E-इश्क:उसने जेब से फोन निकाला, वॉट्सऐप खोला, उसका नंबर अनब्लॉक किया और थोड़ी देर तक उसकी डीपी निहारी

7 महीने पहले
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रात के सन्नाटे में घड़ी की टिक-टिक का ही शोर गूंज रहा था। उसकी आंख अचानक से खुली। उसने फोन टटोला, दो बज रहे थे। आदत से मजबूर उसने मैसेज खोले। कोई नोटिफिकेशन नहीं था। उसने दायां हाथ बढ़ा कर बेड-टेबल से सिगरेट का पैकेट उठा लिया और सिगरेट निकाल कर होंठों में दबा ली। सिगरेट का पैकेट पटक कर उसने फिर हाथ बढ़ाया और लाइटर तलाश किया। ऐश-ट्रे नीचे गिर गई, पर लाइटर नहीं मिला। फिर उसने माचिस तलाशी, वह खाली थी। उसने डिब्बी फेंक दी, जो छत से टकराई और बेड पर आ पड़ी। उसने टेबल लैंप जलाया। फिर भी न लाइटर दिखा, न माचिस। किलसते हुए उसने रजाई उतार फेंकी और कमरे की लाइट जलाई। तलब इतनी ज्यादा न होती तो इस सर्दी में वह रजाई से हाथ बाहर न निकालता।

आज यह नींद इस वक्त कैसे खुल गई?

एक बार आंख खुल जाए, फिर लगती भी नहीं कमबख्त।

उसने सारा कमरा छान मारा। किताबों की अलमारी, डस्टबिन, पैंट की जेब। लाइटर कहीं न मिला। उसने एक-एक किताब उलट दी, कोई माचिस भी न मिली। कमरे की हालत बुरी हो गई थी। किताबें उलटी-सीधी पड़ी हुई थीं। कपड़े इधर-उधर बिखरे पड़े थे।

लग रहा था, दो बजे रात भूकंप गुजरकर गया हो।

सिगरेट उसके होंठों में कांप रही थी।

जलती सिगरेट और धड़कता दिल एक जैसे ही तो होते हैं।

थोड़ी देर में किचन की भी वही हालत थी, जो कमरे की हुई थी। हद्द है, गैस लाइटर भी नहीं मिल रहा। माचिस मिल क्यों नहीं रही? कहां मिलेगी ?

माचिस कहीं न मिली तो क्या होगा?

इतनी बेचैनी, इतनी तलब उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। स्लीपर पैरों में डालकर उसने दरवाजा खोल दिया। जनवरी की सर्दी, रात की हवा, वह बुरी तरह कांप गया। लेकिन वापस अंदर जाने की बजाय उसने बाहर कदम बढ़ा दिए।

सर्द रात में सड़क पर दूर-दूर तक कुत्ते भी नहीं नजर आ रहे थे। लैम्प पोस्ट की रोशनी में वह किसी चाय की टपरी की तलाश कर रहा था। चाय नहीं पीना थी, इतनी सी आग चाहिए थी कि सिगरेट सुलग जाए।

वह एक अलग ही कैफियत में बढ़े जा रहा था कि पीछे से एक गाड़ी आकर रुकी, तब वह चौंका। वह पेट्रोल वैन थी। एक पुलिस वाले ने डपटती आवाज में पूछा, "नाइट कर्फ्यू लागू है, मालूम नहीं है क्या? कोरोना से डर नहीं लगता?"

"कोई उचक्का या चरसी होगा", दूसरी आवाज आई।"

"सर, आपके पास लाइटर है।"

"अब्बे तेरी, भक्क चरसी, तुझे तो अंदर डाल ही देना चाहिए, चल थाने।"

"रुको,” दूसरी आवाज ने कहा। "कौन हो तुम, इस समय यहां क्या कर रहे हो, कहां रहते हो?"

"सर, मैं कमला नगर रहता हूं। बस माचिस चाहिए थी।"

"जॉइंट फूंकना है?"

"नहीं सर, बस यह सिगरेट जलाना है।"

"तो माचिस के लिए कमला नगर से पॉलिटेक्निक चौराहे तक पैदल चले आए! नशे में हो?"

उसकी आंखों में इतना सूनापन था कि अल्कोहल ब्रीद एनालाइजर और तलाशी में कुछ नहीं मिलने पर उसे वॉर्निंग देकर पुलिस की गाड़ी भी चुपचाप आगे बढ़ गई।

उसके फेफड़ों तक धुआं खींचने की तलब बेहद तेज हो गई थी।

तभी उसकी नजर सामने वाले घर की खुली खिड़की पर गई। 22-23 साल का एक लड़का बर्फीले थपेड़ों को नजरअंदाज कर फोन पर किसी से मंद-मंद मुस्कुराते बातें कर रहा था। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था, दूसरी तरफ कौन होगा या होगी...

उसी वक्त दोनों की नजरें मिलीं। उसने सिगरेट दिखाते हुए इशारा किया। लड़के ने पास बुलाया।

"कुछ बातें होती हैं रातों में, या तारे जागें या जागे हैं जोगी रातों में" उस्ताद सुल्तान खान की आवाज हवा में तैर रही थी। लड़के ने खिड़की से माचिस नीचे फेंकी।

सिगरेट सुलगाते ही उसने जल्दी-जल्दी गहरे कश लिए। फिर फोन निकाला और वॉट्सऐप खोला, उसका नंबर अनब्लॉक किया और थोड़ी देर तक उसकी डीपी निहारी। लिखना बहुत कुछ था, पर क्या कहां से शुरू करे, समझ नहीं आ रहा था कि लिखे भी या न लिखे। इतनी सर्दी में उंगलियां जमने लगी थीं, लेकिन अंदर कुछ पिघल रहा था। साढ़े तीन बज रहे हैं। सुबह ही रिप्लाय आएगा। यह सोचकर उसने जल्दी से टाइप किया, "कैसी हो?" और फोन फिर से जेब में डाल लिया।

उम्मीद के विपरीत तुरंत फोन वाइब्रेट हुआ और होता ही रहा। स्क्रीन पर उसका नाम और तस्वीर जगमगा रहे थे। ट्रांस की सी हालत में उसने कॉल पिक किया।

जनवरी की ठंड में, बीच सड़क पर, एक 35-36 साल का आदमी, टी-शर्ट लोअर और पतले से जैकेट में फोन पर बतिया रहा था। और सामने के मकान वाला लड़का हैरानी से देख रहा था कि उसके होंठों पर भी वही मुस्कुराहट फैल गई थी। न जाने क्या सोचकर वह नीचे उतरा और उसे नीचे पोर्च में आने का इशारा किया।

कुछ देर बाद अलाव का ताप था, दो कप अदरक वाली चाय थी, कुछ सिगरेटें थीं और बस बातें ही बातें थीं, ढेर सारी बातें, जो न जाने कितनी बार कही-सुनी जा चुकी हैं और दोहराई जाती रहेंगी, ता-कयामत...

सिगरेट के आखिरी कश सा है तू

मिल गया तो ख्वाब, न मिला तो आरजू...

- नाजिया नईम

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