E-इश्क:गिटार पर वो कोई बेचैन-सी धुन बजा रहा था, ऐसी धुन जो मन के तारों को छूकर मथ डाले

11 दिन पहले
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एक उड़ती सी नजर निम्मी ने पूरे वातावरण पर डाली। एक मीठी गंध उसे सहला गई। उम्मीद की किरण मन में जगी और सांसों में जैसे अधीरता का सोता बह निकला। उसने पर्स में से पैसे निकालकर टैक्सी का किराया चुकाया और अटेची उठाकर दाईं ओर की सीढ़ियां चढ़कर बालकनी में आ गई। मन के किसी कोने में दुविधा ने छोटा-सा आकार ले लिया कि वो कहीं इधर उधर न चला गया हो, इस खुशगवार मौसम में क्या पता, किसी दोस्त के साथ पहाड़ी पगडंडियों पर से नीचे उतर गया हो। "खैर, देखा जाएगा, कहीं गया भी होगा तो शहर से तो कहीं बाहर नहीं जाएगा... लेकिन ताला बंद मिला तो?"

इन्हीं आशंकाओं में डूबते-उतरते उसने पूरी बालकनी को पार कर लिया। अचानक उसके पांव रुक से गए...

"वो तो यहीं है।"

पांव फिर उठे, और वो कमरे के दरवाजे तक आ गई। गिटार पर वो कोई बेचैन-सी धुन बजा रहा था, ऐसी धुन जो मन के तारों को छूकर मथ डाले, मूक वेदना की असंख्य लहरें दौड़ा दे। उसे लगा, यह संगीत ध्वनि गिटार की नहीं है, बल्कि दूर पहाड़ों के पीछे कोई दर्द से धीरे-धीरे कराह रहा है।

देहरादून की सुबह अपनी पूरी ताजगी के साथ कमरे में मौजूद थी। अटेची जमीन पर रखकर वो स्टूल पर बैठ गई। हवा के हल्के स्पर्श से उसके माथे पर रेशमी बालों के घुंघराले भंवर मचल रहे थे। गिटार की लय का विकल दर्द शायद उसके मन को भी छू रहा था, तभी तो उसका पूरा चेहरा किसी अनाम गीत का अर्थ बना हुआ था, आंखें उठ कर कभी खिड़की, कभी दीवारों की ओर रह-रह कर उठ जाती थीं। लेकिन... लेकिन, यह न जाने किस शाप का फल था कि ख़ंजन सी उसकी सुंदर आंखों से उनकी रोशनी का पूरा आकाश छीन लिया गया था! जन्म से लेकर अब तक की उम्र के सफर में दौड़ते भागते मृग की तरह इधर-उधर घूमती ये आंखें न जाने कितनी बार आहत हो चुकी होंगी! किस अज्ञात संकेत पर जीवन के पंगु क्षण कर्मठ बनाए होंगे! कैसे...? आखिर कैसे इतना तराशा हुआ व्यक्तित्व, इतनी ऊँची शिक्षा, विनम्रता और जीविका लेकर संवारा होगा।

निम्मी को याद आया वो दिन, जब वो पिछले वर्ष इसी फाल्गुनी मौसम में यहां देहरादून का सहस्त्रफौल देख रही थी, तभी पीछे से किसी का धक्का लगा। सैलानियों की काफी भीड़ थी। उसने झुंझला कर पीछे देखा तो काला चश्मा लगाए एक बहुत ही सुदर्शन युवक को बड़ी ही मोहक मुस्कान लिए खड़ा पाया। भव्य परिवेश... चमचमाते काले जूते और हाथ में एक मोटी जिल्द वाली पुस्तक।

“कमाल है, आपको क्या दिखाई नहीं देता.?”

कहकर वो आगे बढ़ने ही वाली थी कि पीछे से एक घुटी घुटी-सी आवाज़ आयी,

“रियली मैडम, यू आर राइट, ओफ कोर्स मुझे दिखायी नहीं देता। आपको तकलीफ हुई इसलिए क्षमा चाहता हूं।”

“ओह, इस नेत्र हीन को, क्षण भर में कितना कटु व्यवहार दे डाला था उसने, और उसका उत्तर कितना मधुर!” मन तिरोहित हो उठा।

तभी घास पर एक छोटी सी डायरी पैर से टकराई। अरे यहीं तो खड़ा था वो। डायरी में हॉस्टल का पता और कौलेज का नाम था। उसी से जाना वो अंग्रेजी का प्रोफेसर था।

उस दिन से लेकर आज तक, मतलब पूरे एक वर्ष का, एक नया ही जीवन इतिहास रहा है। अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए कितने अंतर्द्वन्दों में, अपने आपको और घरवालों को, निम्मी ने डाला है। इसी स्वीकृति के लिए उसे कितने विरोध सहने पड़े हैं। उसने अपने परिवार में सबको यही बताया है कि मिहिर में क्या कमी है। वो इंग्लिश में एम ए, पी एच डी है। प्रोफ़ेसर है, सभ्य सुसंस्कृत है, अच्छे मित्र हैं उसके, व्यवहार शील है, व्यक्तित्व भी प्रभावशाली है।

इसी तरह एक दिन, मसूरी में मिहिर, एक सेमिनार में मिल गया था। दो दिन की व्यस्तता के कारण एक पल भी नहीं मिला था दोनो को। जब अवकाश मिला, तब मिहिर बेहद उदास होकर बोला, “निम्मी, कौन से क्षणिक आवेश के मोहपाश में ये निर्णय ले लिया तुमने? जिन हथेलियों पर तुम अपना सुहाग नाम रचना चाहती हो, नहीं जानती क्या कि वहां प्रारब्ध के कितने क्रूर संकेत लिखे हुए हैं। उम्र भर के लिए क्यों अपने कंधों पर एक अपाहिज बैसाखी का बोझ टिकाना चाहती हो? अपने आप को मैं सचमुच अपराधी मान रहा हूं।”

“ये तुम नहीं, तुम्हारे मन का भय बोल रहा है। तुम्हें तो खुश होना चाहिए, मुझे प्रेरणा और स्नेह का संकेत देना चाहिए, उल्टे निराशा के सागर में डुबो रहे हो? तुम अपनी कमजोरी से बाहर आना ही नहीं चाहते... क्या इसलिए?”

“कहीं भावुकता में तुम्हारे विश्वास की सतह चटक गयी तो?”

“तुम इसे कच्ची भावुकता भले ही समझो पर यह मेरा अंतिम निर्णय है कि मैं, तुम्हारे मन का अंधेरा खुशियों की रोशनी से भरना चाहती हूं।”

“कहीं इस शून्य की परत को पाटते-पाटते तुम स्वयं तो पथरा नहीं जाओगी?”

“मिहिर, ये निर्णय मैंने सोच-समझ कर लिया है। निर्णय लेने में अपना ही चिंतन नहीं था, बल्कि तुम्हारी भावनाओं ने इसे और भी मजबूत बनाया है। विश्वास रखो, मैं तुम्हारी आंखों की रोशनी बनूंगी और मजबूत सहारा भी।

मिहिर ने उसके हाथों को थामते हुए प्यार से पूछा, “आखिर तुम कौन हो?” निम्मी का जवाब था, “मैं तुम्हारी रोशनी!”

- पुष्पा भाटिया

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