E-इश्क:मैं तल्ख बोलता हूं इसलिए आज तक कह नहीं पाया कि प्यार का कोमल एहसास तुमने ही पिरोया है मेरे अंदर

12 दिन पहले
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उसे लगा कि एक शोर है जो उसके आसपास फैला हुआ है, कभी लगता है कि समुद्र में उठती तेज लहरें अचानक शांत हो गई हैं। कोलाहल और नीरवता का द्वंद्व सा चल रहा था। वह शायद थोड़ी-सी हिली थी, इसलिए कुछ आवाजें फिर से उसके शरीर को पार करती हुईं उसके मन-मस्तिष्क के भीतरी बिंदुओं को छू गई थीं। जब वह चेतन थी तो भी हमेशा विचारों के चक्रवात उसे घेरे रहते थे और अवचेतन स्थिति में भी विचारों के बवंडर उसका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। नाक में नली लगी है और कुछ-कुछ देर के अंतराल के बाद सुइयां भी उसके हाथों में चुभती हैं।

उसी की गलती थी जो नियति से लड़ने चली थी। शादी के बीस साल उसने इस कोशिश में लगा दिए कि सुधीर शराब पीना छोड़ दें, वह छोटी-छोटी बातों पर सबके सामने उसे अपमानित न करें, वह अपने खोल से निकल ग्रो करने की कोशिश करें, ताकि उन दोनों का ही विस्तार हो सके, लेकिन नतीजा उलटा ही हुआ। सुधीर जहां थे, वहां से एक कदम भी आगे नहीं बढ़े। और वह अपने मुकाम से एक-एक कर नीचे सीढ़ियां उतरती गई। उसका विस्तार ही नहीं, विकास भी रुक गया। हर समय सुधीर की चिंता उसे कमजोर बनाती गई, शरीर से भी और मन से भी।

‘‘तुम्हें मेरी जरूरत नहीं है न सुधीर?’’ कभी वह इस उम्मीद के साथ पूछती कि वह कहेगा, ‘‘नहीं कावेरी, मुझे तुम्हारी जरूरत ही नहीं, बल्कि तुम ही मेरा जीवन हो। तुम नहीं तो कुछ नहीं। तुम ही तो वह धुरी हो, जिसके इर्दगिर्द पूरा परिवार घूम रहा है।’’ पर वह तो उसकी उम्मीद को तोड़ने में क्षण भर भी नहीं लगाता था।

‘‘जरूरत क्रिएट की जाती है। फिर किसी के बिना काम भला कभी रुका है। मैनेज करने की ताकत है मुझमें।’’

तब वह सोचती कि इस व्यक्ति के साथ बिताए बीस साल तो निरर्थक ही साबित हुए, लेकिन अब आगे क्यों वह इसके साथ जिंदगी बिताना चाहती है। सिर्फ इसलिए कि उसे समय पर खाना मिल सके। एक टाइम भी किसी तरह की कोताही नहीं होनी चाहिए।… बीमार हो तब भी, मन न हो तब भी। वैसे भी सुधीर केवल अपने मन को प्राथमिकता देता था। उसका मन क्या कर रहा है, यह बात तो वह डंका पीटकर कहता था, पर दूसरे के मन की सुनने चाहिए, ऐसा वह सोचता तक न था। उसे याद है युट्रस में ट्यूमर होने की वजह से ऑपरेशन के बाद 21 टांके लगे थे। टांके कटे भी नहीं थे कि सुधीर उसे बिना डॉक्टर की अनुमति के घर ले आया था और उसी हालत में वह रसोई की स्लैब पर बैठकर खाना बनाती थी।

सुईं चुभी, शिथिलता कुछ और बढ़ने लगी थी। शायद नींद का इंजेक्शन दिया होगा। बेशक शरीर निढाल-सा पड़ा हो, पर मन के घोड़े तो बिना लगाम के निरंतर दौड़ते रहते हैं। चाहे घर-गृहस्थी को लेकर हों या उसकी नौकरी संबंधित, सारे फैसले सुधीर ही तो करता आ रहा है। उसके वजूद को सीधे-सीधे नकारता है वह, पूरी ठसक के साथ।

‘‘क्या करूं, मैं ऐसा ही हूं। तुम्हें दिक्कत है तो तलाक ले लो। कोर्ट ऑर्डर देगा तो तुरंत मैं यहां से चला जाऊंगा। आखिर घर तुमने खरीदा है, तुम्हारे नाम है।’’ वह हमेशा से ही इसी टोन में बात करता था। आर-पार, कोई समाधान नहीं, कोई परिवर्तन की चाह नहीं। वह एकदम सही कहता है, सही सोचता है, मानो यह बात उसके अंदर रोप दी गई थी। हर चीज एक्सट्रीम… कोई बीच का रास्ता नहीं।

‘‘और बेटा?’’ वह पूछती।

‘‘वह मेरे साथ जाएगा। पूछकर देख लो उससे। वह तुम्हारे साथ रहने को तैयार है क्या?’’ ममता भरी निगाहें बेटे की ओर उठतीं और वह बिना कुछ कहे दूसरे कमरे में चला जाता। उसके लिए तो दुविधा उससे भी ज्यादा बड़ी थी…। मां-पिता किसको चुने?

थोड़ा और त्याग कर वह शायद सुधीर की अपेक्षाओं पर खरा उतर सके, घर भी ठीक से संभाल सके, यही सोच उसने नौकरी छोड़ दी। अपने बारे में भी सोचना चाहिए, यह बातें उसे किताबी ज्यादा लगने लगीं और व्यावहारिक कम।

सुधीर के चेहरे पर हंसी की एक परत तक देखने को तरस गई वह। कान अपनी तारीफ में दो शब्द सुनने को तरसते। धीरे-धीरे तनाव हावी होता गया और वह रिक्त होने लगी। हर समय गुमसुम सी बैठी रहती। अपने को सुपर कंप्यूटर मानने वाली वह अपने ऊपर हावी रहने वाली शिथिलता से परेशान अवश्य हो उठी थी, पर उसे दूर करने की मन में कोई चाह नहीं हुई। कुछ धुंधली सी परछाईं की तरह वह शाम उसके सामने चक्कर काटने लगी। बहुत देर से किसी से फोन पर बात कर रहा था सुधीर। उसकी चिल्लाहट बढ़ती जा रही थी, गुस्सा, फिर गालियां…, ‘जिसको देखो पैसे मांगता है,’ बोतल लेकर बैठ गया था। कुछ देर बाद जोर से गिलास जमीन पर दे मारा उसने। किरचें हर तरफ बिखर गईं।

‘‘बेवकूफ औरत, अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी। मैं अकेला कितना खर्च उठाऊं?’’ सुधीर चिल्ला रहा था।

‘‘पर तुम ही तो कहते थे कि मेरी नौकरी से तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ उसने थके शब्दों से कहा था।

‘‘इसलिए तूने नौकरी छोड़ दी और अब डिप्रेशन का शिकार हो गई है। तू पागल है, किसी मनोवैज्ञानिक से इलाज करा, वरना...…’’ सुधीर तमीज की हदें पार कर रहा था। दो-तीन पैग उसके पेट में जा चुके थे।

‘‘वरना क्या?’’ न जाने कैसे उसके कमजोर शब्दों से एक बुलंद आवाज बाहर निकल आई थी। शायद जब किसी चीज की इंतहा हो जाती है और बर्दाश्त करने के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं तो उन बंद दरवाजों के छिद्रों में से ही निकलती ध्वनियां तेज मालूम पड़ती हैं।

‘‘पागल औरत मुझसे उलझने की कोशिश मत कर, जो तेरी मर्जी आए कर। अपना खर्च अपने आप उठा। जहां जाना है चली जा। मुझे तेरी कोई जरूरत नहीं है। खाना बनाने के लिए पैसा फेंकने भर की देर है, बहुत कामवाली मिल जाएंगी।’’

तभी धुंधलाने लगा था सब कुछ। सुधीर का चेहरा, अपने कमरे से विवश नजरों से झांकती बेटे की मजबूरी, दीवारें, छत... … अंधेरा छा गया था हर तरफ।

‘‘देखिए शरीर की कमजोरी को तो हम दवाइयों से भर सकते हैं, पर मन की नहीं। इनके सिम्पटम्स बता रहे हैं कि इनका मन बहुत बुरी तरह से टूटा है। वी विल डू आवर बेस्ट, बाकी तो आप ही को करना है।’’

वह चाह रही थी कि ऐसे ही शिथिल पड़ी रहे। तभी कुछ शब्द उसे झकझोर गए।

‘‘जल्दी से ठीक हो जाओ कावेरी। तुम्हारे बिना इन चार दिनों में घर किसी कंटीले जंगल की तरह बन गया है। हर दीवार, हर दरवाजा, तुम्हारे वापस आने की प्रतीक्षा कर रहा है। तुम्हारे बिना एकदम शून्य महसूस कर रहा हूं…। हर समय आसपास रहती थीं तो तुम्हारे एहसास को नकारना आदत सी बन गई थी। पहले कभी समझ ही नहीं पाया इस बात को, बहुत जरूरत है मुझे तुम्हारी। शायद मैं एहसासों को समझने और व्यक्त करने दोनों में ही असमर्थ रहा हूं। तुम्हारा होना, मेरे लिए जरूरी है, यह ठीक है, पर लगता है तुम तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूं। मैं तल्ख बोलता हूं इसलिए आज तक कह नहीं पाया कि प्यार के कोमल एहसास को तुमने ही पिरोया है मेरे अंदर। बस समझ नहीं पाया।…’’सुधीर के शब्दों से ज्यादा उसकी आंखें बोल रही थीं। उसने बहुत कसकर उसकी हथेलियां थामी हुई थीं। अपनी दूसरी बांह पर उसे बेटे के हाथ का स्पर्श महसूस हुआ।

- सुमन बाजपेयी

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