डिजिटल धारावाहिक:फूफा जी ने उसे ही नहीं उसकी मां को भी अपनी हवस का शिकार बनाया, कौमुदी के लिए यह सच असहनीय था

7 दिन पहले
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रेखाचित्र- संदीप राशिनकर - Dainik Bhaskar
रेखाचित्र- संदीप राशिनकर

कौमुदी ने सम्मान के साथ साथ अपना शरीर भी डॉ. चंद्रा को सौंप दिया, लेकिन जब अधिकार देने की बात आयी, तो डॉ. चंद्रा ने हाथ खींच लिए। बिनब्याही मां बनने जा रही कौमुदी के साथ आगे क्या हुआ, ये इस किस्त में पढ़िए…

बुआ मां और कौमुदी प्रतीक्षा करती रह गईं, लेकिन फूफा जी वापस नहीं लौटे। बाद में किसी ने उनकी चादर और एक पत्र ला कर दिया जो गंगा तट की सीढ़ियों पर रखा मिला था। पत्र पर घर का पता लिखा था। कौमुदी ने पत्र पढ़ा-

‘मृदुल की मां,

बरसों से नरक की जिस आग में जल रहा हूं उसे गंगा मां का पानी भी शीतल नहीं कर सकता। जो पाप मैंने किया है, उसका कोई प्रायश्चित नहीं। मुझे तो बहुत पहले ही मर जाना चाहिए था। लेकिन मेरे दायित्व थे अपने परिवार के प्रति इसीलिए रुका रहा। मृदुल की नौकरी लग चुकी है और पाखी का ब्याह हो चुका है। बैंक में तुम्हारे और कौमुदी के लिए काफी रुपया छोड़े जा रहा हूं। कौमुदी से कहना कि हो सके तो अपने इस पापी पिता को क्षमा कर दे। शायद गंगा मां मुझे अपनी शरण में ले ले।

तुम्हारा अभागा पति’

बुआ मां सफेद चेहरा लिए सुन्न मुन्न सी खड़ी रहीं, फिर अनायास ही चीत्कार कर रो पड़ीं। उस सन्नाटे घर में कौमुदी और बुआ मां की सिसकियां रह रह कर गूंजती रहीं।

फूफा जी भले ही किसी से बात नहीं करते थे, लेकिन तब भी घर में उनकी एक आहट तो रहती ही थी। उनकी खबर के बाद भी बुआ मां आंसुओं से रोती हुई घर की तमाम दिनचर्या से जूझती रहीं। घर में इतना सन्नाटा था कि लगता ही नहीं था कि चार दिन पहले यहां बेटी का ब्याह सम्पन्न हुआ है।

जब तक मृदुल और पाखी को खबर की जाती कि इसके अगले ही दिन पता नहीं कैसे बुआ मां के पैर में कील चुभ गई। कौमुदी को बिना बताये उन्होंने पांव में तेल की पट्टी बांध ली। उन्होंने सोचा मामूली सा घाव है, सही हो जायेगा। रात होते होते उन्हें तेज बुखार चढ़ आया।

उनके माथे पर ठंडी पट्टियां बदलते हुए कौमुदी ने कई बार सोचा कि बुआ मां को अपनी भूल के विषय में बता दे, लेकिन उनकी तकलीफ देख कर वह कुछ नहीं कह सकी। उसी रात बुआ मां ने एक भयानक सच उजागर किया था-

“कुमु, बहुत सी बातें मन में दबी रह जाती हैं जो मन को बेचैन किये रहती हैं। आज पता नहीं क्यों तुझसे सभी कुछ कह देने को जी चाह रहा है। क्या तुझे कभी अपनी मां की याद आती है? बता मुझे।’’ बुआ मां का चेहरा ताप से तप रहा था। उत्तेजना से या आत्ममंथन से, पता नहीं किसलिए वे बेचैन थीं, बहुत अधिक बेचैन। कौमुदी की आंखों में मां की याद कर के आंसू आ गए। बुआ मां को क्या पता कि कौमुदी ने सबसे छिपा कर अपनी डायरी में अपनी मां के लिए कितनी चिठ्ठियां लिख रखी थीं।

बुआ मां की आवाज रात के सन्नाटे में अजीब सी लग रही थी-

“मेरे ब्याह के बाद तेरी मां मेरी भाभी बन कर आई थी। ऐसी रूपवती कि घर उजाला हो गया। उतनी ही गुनवंती भी थी तेरी मां। मितभाषिनी, मृदुभाषिणी लेकिन बहुत भावुक। मां को जैसी बहू की आस थी, तेरी मां ठीक वैसी ही थी। शांत, सौम्य, सुन्दर। बरस दर बरस बीत रहे थे, भाई के आंगन में कोई फूल नहीं खिला। किसी में कहीं कोई कमी नहीं थी, लेकिन मां का धीरज जवाब दे रहा था।

हार कर मां ने पंडित, ज्योतिष, झाड़ फूंक, ओझा की शरण ली। कभी कोई गुठली जैसा गन्डा भाभी की बांह पर बंधा देखती, तो कभी मंत्र से शुद्ध किया जल मां, भाभी को पीने को देतीं। कभी सवा लाख मन्त्रों के जाप भाभी निश्चित दिनों तक जपतीं। मां का हर आदेश भाभी सिर माथे लेतीं, पूरा करतीं। हम लोग चमत्कार की आशा करते थे,’’ बुआ मां का ज्वर ताप बढ़ता ही जा रहा था।

वे हांफ रही थीं, लेकिन तब भी वे कहती जा रही थीं, “ तेरे फूफा की रसिकमिजाजी से मैं बहुत अधिक हैरान, परेशान, चौकन्नी रहती थी। वे मेरे मायके आने पर भी हमेशा मेरे साथ ही चले आते। जब से भाई का ब्याह हुआ था, वे भाभी के साथ छेड़खानी करते रहते। ये सहज छेड़छाड़ नहीं रहती थी। कोई समझे या नहीं, मैं सब कुछ समझती थी।

शायद भाभी भी इसे सहज भाव से ननदोई, सलहज का हंसी मजाक ही समझतीं। मायके जाने पर मैं भरसक भाभी की छाया बनी रहती। उस बार जब अचानक ही मां के न रहने की खबर मिली तो मेरा मायके जाना हुआ था। तब तो तेरे फूफा को साथ आना ही था। घर के दामाद थे वो।

मां की अंत्येष्टि संपन्न हो चुकी थी। सभी लोग जा चुके थे। अनायास ही भाई को टूर पर जाना पड़ गया। भाभी को अकेले घर में डर न लगे इसीलिए मैं और तेरे फूफा कुछ दिन और रुक गए। वो अमावस की काली रात थी। घनघोर वर्षा हो रही थी। मैं गहरी नींद में सोई थी कि अचानक दबी-दबी सी चीख सुनाई पड़ी।

चौंक कर उठ बैठी थी मैं। पास का बिस्तर खाली था। लाइट जला कर भाभी के कमरे की तरफ बढ़ी तो शर्म और गुस्से से पानी पानी हो गई। मेरा कामांध पति, मेरी भाभी का मुंह अपनी चौड़ी हथेली से दबा कर उसके साथ अनाचार में लिप्त था। उसके मोटे, विलासी अधर भाभी के कपोलों पर थे। घबरा कर मैं चीख पड़ी। इतने में वह पापी अपना कुकर्म निपटा कर परितृप्त भाव से उठ खड़ा हुआ। भाभी अर्धमूर्छित, अस्वाभाविक सी पलंग पर पड़ी छत को घूर रही थीं।

सबसे पहले मैंने भाभी के अर्धनग्न शरीर को ढक दिया। इससे पहले कि मैं पति से कुछ कह पाती, वह स्वयं ही वहां से लड़खड़ाते हुए कमरे में जा कर सो गया। शराब की दुर्गंध से मेरा सिर भन्ना गया। किसी तरह भाभी को सामान्य करने के प्रयास में मैं स्वयं भी फफक कर रोती जा रही थी, किंतु भाभी निर्विकार, शून्य थीं। भाई को दो दिनों के बाद आना था। इन दो दिनों में भाभी अस्वाभाविक रूप से गुमसुम थीं और मैं अति की चौकन्नी कि कहीं मेरा पति दोबारा से भाभी को अपना शिकार न बना ले।

दो दिनों के बाद भाई वापस आ गए। उन्हें देखते ही भाभी अजीब ढंग से मुस्कराई, फिर बेतरह खिलखिला उठीं। ये खिलखिलाहट सामान्य तो नहीं थी। अपने पति के इस भयानक कुकर्म की बात को मैं दबा ले गई। मुझे पूरी आशा थी कि भाभी भी संभवतः इस बात का जिक्र भाई से नहीं करेंगी। लेकिन इस बात का जिक्र तो तब होता जब भाभी सामान्य होतीं।

आहिस्ता आहिस्ता भाभी में पागलपन के लक्षण दिखाई देने लगे। वह किचन में जातीं तो दूध उबलता रहता, सब्जी जल जाती, वे वैसे ही खोई खोई सी खड़ी रहती। कभी बैठे बैठे ताली ही बजाने लगतीं, खिलखिला पड़तीं। कभी उसकी गगनभेदी चीत्कार सुन कर हम लोग कान बंद कर लेते। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। अक्सर वे चुप ही रहतीं, सामान्य सी। भाई का चेहरा देख कर रुलाई आती थी। तेरे फूफा को जबरदस्ती वापस भेज कर मैं कुछ दिन और मायके में रुक गई। उन्हीं दिनों मुझे पता चला भाभी के पैर भारी हैं। मैं पल भर में ही सब कुछ भांप गई। लेकिन भाई को यह खबर मैंने बहुत खुश हो कर बताई। हम लोगो को यह आशा थी कि कि संभवतः बच्चा हो जाने के बाद भाभी पूरी तरह सामान्य हो जाएं।

गर्भ का समय पूरा हुआ और भाभी को प्रसव वेदना आरंभ हो गई। भाभी का उन्माद उस समय अस्वाभाविक हो गया था। लेडी डॉक्टर की गर्भस्थ शिशु को बाहर ले आने की हर कोशिश विफल हो रही थी। मृत्यु को दोनों हाथों से परे धकेल कर ही लेडी डॉक्टर उस जीवित शिशु को दुनिया में अवतरित करा सकी थी। कौमुदी, तू आई थी दुनिया में,’’ बुआ मां का हलक सूख गया था बोलते बोलते।

कौमुदी ने चम्मच से उनको पानी पिलाया। कुछ चैतन्य हो कर बुआ मां ने फिर कहना शुरू किया, “तुझे जब भाभी की गोद में डाला गया तो भाभी के चेहरे पर कुछ ममता, कुछ संतुलन जैसा दिखा। आंचल से ढक कर तुझे दूध पिलाती भाभी को देख कर मैंने भाई के परिवार की सलामती की कामना करी। कुछ दिन वहां रह कर मैं वापस अपने घर लौट आई। भाई के फोन और पत्र आते रहते। तू कला कला बढ़ रही थी और भाभी तुझमें मगन रहतीं, ऐसा भाई बताते थे। मैं भी मायके जाती तो भाभी को सामान्य देख कर सब्र करती।

लेकिन उस बार मैं जब मायके गई तो बहुत दिनों बाद तेरे फूफा जी भी साथ आ गए थे।

इस बार उनका आना मानो सब कुछ तहस नहस कर गया। उन्हें देखते ही भाभी की आंखों में एक हिंसक चमक उतर आई थी। वे हाथ की करछुल उठाये उन्हें मारने दौड़ पड़ीं। जब तक वे बचते उनके माथे पर करछुल का तेज वार पड़ा और खून की धार बह निकली।

इससे पहले वे कुछ और खून खराबा करतीं, मैंने और भाई ने उन्हें कस कर पकड़ लिया। वे किसी तरह संतुलित नहीं हो पा रही थीं। लग रहा था वे सारी दुनिया से बदला लेने पर उतारू हैं। एक भयानक पागलन का दौरा था ये। तेरे फूफा भी चोट संभालते हुए भीतर गए। मरहम पट्टी कर के बाहर आए तब तक हम लोगों ने फोन करके डॉक्टर को बुला लिया था। एक इंजेक्शन देने के बाद भाभी शांत हो कर सो गई थीं।

लेकिन जितनी बार तेरे फूफा को देखतीं, वही पागलपन का दौरा पड़ जाता। भाई कुछ नहीं समझ पा रहे थे। तीन दिन तक ये तमाशा चलता रहा। हार कर डॉक्टर ने भाभी को मानसिक अस्पताल भेजने के लिए कह दिया। भाभी एक बार वहां गईं तो दोबारा लौट कर नहीं आईं,’’ बुआ मां कहते कहते शिथिल हो चुकी थीं।

कौमुदी ने उनका बुखार नापा, 104 डिग्री था। कौमुदी नहीं भांप सकी कि एक ही दिन में उस साधारण कील के घाव ने टिटनेस का रूप धर लिया था। अगले दिन जब तक बुआ मां अस्पताल पहुंचाई गईं, सब कुछ समाप्त हो गया था।

जिस घर में चंद दिन पहले ब्याह की शहनाइयां बजी थीं वहां आज मृत्यु का मातम पसरा था। मृदुल और पाखी का भी उतनी दूर से तुरंत आ सकना असंभव था। फोन पर ट्रंककॉल से खबर दी गई। फूफा जी के गुम हो जाने की और बुआ मां के नहीं रहने की भी। कुछ पड़ोसी, रिश्तेदार और पाखी के ससुराल वाले मातमपुर्सी के लिए जुट गए थे। पापा भी आए थे और नई मम्मी भी।

बुआ मां की अंत्येष्टि के बाद कौमुदी का क्या होगा? कोई नहीं समझ पा रहा था। आज तक कौमुदी बुआ मां की गोद में स्वयं को सुरक्षित पाती थी। अब वह निराश्रित हो गई थी। मृत्यु मात्र एक शरीर की नहीं होती। कितने ही रिश्ते मर जाते हैं उसके साथ। धीमी पदचाप धरते बुआ मां की मृत्यु भी आई थी और एक बड़े धमाके के साथ कितने सारे प्रश्नों की गूंज छोड़ गई।

सबकी आंखों में आंसू थे और एक सवाल कि कौमुदी शादी क्यों नहीं करती? कई रिश्तेदारों ने लड़के भी सुझाये, लेकिन कौमुदी उस पल कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हो पा रही थी। कौमुदी के पास डॉ. चंद्रा का दिया हुआ नौकरी का अपॉइंटमेंट लेटर था जो लखनऊ के एक प्रसिद्ध कान्वेंट का था। वहां रहने की भी व्यवस्था थी। उसी के दम पर वह आश्वस्त थी। पापा ने उसके सिर पर अपना थरथराता हुआ हाथ धरते हुए कहा, “कौमुदी, चल बेटी, अब यहां कुछ नहीं बचा, अपने पापा के घर चल।’’

- आभा श्रीवास्तव

फूफा जी ने उसे ही नहीं उसकी मां को भी अपनी हवस का शिकार बनाया, कौमुदी के लिए यह सच असहनीय था। बुआ मां के दुनिया से चले जाने के बाद वह बिल्कुल अकेली हो गई। कौमुदी की जिंदगी में आगे क्या भूचाल आने वाला है, ये कल पढ़िए…

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