश्क में राहुल का चेहरा धुंधला सा गया। फिर उसने बनावटी ऊबन में सिर झटका और बोली- उफ्फ! इश्क में भी इतनी वैरायटी! मुझे इतनी वैरायटी का इश्क समझ नहीं आता, इसलिए इश्क-विश्क में दिमाग भी क्या लगाना। वैसे भी मेरा इश्क तुम्हारे इश्क से अलग, सबसे खास और सतरंगी होगा। संध्या ने जल्दी से अपनी बात खत्म कर बॉल राहुल के पाले में फेंक दी। राहुल खामोश हो गया और कुछ सोचते हुए अपनी आंखें जमीन में गड़ा लीं, लेकिन जैसे ही उसने ऊपर देखा, तो संध्या मोबाइल पर कुछ टाइप करने में लगी थी। राहुल ने पूछा, तुम मोबाइल में क्या करने लगी? जवाब दो, मैं तुमसे ही पूछ रहा हूं। संध्या ने जवाब दिया, ओला बुक कर रही हूं। राहुल ने संध्या को रोकने की कोशिश करते हुए कहा, इतनी जल्दी। अभी तो गालिब और जौक ने चंद शेर ही सुने और सुनाए हैं। संध्या ने मुस्कुरा कर कहा, गालिब और जौक का ज्यादा वक्त साथ बिताना भी ठीक नहीं। इतने में संध्या की कैब आ गई और वह बाय बोलकर निकल गई। कैब में संध्या के मोबाइल पर व्हाट्सएप मैसेज आया, जिसे देखकर वह मुस्कुरा उठी। राहुल ने मैसेज कर पूछा था, तो अब गालिब और जौक कब मिल रहे हैं?

संध्या ने जवाब में लिखा, हमारे जौक आपके गालिब से फिर तूतू-मैंमैं कर बैठे तो? संध्या के मैसेज के जवाब में राहुल ने सवाल दागा- और अगर जौक गालिब से इश्क कर बैठे तो? संध्या ने रिप्लाई किया, मेरा जौक ये सोच रहा है कि ग़ालिब के इश्क की वैरायटी में से कौन सा वाला इश्क चुने? राहुल कुछ टाइप कर रहा था। संध्या की नजरें इनबॉक्स पर टिकी थीं। राहुल ने जवाब में लिखा, तुम चाहो तो मैं मदद कर सकता हूं।

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