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E-इश्क:मां से कह कर निकला था कि आज तुमसे शादी करके ही लौटूंगा, पर लगता है सितारा बन टंकने का वक्त आ गया

18 दिन पहले
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‘‘क्या कल नीले अंबर पर चमकते सितारों को देखा था?’’

‘‘अभी तक सोई हो क्या? जागो, उठो। हेलो..!’’

वॉट्सऐप पर एक के बाद एक मैसेज लहराए।

अलसाई-सी नीलांबरी ने एक करवट ली। मोबाइल उठाया। उसके चेहरे पर एक गुलाबी आभा फैल गई।

‘‘हेलो! मेरे घर की खिड़की से तारे नजर नहीं आते,’’ नींद से बोझिल पलकों को बहुत मुश्किल से खोलने की कोशिश करते हुए उसने जवाब में मैसेज भेजा।

“ओहो, सितारे देखने के लिए खिड़की से बाहर झांकने की जरूरत कहां होती है। मन के अंबर में ही झांक कर देख लेतीं, शायद मैं ही तुम्हें टिमटिमाता नजर आ जाता।’’ फिर से मैसेज मोबाइल पर आकर टंग गया।

‘‘आकाश, तुम्हारे भीतर का कवि कोई भी मौका नहीं छोड़ता न लच्छेदार बातें करने का? तुम टिमटिमाते रहो जहां मन करे, लेकिन मुझे सोने दो। आज संडे है, तंग मत करो। वैसे भी शाम को तो मिल ही रहे हैं। लेकिन क्या पता कौन तुम्हारा रास्ता रोक ले…’’ मैसेज करने के बजाय फोन मिलाकर बात करना ज्यादा आसान लगता है नीलांबरी को।

‘‘शुभ-शुभ बोलो। क्यों मूड खराब करती हो? चाहे कोई कितनी अड़चनें पैदा करे, मैं तुमसे जरूर मिलूंगा। मेरा वादा है। मां से मैंने कह दिया है कि वह पापा को कैसे भी मना लें। चाहे वे रोज कितनी ही लड़कियां दिखाएं, लेकिन मैं शादी तो तुमसे ही करूंगा,’’ आकाश के स्वर में थोड़ी देर पहले जो उत्साह था, वह उदासी में बदल गया था।

‘‘वादा निभाना आकाश। कितनी बार तो तुम कह कर नहीं मिले हो। समझती हूं तुम्हारी मजबूरियां, पर मेरे लिए तुम्हारा इंतजार करना किसी सजा से कम नहीं है। फिर भी हर बार इंतजार करती हूं इस उम्मीद से कि तुम इस बार तो आओगे। अम्मा-अप्पा मुझे वापस वायनाड बुला रहे हैं। वे कहते हैं या तो मैं शादी कर लूं, नहीं तो वापस लौट आंऊ। अप्पा ने वहां मेरे स्टूडियो के लिए जगह भी खरीद ली है।’’

‘‘पक्का वादा। अब तो सो जाओ मेरी परी। शाम को मैं तुम्हें खिले हुए गुलाब की तरह देखना चाहता हूं। सरप्राइज के लिए भी तैयार रहना,’’ कहते हुए आकाश ने फोन रख दिया।

‘‘सरप्राइज!’’ नीलांबरी सोच में डूब गई थी। नींद तो कब की भाग चुकी थी। नए साल की सुबह देखने वह चाय का कप लिए कमरे की खिड़की से बाहर झांकने लगी। पर उसका मन तो आकाश के बारे में ही सोच रहा था।

दो साल हो गए हैं उन्हें मिले हुए। उसकी पेंटिंग एक्जीबीशन देखने आया था। पेंटिंग के सामने खड़े हो जब उसे कविता करते देखा तो वह उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी। ‘‘आपके चित्र बोलते हैं। कविताएं उन्हें देख बह रही हैं मेरे अंदर से। लगता है जैसे मुझे मेरी प्रेरणा मिल गई है।’’

जब तक एक्जीबीशन लगी रही, वह रोज आता रहा। उसके बाद उनके मिलने का सिलसिला शुरू हो गया। वह वैसे तो आईटी कंपनी में काम करता था, पर दिल से कलाकार ही था। कविताओं को कागज पर उतारता था। वह चित्र बनाती तो वह उस पर कविताएं रच देता। पहले उसकी कविताओं ने नीलांबरी के दिल पर दस्तक दी और फिर उसके प्यार ने। आकाश की संवेदनशीलता कई बार उसे डरा भी जाती थी। ‘‘पागलों की तरह प्यार मत करो, डर लगता है। कहीं नजर न लग जाए हमारे प्यार को,’’ वह उसका हाथ कसकर थाम लेती। जैसे कहीं छूट न जाए।

वह तब उसे बांहों में भर कहता, ‘‘बेफिक्र रहो, मैं आकाश हूं, नीलांबरी के अंबर पर गोल सितारे की तरह हमेशा टिमटिमाता रहूंगा।’’

‘‘और तुम्हारे घरवाले अपनाएंगे मुझे?’’

‘‘अरे, तुम इतनी साफ हिंदी बोलती हो कि उन्हें पता ही नहीं चलेगा के तुम मलयाली हो। कह दूंगा हमारी ही तरह ब्राह्मण है। मुझे जाति-धर्म से कोई फर्क नहीं पड़ता।’’

‘‘उन्हें सच बता दो। तुम्हारे माता-पिता को अंधेरे में रखना ठीक नहीं।’’

हफ्ते तक फिर उनकी मुलाकात नहीं हुई थी। फोन करती तो संक्षिप्त बात कर वह फोन रख देता।

शाम को घर आया था वह पूरे आठ दिन बाद।

‘‘बता दिया सच। लड़कियां दिखाने का कार्यक्रम शुरू हो गया है। पांच दिनों में चार लड़कियां देख चुका हूं। पता नहीं मां इतने रिश्ते कहां से जुटा लाती हैं। मद्रासी लड़की उनके घर में नहीं आएगी। भूख हड़ताल पर बैठ गई हैं। पापा मुझे देखते ही भड़क उठते हैं कि उनके खानदान में ऐसा नालायक बेटा किसी का नहीं है। धमकी दी है कि तुम्हारा साथ छोड़ दूं, वरना बहुत बुरा होगा। तुम्हारे अप्पा का फोन नंबर मांग रहे थे।’’

‘‘मेरा साथ छोड़ दो आकाश। मैं भी वापस लौट जाती हूं। पांच साल से दिल्ली में अकेले रहते-रहते उकता भी गई हूं। जितना सीखना था सीख लिया।’’

‘‘जिस दिन तुम्हें छोड़ने की नौबत आई न, मैं दुनिया को ही छोड़ दूंगा।’’ आकाश की भावुकता अक्सर नीलांबरी को डरा जाती थी। कितनी बार वह उससे मिलने का वादा कर आता नहीं था। घरवाले कोई न कोई रोड़ा अटका देते थे। कभी धमकी देते, कभी लड़की देखने की जिद करते। विद्रोह शायद वह नहीं कर पाता था। कवि मन उसे ऐसा करने से रोक देता था।

आज नीलांबरी के मन में एक नई उम्मीद जगी थी। वह मन ही मन सोच रही थी, ‘आकाश सरप्राइज भी देने वाला है। हो सकता है उसके मम्मी-पापा मान गए हों।’

गुलाबी रंग की साड़ी पहन वह तैयार हो गई। उसके बर्थडे पर आकाश ने ही दी थी। साथ में मोतियों की लंबी माला डाली और गुलाबी लिपस्टिक भी लगा ली। उसकी सांवली रंगत खिल उठी थी गुलाब की तरह।

आधा घंटा बीत चुका था रेस्तरां में इंतजार करते-करते। अब उसका मन डरने लगा था। “इस बार भी नहीं आएगा क्या वादा करके,” वह मन ही मन बुदबुदाई।

‘‘आई लव यू। बस पहुंच रहा हूं। बहुत ज्यादा ट्रैफिक था, लेकिन अब मैंने स्पीड पकड़ ली है। मेरा इंतजार करना। वेट फॉर माई सरप्राइज।’’ ऑडियो मैसेज सुन उसे थोड़ी तसल्ली हुई।

वह बाहर आकर खड़ी हो गई। रात गहराती जा रही थी। रेस्तरां में लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। इंतजार कितना चुभता है, उसने लंबी सांस ली।

एक बार फिर उसका फोन बजा। आकाश का नंबर था। ‘‘पहुंचे नहीं अब तक?’’ वह झल्ला उठी थी।

‘‘मैडम, ये जिनका फोन है, उनका एक्सीडेंट हो गया है। लास्ट डायल आपका नंबर था। आप अस्पताल पहुंचिए।’’

उसके तो जैसे होश उड़ गए। बदहवास सी वह हॉस्पिटल पहुंची।

‘‘ही इज वैरी क्रिटिकल, किसी नीलांबरी से मिलने की जिद कर रहे हैं,’’ डॉक्टर ने उसे देखते हुए कहा।

वह दौड़ी। खून से लथपथ आकाश ने उसे देख मुस्कराने की कोशिश की।

‘‘सॉरी नीलांबरी, इस बार भी वादा नहीं निभा पाया। मां से तो कह कर निकला था कि तुमसे आज शादी करके ही लौटूंगा, पर लगता है सचमुच में आसमान में सितारा बन टंकने का वक्त आ गया है। तुम्हारा सरप्राइज।’’ अपनी मुट्ठी खोल उसने कांपते हाथों से नीलांबरी की अंगुली में अंगूठी पहना दी। ‘‘विल यू मैरी मी नीलांबरी?’’

‘‘हां, हां।’’ वह रोते हुए यही कह रही थी। जा चुका था आकाश।

गहराती रात में उसने ऊपर आसमान में देखा। एक गोल सितारा टिमटिमा रहा था।

- सुमन बाजपेयी

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