E-इश्क:उनसे मिलना, बातें करना, उनके पास, उनके साथ रहना, उन्हें देखना मुझे बहुत अच्छा लगता था

7 महीने पहले
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जब अचानक ही समीर ने जयंती से गांव चलने की बात कही तो जयंती चौंक उठी। अपने ब्याह के बीते सत्रह बरसों में वे दोनों एक बार भी गांव यानी जयंती की ससुराल नहीं गए थे। समीर के माता-पिता दोनों का ही स्वर्गवास हो चुका था। जेठ-जेठानी ही जयंती के लिए सास-ससुर तुल्य थे। जयंती ने कभी गांव देखा ही नहीं था। ब्याह से पहले जब उसे पता चला था कि समीर का पुश्तैनी घर पहाड़ के गांव में है तो वो प्रसन्न हो गई थी। पहाड़ और गांव- क्या कहना। कविता और कहानी लिखने पढ़ने वाली जयंती तो उस समय बस अपने सपनों में ही मगन हो गई। लेकिन हां, ये अलग बात थी जिसे वो काफी समय के बाद समझ पाई थी वो ये कि समीर उसे अपने गांव ले जाने से हमेशा ही हिचकिचाता रहा था। साथ ही उसे ये भी लगता था कि उसके जेठ जी और मालती भाभी भी नहीं चाहते थे कि समीर और जयंती कभी गांव आएं। मिलना-मिलाना दिल्ली में ही हो जाता था। वैसे आपसी मेल-मिलाप, प्यार-दुलार, स्नेह-सौहार्द में कहीं कोई कमी नहीं थी। जयंती ही नहीं, अपनी बेटी सिया को भी समीर कभी गांव लेकर नहीं गया। फिर जब सिया अपनी स्कूलिंग समाप्त करके प्रोफेशनल स्टडीज के लिए बाहर गई तो पता नहीं कैसे समीर ने जयंती के सामने गांव चलने का प्रस्ताव रख दिया। शायद इसका एक कारण ये भी रहा होगा कि पिछले दो बरस से चलने-फिरने में दिक्कत होने के कारण भईया भाभी दिल्ली आ ही नहीं सके थे।

गांव चलने के नाम पर जयंती खुशी के मारे हुलस ही पड़ी। जैसे-जैसे कार गांव के निकट पहुंच रही थी, जयंती की खुशी देखते ही बनती थी। वो एक छोटी सी पहाड़ी जगह थी। घुमावदार रास्ते, देवदार और चीड़ के सघन पेड़, पहाड़ियों से गिरते हुए छोटे-छोटे झरने। जयंती मुग्ध हो कर उस ग्रामीण पर्वतीय सुषमा को जैसे आंखों से पी रही थी। सड़क के किनारे कुछ दुकानें चाय की, कुछ ढाबे, कुछ मिली जुली वस्तुओं की दुकानें दिखाई दे रही थीं। रास्ते में एक देवी दुर्गा का मंदिर भी पड़ा। छोटा लेकिन भव्य। जयंती ने कार में बैठे बैठे ही सिर नवा दिया।

माघ महीना समाप्ति पर था। ठंड थी, लेकिन बस सुबह और शाम की। दोपहर की धूप में लगता जैसे चैत का महीना चल रहा हो। एक सुहावनी यात्रा करते हुए शाम ढलने के साथ उनकी कार घर के दरवाजे पर पहुंच चुकी थी। मालती भाभी दौड़ी आईं। उनके हाथ में पूजा की थाली थी। देवर-देवरानी की आरती उतार, जयंती को बाहों में समेट कर वो भीतर ले गईं। नववधू सरीखी एक सलज्ज मुस्कान जयंती के अधरों पर तैर गई। भईया पूजाघर में चौकी पर बैठे संध्या वंदन में जुटे थे। होंठों ही होंठों में मंत्रोच्चार कर रहे थे। हाथ जोड़े, आंखें मूंदे, सिर झुकाए। पूजा समाप्त कर के उठे और समीर को गले लगा लिया।

चाय पीते-पीते अंधेरा पूरी तरह घिर आया था। भाभी और जयंती रसोई में जुटीं तो समीर चंद पलों के लिए बाहर निकल आया। देवदार के पत्तों से छनती चांदनी, चारों तरफ फैली पहाड़ियां, सामने की विस्तृत घाटी, दूर हिमालय की बरफ से ढकी चोटियां- सबकुछ समीर को किसी भूले बिसरे प्रिय सा लग उठा था। लकड़ी के गेट से टिके हुए समीर ने अगले मोड़ पर बसे हुए पांडे चाचा जी की खिड़की की तरफ देखा। अंधेरे ने पूरी तरह उस घर को ढांप रखा था। एक अजीब सी बेचैनी उसके तन मन में व्याप गई। घबरा कर वो भीतर आ गया।

“भाभी, वो रमा दीदी का घर इतना अंधेरा क्यों है?’’ खाने की टेबल पर स्वयं को रोकते रोकते भी समीर पूछ बैठा। “वो पांडे जी वाला घर?’’ भाभी सहज भाव से कह उठीं, “लला, वहां तो अब कोई नहीं रहता। पांडे जी और पंडिताइन तो कब के दुनिया छोड़ गए। और रमा…” कहते कहते भाभी कुछ उलझ गईं। फिर बात को बदलते हुए हंस कर कह बैठीं, “जयंती, पता है, गांव में रहते हुए हमारे लाला जी अक्सर नींद में चला करते थे। इस बार देखे रहना।’’

जयंती ने आश्चर्य से समीर को देखा। समीर सिर खुजाते हुए बोल पड़ा, “ क्या भाभी... वो तो बचपन की बात थी। अब कहां…” लेकिन भीतर ही भीतर वो परेशान हो गया था। आज बरसों बाद वो गांव लौटा था। तो क्या इस बार भी वही सब होगा? जयंती क्या सोचेगी? वो कुछ-कुछ घबरा सा गया था।

आधी रात बीतते न बीतते फिर वही बरसों पहले की हिचकियों वाली रुलाई समीर को सुनाई पड़ने लगी थी। वो एक बार फिर बिस्तर से उठ खड़ा हुआ बाहर चले जाने के लिए। जयंती जाग रही थी। उनींदा सा समीर जैसे ही कुण्डी खोलने के लिए बढ़ा, जयंती ने उसकी पीठ पर थपकी दे दी,“समीर!” और समीर जैसे गहरी नींद से जाग उठा।

“जयंती, कुछ सुनाई पड़ा तुम्हें? सुनो, रमा दीदी रो रही हैं। मैंने कुछ भी नहीं किया, किसी से कुछ भी नहीं कहा मैंने, सच।” समीर बेचैन था, घबराया हुआ, खोया हुआ। जयंती ने उसे थाम रखा था मानो उसे एक संबल, एक आश्वासन दे रही हो। जब समीर कुछ शांत हुआ तो वो उसके लिए कॉफी बना कर ले आई। भईया भाभी ऊपर के कमरे में सो रहे थे। कॉफी पीते हुए समीर कुछ संतुलित हुआ, “जानती हो, जयंती, मेरा गांव मुझसे क्यों छूट गया?’’ समीर अपनी यादों का रेशा-रेशा बुनने लगा था, “एक थीं रमा दीदी। बहुत प्यारी, बहुत सुन्दर। चम्पई रंग, नुकीली नाक, रतनारी आंखें। बोली इतनी मीठी कि जी करता सुनते ही रहो।” जयंती के मन में ईर्ष्या की एक फांस सी चुभ गई। लेकिन बेपरवाह समीर कहता ही रहा, “मुझे कितना स्नेह देती थीं रमा दीदी। उनसे मिलना, बातें करना, उनके पास, उनके साथ रहना, उन्हें देखना मुझे बहुत अच्छा लगता था। वो मुझे किसी प्रार्थना की तरह पवित्र लगतीं। मैं उन दिनों दस बरस का था, बिलकुल भोला और नादान। रमा दीदी करीब बीस बाईस बरस की रही होंगी। रमा दीदी मुझ पर इतना प्यार दुलार लुटातीं कि मैं उसमें भीग-भीग जाता। सोचता कि बड़ा हो कर मैं रमा दीदी से ही ब्याह करूंगा। लेकिन उन्हीं दिनों मुझे पता चला कि रमा दीदी का किसी श्याम नाम के लड़के से लगाव हो गया है। बहुत बार रमा दीदी ने मुझे चिट्ठियां भी थमाई थीं श्याम को दे देने के लिए।

श्याम एक दलित लड़का था, लेकिन देखने में वो किसी उच्च कुल का लगता था। चौड़ा माथा, सुन्दर मुखड़ा, गठा बदन। गांव में कई तरह की अफवाहें थीं, उसके लिए, उसकी मां के लिए। फिर एक दिन मैंने रमा दीदी और श्याम को एकांत में मिलते, हंसते बोलते, आलिंगन करते देख लिया। उस पल रमा दीदी की निगाह भी मुझ पर पड़ गई और वो काफी घबरा गई थीं कि मैं गांव या घर में कहीं किसी से कुछ कह न दूं। लेकिन जब बहुत दिनों तक मैंने किसी से कुछ नहीं कहा तो रमा दीदी को मुझ पर विश्वास हो गया। उनका मुझ पर प्यार दुलार और भी बढ़ गया। ये सब बहुत दिनों तक नहीं चल सका। मैं मां के साथ आठ दस दिनों के लिए मामा के घर गया था। लौटने पर पता चला कि श्याम और रमा दीदी की बात गांव में सभी लोगों को पता चल चुकी है।’’ कहते कहते समीर का गला रूंध गया, आंखें भर आईं और वो सचमुच रोने लगा।

“श्याम चूंकि पांडे जी की जात बिरादरी का नहीं था इसलिए रमा दीदी से उसका मेलमिलाप उन दिनों पाप समझा गया। श्याम रातोंरात गांव से लापता हो गया, शायद कभी लौट कर न आने के लिए। मैं रमा दीदी से मिलने भागा गया। वो अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी थीं। रो रही थीं। कभी स्वर में, कभी निःशब्द, कुछ सिसकियां, कुछ हिचकियां मुझे सुनाई दी थीं। लेकिन मुझे देखते ही रमा दीदी के सुन्दर चेहरे पर एक बेरुखी और क्रोध छा गया। उन्होंने मुझे झिड़क कर भगा दिया। मैं अपनी सफाई देना चाहता था। उनसे बहुत कुछ कहना चाहता था, लेकिन सब व्यर्थ। उस समय मुझे ऐसा लगा जैसे रमा दीदी की निगाहों में मैं बहुत नीचे गिर गया हूं।

फिर बदनामी के डर से बहुत जल्दी उनका ब्याह भी कर दिया गया। पास ही के एक गांव में ससुराल थी उनकी। उनका दूल्हा चिन्तामणि मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगा। दुबला, काला और कुछ बीमार सा। वो जजमानी और पूजा का काम किया करता था। विदा के समय रमा दीदी की तीव्र, तेज रुलाई मुझे आतंकित कर गई।

रमा दीदी तो विदा हो गईं, लेकिन तब से हर आठवें दसवें दिन आधी रात को मुझे लगता कि जैसे कोई रो-रो कर मुझे बुला रहा है। मैं अपनी सफाई में कुछ कहना चाहता हूं, लेकिन कह नहीं पा रहा हूं। मेरा कंठ अवरुद्ध होता जा रहा है। मैं आधी रात को जब-तब बिना किसी को बताये रमा दीदी की खिड़की के पास जा कर खड़ा हो जाता। घर में सब लोग समझने लगे कि मुझे नींद में चलने की बीमारी हो गई है। इलाज भी हुआ, लेकिन जब कुछ था ही नहीं तो सब व्यर्थ ही रहा।

आखिरकार मुझे पढ़ाई के लिए दिल्ली भेज दिया गया। दिल्ली जा कर हमेशा सब कुछ सामान्य रहा। दो एक बार जब भी गांव आया तो मुझे हर रात रमा दीदी के रोने की आवाज सुनाई देती रही और फिर वही सब... । धीरे-धीरे मेरा घर आना बंद हो गया, क्योंकि मेरे इस सम्मोहन, पागलपन को कोई समझ ही नहीं पा रहा था। आज बरसों बाद जैसे एक बार फिर वही रुलाई मुझे पुकार रही थी।’’ समीर बहुत उदास हो गया, “ पता नहीं अब रमा दीदी कहां होंगी, किस हाल में होंगी?”

“रमा अब इस दुनिया में नहीं रही समीर,” सहसा मालती भाभी का स्वर सुन कर समीर चौंक पड़ा। रात बीत गई थी। सूर्योदय बस होने ही वाला था। भोर की पहली किरण फूट रही थी। चाय लिए मालती भाभी दरवाजे पर खड़ी थीं। उन दोनों को चाय थमाते हुए स्वयं भी अपना कप लेकर भाभी वहीं बैठ गईं, “रमा का दूल्हा बीमार रहता था। मिर्गी के भयानक दौरे पड़ते थे उसको। ये बात ब्याह के समय छिपाई गई थी। पहली विदा में मायके लौटी रमा बहुत उदास थी। ये ब्याह धोखे से हुआ था, सिर्फ दहेज के लालच में। पांडे दंपति पर मानो वज्रपात हो गया। लेकिन तब भी रमा मायके में नहीं रुकी। गौने में ससुराल लौट ही गई। चार महीने बाद ही पता चला कि रमा के पति की मृत्यु हो गई है। जब तक मायके से कोई पहुंचता, पता चला सोलह शृंगार किये, पति का सिर गोद में रख कर रमा, पति के साथ ही चिता में जलकर राख हो चुकी थी। बहुत अफवाहें सुनने में आईं, लेकिन सच क्या था, कुछ पता नहीं चल सका। सुनने में आया था कि उस समय पूरा गांव ‘सती मैया की जयकार’ से गूंज उठा था। लोगों में इतनी श्रद्धा, इतनी आस्था उमड़ पड़ी थी कि पुलिस या प्रशासन, कोई भी कुछ नहीं कर सका।’’

जयंती और समीर के चेहरे पर एक के बाद एक रंग आ जा रहे थे।

“इसे अंधविश्वास भी कहा जा सकता है, लेकिन तब से गांव की हर नवब्याहता बहू, बेटी उस ‘सती मैया के चौरे’ पर माथा टेकने जरूर जाती है।’’ मालती भाभी भावुक हो गई थीं।

समीर पंखहीन पंछी की तरह छटपटा उठा। सलोनी, सजीली रमा दीदी का अंत इतना भयानक?

वह कुछ क्षण स्तब्ध सा बैठा रहा। फिर जयंती का हाथ थाम कर उठ खड़ा हुआ, “उठो जयंती, रमा दीदी हमारी राह देखती होंगी। उन्हें हमारे आने की आस होगी। चलो, चल कर उनसे आशीर्वाद ले आएं।’’

- आभा श्रीवास्तव

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