तुम बिल्कुल वैसी हो:पहली बार रौनक को कोई लड़की पसंद आई, लेकिन वह नहीं जानता था कि कोयल उसे मिलेगी या नहीं

12 दिन पहले
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मुंबई से दिल्ली का लंबा सफर राजधानी एक्सप्रेस में उसे आरएसी सीट के साथ करना होगा। पता नहीं सीट मिलेगी भी कि नहीं। इसीलिए उसे अचानक यात्रा करना पसंद नहीं है। पहले से प्लानिंग करके वह चलता है और टिकट कंफर्म होने पर ही निकलता है। लेकिन इस बार जिद कुछ ज्यादा ही की थी मां ने।

“जैसे भी हो, चाहे खड़े होकर आ या सीढ़ी पर लटक कर, बस आ जा। बहुत अच्छा रिश्ता है, इस बार मैं हाथ से जाने नहीं देना चाहती। आखिर कब तक तेरे लिए लड़कियों का जुगाड़ करूं। तूने खुद तो कोई पसंद नहीं की और उम्र निकलती जा रही है।” मां की जिद से ज्यादा उनकी टोन सख्त होती है।

लड़की देखने के सिलसिले में कितनी बार उसे दिल्ली से मुंबई जाना पड़ता था, पर मां कुछ समय अवश्य देती थीं, लेकिन इस बार तो वह अड़ गई थीं कि कल पहुंचना ही है। इस बार मां ने व्हाट्सऐप पर उसे लड़की की फोटो तक नहीं भेजी थी। उसके बार-बार कहने पर भी नहीं। उनका कहना था कि फोटो पहले भेज देती हूं तो आने से पहले से ही लड़की में दस कमियां निकाल लेता है और मिलने पर उसे रिजेक्ट कर देता है।

उसने चेक किया कि सीट पर उसका सहयात्री कौन है। चार्ट पर 'कोयल पुरी' पढ़कर वह मुस्कराया। वह भी दिल्ली तक जा रही है। बस कोई खड़ूस महिला न हो, उसने सोचा।

सीट अभी खाली थी। रौनक ने अपना बैग सीट के नीचे सरका दिया और उस लड़की के बारे में कल्पनाएं करने लगा, जिसके साथ उसे पूरा जीवन गुजारना था, जिसके बारे में मां तारीफ करते थकती नहीं थीं।

मजे की बात है कि वह भी मुंबई में नौकरी करती थी, फिर भी मां इस बात के लिए नहीं राजी हुईं कि वह उससे पहले वहीं मिल ले। उन्होंने कहा था कि वह भी तो दिल्ली आ रही है, जहां उसका घर है, तो फिर तुझे क्या दिक्कत है। मां के सामने कोई तर्क, दलील कहां चलती थी।

“एक्सक्यूज मी,” रौनक को लगा जैसे उसके आसपास कहीं कोयल चहकी है।

“मेरा भी आरएसी है,” उसने अपना एक बैग सीट पर टिकाया और दूसरा सीट के नीचे रखने के प्रयास में झुकी।

“लेट मी हेल्प,” कहते हुए रौनक ने उसका बैग सीट के नीचे रखने में उसकी मदद की।

“थैंक्स,” फिर जैसे कोयल कूकी।

‘वाह! नाम के अनुरूप ही आवाज है,’ रौनक ने सोचा।

वह उसके खिले गुलाब से व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बगैर न रह सका। उसे खुशी थी कि उसकी यात्रा अब उबाऊ नहीं होगी। पूरी रात बैठकर गुजारने की तकलीफ अब उसे परेशान नहीं कर रही थी। खडूस तो वह कतई नहीं थी। 27-28 साल की होगी। रौनक को यूं लड़कियां पहली नजर में कभी लुभाती नहीं, लेकिन उसकी कशिश ही ऐसी थी कि उसका मन कहने लगा, मान ले, ये लड़की अच्छी है, शायद लव एट फर्स्ट साइट है।

“शुक्र है कि आरएसी में तो टिकट मिल गई। मेरा दिल्ली पहुंचना जरूरी है,” उसने शायद बातों का सूत्र जोड़ने के ख्याल से कहा।

ट्रेन चल चुकी थी।

“लेकिन यह जर्नी थकाने वाली होगी,” रौनक बोला।

“कोई बात नहीं। जिस चीज पर हमारा बस न हो, उसके बारे में क्या शिकायत करना।”

रौनक पहले तो उसकी साफगोई पर सकपकाया, फिर मन ही मन उसकी पॉजीटिविटी को सलाम किया।

बेहद सुलझी हुई लड़की है। यानी कि ब्यूटी विद ब्रेन। ‘अब तक कहां छुपी थी, हे कोयल जैसी मधुर स्वर और चमकती चांदनी जैसी शीतल, गुलाब जैसी कोमल, मायाविनी!’ रौनक मन ही मन बुदबुदाया।

वह बीच-बीच में कनखियों से कोयल को देख लेता जो कभी खिड़की से बाहर निहारने लगती तो कभी किताब पढ़ने लगती।

“आप चाहें तो पैर फैलाकर बैठ सकती हैं,” रौनक ने बहुत शालीनता से अपनी सीट पर जगह बनाते हुए कहा।

“थैंक्स,” उसने रौनक की आंखों में देखते हुए कहा।

‘यूं न मुझे तुम देखो’, रौनक का दिल धड़कने लगा। क्या हो रहा है उसे?

बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो एहसास हुआ कि दोनों में बहुत कुछ कॉमन है। उनकी पसंद, नापसंद और विचारों में समानता थी। हां, रौनक थोड़ा कम और कोयल बहुत ज्यादा पॉजीटिव सोच वाली थी।

रौनक को लग रहा था मानो वे एक दूसरे के लिए बने हैं!

कोयल भी शायद ऐसा ही सोच रही थी। दोनों को यह जानकर तब और आश्चर्य हुआ जब उन्हें पता चला कि दोनों एक ही उद्देश्य से दिल्ली जा रहे हैं- जीवनसाथी की तलाश में। हालांकि यह सुन न जाने क्यों रौनक को अच्छा नहीं लगा था।

“तुम्हें कैसी लाइफ पार्टनर चाहिए?” कोयल ने उससे पूछा तो रौनक के मुंह से निकल गया, “तुम जैसी!” वह झेंप गई।

“और तुम्हें?”

“नो कमेंट्स,” कहते हुए वह मुस्कराई।

“दिखने में कैसा है?”

“देखा नहीं। आई मीन, पापा ने कहा फोटो नहीं भेजूंगा, यहीं आकर मिलना। यहां तक कि मुंबई में उससे मिलने से भी मना कर दिया। तो सोच लो, अभी सब रहस्य है।”

रौनक जोर से खिलखिलाया। “क्या कहूं इसे? संयोग? मेरे साथ भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ है। वाह, कितने बढ़िया सहयात्री हैं हम। काश…” कहते-कहते वह चुप हो गया।

“कुछ कह रहे थे?” कोयल ने उसे इस तरह देखा मानो चाह रही हो कि वह कुछ और कहे।

“इस काश को काश ही रहने दो, जिस चीज पर हमारा बस न हो, उसके लिए क्या शिकायत करना,” रौनक ने कोयल की ही बात दोहरा दी।

अब तक दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो चुकी थी। एक-दूसरे के फोन नंबर भी सेव कर लिए गए थे। पूरी रात वह बैठे-बैठे उसे ही सोते देखता रहा। उसने पूरी रात उसके लिए जगह बनाने में ही गुजार दी थी, वह भी खुशी-खुशी।

सुबह इधर-उधर की कुछ बातें हुईं और फिर वह बाय कहकर ट्रेन से उतर गई।

“दिल ले गई वह ट्रेन वाली लड़की,” रौनक जोर से बोला।

“पापा, बस यह आखिरी बार होगा। मैं बार-बार शो पीस नहीं बनना चाहती। आपने बहुत जिद की, इसलिए मैं चली आई। पर अगर अब रिश्ता नहीं हुआ तो आप मुझे शादी करने के लिए फोर्स नहीं करेंगे,” कोयल ने शाम को तैयार होते हुए कहा।

“बच्चे, इस बार लग रहा है सब अच्छा होगा। लड़के के साथ तुम्हारी कुंडली भी मिल गई है। लड़का अच्छे घर से है, बढ़िया पैकेज है और मुंबई में ही रहता है। तुम्हें नौकरी भी नहीं छोड़नी पड़ेगी।” कोयल की मां ने उसके गले में मोतियों का नेकलेस पहनाते हुए कहा।

शाम को जब मां ने कहा कि ‘पुरी फैमिली’ आ गई है तो रौनक के दिल को जैसे झटका लगा। ‘पुरी’ इससे पहले क्यों नहीं उसके दिमाग में यह बात आई थी। कोई संयोग है या? वह तुरंत लिविंग रूम आया।

“बेटा, यह हमारी बेटी कोयल है और कोयल यह है रौनक,” कोयल के पापा ने परिचय कराया। दोनों की नजरें मिलीं, वे मुस्कराए।

“तुम दोनों आराम से बैठकर बात करो, एक-दूसरे को देखो या जानो। हम लोग बाहर लॉन में बैठकर चाय का आनंद लेते हैं,” रौनक की मां ने शरारती लहजे में कहा।

“इन लोगों को फोटो देखने की बहुत ललक थी। अब साक्षात एक-दूसरे को देख लो,” कोयल की मां ने चुटकी ली।

देखने, समझने या पूछने के लिए था ही क्या?

रौनक ने कोयल का हाथ थाम लिया।

“मेरी सहयात्री, मेरे साथ जीवन यात्रा पर कदम रखना चाहोगी?”

“क्या तुम मेरे साथ फिर दिल्ली से मुंबई सफर करना चाहोगे?” कोयल बोली।

“बेशक, लेकिन इस बार कंफर्म टिकट पर।”

खिलखिलाहट से कमरा गूंज गया।

- सुमन बाजपेयी

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