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E-इश्क:पीयूष के लिए फ्लर्टिंग और रोमांस, उससे भी आगे औरत का शरीर ही सबकुछ था, जब प्रेम ही नहीं तो गृहस्थी कैसे चलेगी?

9 महीने पहले
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मीनाक्षी सुंदर थी और स्मार्ट भी। सबसे बड़ी बात वो मुझे अच्छी लगती थी, लेकिन उसकी बातों से पता चलता कि वह बहुत महत्वाकांक्षी है। मैं और मीनाक्षी कॉलेज में साथ ही पढ़ते थे। एमए के बाद हम दोनों ने नेट परीक्षा भी साथ ही क्लियर की थी। संयोग ऐसा कि हमारे शहर के पास के ही एक कस्बे के महाविद्यालय में हमारी एक साथ नियुक्ति भी हो गई। वे दिन कितने अच्छे थे। मीनाक्षी और मैं एक साथ आते जाते थे। महाविद्यालय में पढ़ाने के साथ मैं सरकारी नौकरी के लिए भी प्रयासरत था। सोचता था, यदि अच्छी नौकरी मिल जाती है तो मीनाक्षी और उसके घरवालों के सामने गर्व से शादी का प्रस्ताव रख सकता हूं। मीनाक्षी मना नहीं करेगी, ऐसा मुझे विश्वास था।

लेकिन उन सपनीले दिनों के दौरान अचानक एक दिन मेरा हकीकत से सामना हुआ जब मीनाक्षी ने बताया कि घरवालों ने उसकी शादी तय कर दी है और कल से वो पढ़ाने नहीं आएगी। उसी ने बताया कि अभी वह शादी के लिए तैयार नहीं थी, लेकिन अच्छा रिश्ता मिल जाने के कारण वो घरवालों को मना नहीं कर सकी। उसका होने वाला पति विदेश में स्थित इंडियन ऑर्गेनाइजेशन में बड़ा ऑफिसर था। मीनाक्षी के चेहरे की खुशी और चमक देख कर कहीं से भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि इस शादी से वह खुश नहीं है या उसने समझौता किया है।

इस तरह हमारे रास्ते अलग हो गए। धीरे-धीरे बीस बरस बीत गए। मैं मीनाक्षी को भूलने लगा था। लेकिन अचानक फेसबुक पर मीनाक्षी वर्मा की फ्रेंड रिक्वेस्ट देख कर चौंक गया। हां, ये वही मीनाक्षी वर्मा थी जिसे कॉलेज के दिनों में ‘काबुलीवाला’ पढ़ते हुए मैं मिनी पुकारने लगा था। वही मिनी जिसे मैंने दिलोजान से चाहा था और समय के साथ वो मुझसे बिछड़ कर पराई हो गई थी। मेसेन्जर पर एक फोन नंबर सेंड हुआ, बातें हुईं और राख में दबी चिंगारी की तरह मेरा सोया हुआ प्यार, आकर्षण, रुझान एक बार फिर जाग गया। मीनाक्षी से एक बार फिर मिल लेने की, उसे देख लेने की इच्छा इस कदर बढ़ने लगी कि मैं उसका अता-पता पूछ कर उससे मिलने उसके शहर जा पहुंचा। दौरा सरकारी था इसलिए ठहरने, रुकने और खाने की व्यवस्था भी सरकारी गेस्ट हाउस में ही थी। बस उसे सूचित ही किया था कि मैं तुम्हारे शहर में आ चुका हूं, उसने फौरन घर आने का निमंत्रण दे डाला।

अतीत और वर्तमान को जोड़ता हुआ एक पुल होता है स्मृतियों का। उन्हीं स्मृतियों के पुल पर टिका हुआ मैं एक बार फिर अपने अर्ली ट्वेंटीज में जीने लगा था। गेस्ट हाउस से मिनी के घर पहुंचने में मुश्किल से आधा घंटा लगा होगा। इसी आधे घंटे में मैंने मिनी के साथ बिताए हर पल को पूरी शिद्दत के साथ याद कर लिया था।

कॉल बेल के साथ जिसने दरवाजा खोला, वह मिनी थी। मैं कुछ पल टकटकी लगाये उसे देखता रह गया। उसका गोरा, खूबसूरत चेहरा, बड़ी-बड़ी काजल से भरी आंखें और गुलाब की पंखुड़ियों से होंठ जैसे कुछ कहने को अधखुले हों। सी ग्रीन साड़ी में वह बेहद हसीन लग रही थी। मैंने पहले की तरह सोचा, ये देवलोक से धरती पर क्यों उतर आई?

“कैसे हो राजवीर?” उसकी सुकोमल, मधुर आवाज सुनकर लगा जैसे वातावरण में एक गीत थिरक गया हो। घर के अंदर आने पर उसका भव्य ड्राइंगरूम देख कर मैं कुछ असहज हो गया था। मेरी घबराहट भांप कर उसने एक महंगे सिगरेट के पैकेट में से एक सिगरेट मुझे ऑफर की और डिब्बी मेरी तरफ बढ़ा दी। एक सिगरेट मिनी ने खुद भी सुलगा ली। उसकी नाजुक, पतली उंगलियों में सिगरेट भी सुंदर लग रही थी। हालांकि मैं काफी चौंक सा गया था।

“तुम्हारे परिवार में बाकी सब कहां हैं? कैसे हैं मिनी?” मैं पूछ बैठा। समय कम था हमारे पास, मुझे वापस भी लौटना था।

“मेरा परिवार...” वह हल्के से हंस पड़ी,” आओ, तुम्हें अपना मंदिर दिखाती हूं।” एक दूसरा झटका लगा मुझे। जिस मिनी को मैं जानता था वो तो घोर नास्तिक थी।

उसके चांदी से बने देवालय में प्रतिष्ठित राधा-कृष्ण की मूर्तियां, सोने के मुकुट से सजे राम, लखन सीता, सरस्वती, दुर्गा, शिव सभी देवता विराजमान थे। उनके कपड़े, गहने, चौकी, घंटी, आरती, जलपात्र, सब इतनी उज्ज्वलता से दमक रहे थे कि मेरे हाथ खुद ही जुड़ गए। मिनी वहीं देवालय में बैठ गई। “राजवीर, जानना चाहते हो मेरा परिवार कहां है? कैसा है? तो सुनो, टीना, मेरी बेटी एक होटल में रिसेप्शनिस्ट है। वहीं होटल में रहती है। बेटू बोर्डिंग में है। दोनों बच्चे छुट्टियों में भी घर नहीं आना चाहते। शायद हवा ही ऐसी चली है। आजकल बच्चे इंडिपेंडेंट रहना ज्यादा पसंद करते हैं।” मिनी ने अपनी तर्जनी को हल्का झटका दे कर सिगरेट की रख झाड़ ली। वह देवालय में भी सिगरेट पी रही थी।

पीयूष, मेरे पति चार साल से से अमेरिका में हैं। लौटेंगे या नहीं, कह नहीं सकती। मुझे वहां बुलाना भी नहीं चाहते। कहते हैं, वहां की संस्कृति में बच्चे बिगड़ सकते हैं। लेकिन यहां भी बच्चे मेरे बस में कहां हैं? अपनी शादी के बाद मुझे पता चला कि धनवान बाप के बेटे में जो-जो गुण होने चाहिए, वे सब पीयूष में थे। दो बहनों का दुलारा भाई, मां-बाप का लाड़ला बेटा, उस पर शानदार नौकरी, ओहदा। मुझे समझौता तो करना ही था। पीयूष के लिए फ्लर्टिंग और रोमांस, उससे भी आगे औरत का शरीर ही सबकुछ था। बहुत समय नहीं लगा मुझे ये समझने में कि हम दोनों दो अलग संस्कृतियों में पनपे दो बेमेल पौधे हैं। जब प्रेम ही नहीं तो गृहस्थी कैसे चलेगी? मुझे सबकुछ बोझ लगता है राजवीर। घर चलाना, सामान खरीदना, रखरखाव, आखिर किसके लिए कर रही हूं ये सब? लेकिन तब भी बाहरवालों के सामने सहज, संयत रहना पड़ता है। मैं एक यातना, कुंठा लिए फिर रही हूं। दोहरी जिंदगी जी रही हूं। बाहरी जीवन रोज की तरह चल रहा है, लेकिन मेरे अंदर बहुत कुछ टूट रहा है। मेरे आहत मन को कहीं भी चैन नहीं।” उसकी आंखें बरसने लगीं। वह देवालय में नतमस्तक बैठी थी।

“आज एक सच स्वीकार करती हूं राजवीर, काश मैंने तुमसे शादी की होती। उस समय मैंने तुम्हारी आंखें, तुम्हारा मन पढ़ लिया था।”

बीस साल बाद ही सही, मिनी ने दिल की बात स्वीकार की। मैं जान रहा था कि मेरी चंद बातें मिनी को संबल दे सकती हैं। मैंने उसे पीठ से अपनी एक बांह में घेर लिया। उसने अपनी घनेरी पलकों को उठा कर मेरी तरफ देखा, “मुझे मत छोड़ना राज। बहुत अकेली पड़ चुकी हूं। थक गई हूं इस जीवन से,” उसका गला भर आया। मेरा हाथ उसके हाथ में था। उसका अनुरोध मुझे विचलित कर सकता था। अचानक मुझे अपनी सीधी, सरल पत्नी और बच्चों की बहुत याद आने लगी। शाम गहरा रही थी। कमरे में हल्का अंधेरा पसरने लगा था। मैंने अपना हाथ आहिस्ता से उसके हाथ से छुड़ा लिया और बिना कुछ कहे उसके घर से बाहर निकल आया।

- आभा श्रीवास्तव

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