प्यार में धोखा:पहले प्यार से आहत आयशा की जिंदगी में जब विवेक मोहब्बत बनकर आया तो उसके लिए फैसला करना मुश्किल हो गया

2 महीने पहले
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वाह! एक हफ्ते की छुट्टी और एक हफ्ते का वर्क फ्रॉम होम! दो हफ्ते के लिए घर का सुकून। हवाई जहाज ही नहीं आयशा का दिल भी आसमान की सैर कर रहा था। मां को पूरे दो हफ्ते का मेन्यू भेज दिया था। पिछली बार फाइनली सबको दोबारा शादी के लिए जबरदस्ती न करने को भी मना लिया था।

वो दोबारा चोट खाने को तैयार नहीं थी। अविनय जैसे हैवान से इतनी मुश्किल से पीछा छूटा था। अब तो बस अपनी जॉब और छुट्टियों में घर पर आराम और मां के हाथ का खाना।

तभी हवाई जहाज अचानक हिलने लगा। बगल के यात्री ने उसका हाथ कसकर थाम लिया। “ये क्या बदतमीजी है!” आयशा बोलने को हुई, पर उसका सहमा हुआ चेहरा देखकर दया भी आ गई और हंसी भी।

“चिंता न कीजिए, खराब मौसम में ऐसा होता है अक्सर,” वो सांत्वना देते हुए बोली। कुछ देर में जहाज तो हिलना बंद हो गया, पर उस अजनबी को बात करने का बहाना मिल गया।

यूं तो आयशा बहुत रिजर्व किस्म की लड़की थी, इतनी कि उसका कोई दोस्त तक नहीं था। उसकी कंपनी में किसी को उससे बिन मतलब बात करने की हिम्मत न होती थी। यहां तक कि बॉस को भी नहीं। पर इस यात्री की बातों में न जाने ऐसी कौन सी कशिश थी कि आयशा को बुरा तक नहीं लगा। यहां तक कि जब उसने अपने टबलेट पर अपना बनाया कार्टून और मीम्स का कलेक्शन दिखाया तो हंसते-हंसते आयशा की आंखों में पानी आ गया।

हवाई जहाज से उतरते ही आयशा ने नोटिस किया कि उसका व्यवहार बिल्कुल बदल गया है। वो डरा-सहमा सा गांव का लगने वाला आदमी एक स्मार्ट और वेल क्वालिफाइड आदमी लगने लगा। सामान की बेल्ट पर वो साथ ही था। उसने अपने साथ आयशा का सामान उतरवाने में और ट्राली पर रखने में भी आयशा की मदद की।

बाहर निकले तो उसका ड्राइवर आया हुआ था और आयशा के पापा। वो अपना कार्ड पकड़ाकर निकल गया। पापा से सात महीने बाद मिल रही आयशा ने उत्साह में कार्ड बिना देखे पर्स में रखा और पापा से दौड़कर लिपट गई।

मौसी की बेटी की शादी में सब मस्त थे। आयशा ने अपने मनपसंद लुक में सेल्फी लेने के लिए पर्स से क्लिप निकालते हुए उसका कार्ड देखा। “अरे! इतनी बड़ी कंपनी का सीईओ?” वो आश्चर्य से बुदबुदाई।

“क्यों? मेरे चेहरे पर लिखा है कि मैं सीईओ नहीं हो सकता?” उसे अपने सामने मुस्कुराते हुए खड़ा देखकर वो चौंक गई।

“अरे, पर आप यहां कैसे? नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था।”

“ये मेरा दोस्त है, विवेक। याद है?” भाई विकास के याद दिलाने पर आयशा को याद आया। भाई ने फिर से याद दिलाते हुए बताया, “वही विवेक जिसे ऊंचाई से फोबिया था इसलिए हमारे फ्लैट पर कभी नहीं आता था।”

“अच्छा, तो इसीलिए आप उस दिन हवाई जहाज में बैठे डरे-सहमे गांव के मासूम लग रहे थे।” आयशा हंसी।

“पता है, पहली बार मैंने अपनी इस बीमारी के लिए ईश्वर का धन्यवाद किया। इसकी वजह से ही तो आपकी सहानुभूति भी मिली और दोस्ती भी।” विवेक ने आयशा की आंखों में आंखें डालकर कुछ इस अंदाज में कहा कि वो झेंप गई।

बातों का दौर चला तो बात से बात निकलती गई। पार्टी कब खत्म हो गई पता ही नहीं चला। रात को सोने के लिए लेटी तो याद आई वो बातें जो दूसरी बात शुरू हो जाने के कारण अधूरी रह गई थीं। आयशा ने टैब उठा लिया।

दूसरे दिन सब सुबह लॉन में बैठे थे। मां ने नाश्ता लगवाया ही था कि वो आ गया। उसे देखते ही आयशा के चेहरे पर चमक आ गई और मां-पापा की आंखों में मुस्कान।

“क्यों न पिकनिक पर चला जाए?” उसके इस प्रस्ताव पर सब बुझी निगाहों से अपनी ‘घर-घुसनी’ ‘आलसी’ और ‘रिजर्व’ जैसे उपनामों से नवाजी जाने वाली आयशा को देखने लगे। पर सबके अंदाजों के उलट आयशा बोल पड़ी, “अरे हां, हमने अपने शहर की घूमने वाली जगहें ही कभी नहीं देखीं।”

पिकनिक में सेल्फी लेते हुए अचानक दो मजबूत हाथों ने आयशा को पकड़ा और अपनी ओर खींचकर खुद से सटा लिया। तभी एक कार तेजी से उसके बगल से निकल गई। “क्या बच्चों की तरह...” वो बोलते हुए रुक गया। उसने देखा, आयशा को शायद उसके सीने से लगा रहना अच्छा लग रहा था। वो विभोर सी थी। इस छुअन से अभिभूत तो वो भी था। इसके बाद तो ऊंचे-नीचे रास्तों पर एक दूसरे को हाथ देते हुए या एक-दूसरे की आंखों में खो जाते हुए वे एक अनोखी सिहरन और जुड़ाव को महसूस कर सकते थे।

“ओह! पंद्रह दिन कैसे निकल गए पता ही नहीं चला।” आयशा मां से लिपट कर रो सी दी।

मां को मौका मिल गया। उसका हाथ पकड़कर बोलीं, “विवेक रोज आता रहा है। मैंने तुम्हारी आंखों में…”

“नहीं मां, अब नहीं…” कहकर वो निकल गई।

एयरपोर्ट पर विवेक को देख हल्की सी मुस्कान चेहरे पर आ गई। “मैं भी आपके साथ चल रहा हूं। मुंबई का काम निपटा आउंगा।”

“मगर आप तो ट्रेन से टैवेल करना पसंद करते हैं न? आपने कहा था उस बार मजबूरी में…”

“आप साथ होंगी ना! आपका हाथ थामकर सफर कट जाएगा।” विवेक ने इतने भावुक अंदाज में कहा कि आयशा कुछ बोल न पाई।

विवेक पूरे सफर के दौरान आयशा का हाथ थामे बतियाता रहा। अब की बार आयशा को नजर आ रहा था कि वो अपने डर को खुद पर हावी न होने देने के लिए बतिया रहा है।

बिदाई की बेला आई। दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा। भावनाओं की गहराइयां नापी, पर अगले ही पल आयशा सतर्क हो गई। बड़े ही फॉर्मल अंदाज में बोली, “ओके, देन!”

आयशा पलटकर कुछ दूर चली ही थी कि विवेक ने आवाज दी, “एक बात पूछूं?”

“जी?” आयशा ऐसे पलटी जैसे उसकी पुकार का ही इंतजार कर रही हो।

“मैंने तो आपका हाथ थामकर अपने फोबिया पर विजय पा ली। क्या आप अपने फोबिया से निपटने के लिए मुझे हाथ थामने के लायक समझती हैं?”

आयशा की पलकें छलक उठीं। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी।

उसके मन का हाल समझते हुए विवेक ने कहा, “अपना समय लीजिए। आराम से सोचिए और धीरे-धीरे मेरा हाथ थामने बढ़िए। पिछला प्यार आपकी जिंदगी में आंधी की तरह आया था इसलिए मन को तहस-नहस करके गया। इस बार इसे धीमी महकती हवा की तरह जिंदगी में आने दीजिए। आपकी जिंदगी खुशबू से भर जाएगी।”

आयशा के होंठो पर आश्वासन की मुस्कान आ गई। उसने आगे बढ़कर विवेक का हाथ थाम लिया।

- भावना प्रकाश

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