E-इश्क:वो दोनों बिल्कुल एक से दिखते थे, सुना है दुनिया में सात लोगों की सूरत एक सी होती है...

9 दिन पहले
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“प्रेम हमें और भी युवा बनाता है|” अपने कलर्ड भूरे बालों को कन्धों पर बिखराते हुए मैंने स्वयं से कहा| मुझे पता था कि मैं आकर्षक हूं, सुन्दर हूं| उम्र के छियालिसवें वर्ष को छूने के बाद भी अभी काफी कमसिन दिखती हूं| दिसंबर का अंतिम सप्ताह और सारा शहर ठण्ड से ठिठुरता हुआ कोहरे की सफ़ेद चादर में सिमटा था| नए साल की आहट सुनते हुए मैं हजरतगंज के जनपथ मार्केट में बस यूं ही समय बिताने के लिए बुक स्टोर में जा कर पत्रिकाएं देखने लगी थी कि कानों में गिटार की एक मीठी धुन सुनाई पड़ी- कोई सत्तर के दशक का फ़िल्मी गीत था- “चुरा लिया है तुमने जो दिल को...”

इस मौसम में इतना मधुर गीत? तापमान काफी नीचे था और गर्म दस्ताने पहनने के बावजूद मेरी उंगलियों के पोर सुन्न हो रहे थे| ऐसे में गिटार पर इतनी मादक धुन बजाने के लिए उंगलियां किस तरह थिरकती हैं, यही देखने के लिए मैं बुक स्टोर से बाहर निकल आई|

वो एक युवा लड़का था जो चेहरे से दक्षिण भारतीय लग रहा था| उसके चेहरे का आकर्षण, भोलापन और श्यामवर्ण, मुझे कृष्ण की याद दिला गया| कृष्ण, हां, वही वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया| नीली जीन्स और ग्रे स्वेटर पहने, आंखें मूंद कर जिस तन्मयता से वो गिटार बजा रहा था उससे लगता था कि इस ठण्ड से वो बिलकुल अछूता और प्रभावहीन है|

एक पूरी धुन समाप्त करके उसने आंखें खोलीं तो उसकी दृष्टि सीधी मुझसे टकराई| उसकी मोहक मुस्कान और आँखों में कुछ ऐसा था जिसने मुझे बांध लिया| क्या मैं इसकी धुन सुनने के लिए ही इतनी ठण्ड में अपने गर्म, आरामदायक घर से बाहर निकल कर हजरतगंज घूमने आई हूं? खुद से पूछ बैठी मैं| इतने में ही उसने गिटार पर दूसरी धुन छेड़ दी- “तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं...”

इधर उधर घूमते कुछ लोग भी उसे सुनने के लिए रुक गए थे| दो धुन सुनाने के बाद अपना गिटार कन्धे पर टांग कर वह जाने के लिए उठ खड़ा हुआ|

घर लौट कर पूरे समय बेचैन रही मैं| उम्र का ये पड़ाव- जब मैं न तो स्वयं को युवा मान सकती थी न ही बूढ़ी| लेकिन एक टीनएजर लड़की की तरह बार बार आईने में स्वयं को देखती जा रही थी| शायद कृष्ण की आंखों से खुद को देख रही थी मैं| कृष्ण, हां यही नाम धर दिया था मैंने उसका|

अगले दिन एक बार फिर मैं जनपथ मार्केट में कल के समय से पहले पहुंच गई थी| शायद कृष्ण दिख जाये, मिल जाये| दिल ने हल्की सी दस्तक भी दी थी- किस राह पर जा रही है तू ? संभाल तो अपने को|

इतने में कृष्ण दिख गया मुझे| वही घुंघराले बाल, सांवली छवि और हाथों में गिटार| धुन थी- “तुम आ गए हो, नूर आ गया है...’’

इस कृष्ण के आकर्षण के आगे मैं विवश हो रही थी| राधिका जैसी, गोपिका जैसी |

मैं ठीक उसके सामने जाकर खड़ी हो गई| वैसा ही सर्द मौसम, कोहरा, बादल और सन्नाटा| आसमान जैसे अब बरसा, तब बरसा| आज उसके आस-पास भी कोई नहीं दिखा| थर्मस में लाई कॉफ़ी को दो मग्स में उंडेल कर एक मग उसे थमाया और स्वयं कॉफ़ी की चुस्कियां लेते हुए उसके पास बैठ गई|

गिटार रखते हुए वो मुस्कराया और मेरी साँसे जैसे रुक गईं| मुझे लगा समय से टूट कर वो पल वहीं ठहर सा गया है| मैं एक षोडशी की तरह अपने दिल की धड़कन थामे हुए थी| कॉफ़ी पी कर उसने थैंक्स कहा और चला गया| मैं दूर तक उसे जाते हुए देखती रही|

फिर कई शामें हमारी साथ ही साथ बीतीं| मुझे हिंदी के अलावा और कोई भाषा नहीं आती थी और ‘कृष्ण‘ को तमिल और अंग्रेज़ी के साथ टूटी फूटी हिंदी| उन दिनों घर पर कोई नहीं था| ‘कृष्ण‘ कई बार घर भी आया| उसके लिए खाना बनाना मुझे अच्छा लगता था| वह तारीफें करता, फरमाइश करता| मेरी गोद में सिर रख कर लेट जाता| एक महक थी उसकी जो मुझे महका रही थी| क्या ये प्यार की महक थी? तब भी हम हमेशा अपनी सीमाओं में कैद रहे| मुझे उसका साथ अच्छा लगने लगा था और शायद उसे भी| दिन जैसे सतरंगी इन्द्रधनुष हो गए थे और रातें कृष्ण के संग स्वप्नमयी| रात में बेड पर अकेली लेटी हुई मैं कृष्ण की बातें याद करती| मन में सोचा करती कि ऐसी बातें राजन से कबसे नहीं सुनी| राजन से मेरी बातें अब टू द पॉइंट होने लगी हैं| राजन कभी ये क्यों नहीं कहता कि उसे मेरे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता या अक्सर लम्बे टूर के दौरान वो मुझे मिस करता है, याद करता है| शायद राजन अपने कैरियर के साथ अपनी दुनिया में बहुत बहुत व्यस्त हो चुका है| जबकि मुझे अभी भी लगता है कि राजन मुझे टूट कर, बिखर कर प्यार करे| क्यों खो गया, ख़त्म हो गया वो सब कुछ कोमल सा| एक मशीनी खालीपन बचा रह गया बस|

लेकिन कृष्ण से अलग होना भी ज़रूरी था| कुछ उम्र की सीमायें थीं, कुछ समाज के बंधन| आज ही अलविदा कह देना होगा कृष्ण को| लेकिन कैसे? उसकी भोली आँखें मुझे देख रही थीं|

‘’हमारा साथ यहीं तक था| हमें अब अलग हो जाना चाहिए|’’ मेरे भीतर की उम्रदराज़ औरत ने कहा, ‘’मैं तुम्हारे लिए नहीं बनी हूं| इतना ही साथ बहुत था हमारा|’’वह हिचकिचाहट के साथ मुस्कराया| उसे अब और बांधना नहीं चाहती थी मैं, ‘’अब रुकना होगा हमें| मेरे पति के लौटने का दिन आ गया है|’’कृष्ण का चेहरा धुँधला पड़ गया था| मुझसे जुड़ कर क्या पा लेता वो?

‘’तुम्हारा साथ बस इतने ही दिन का, कीमती था मेरे लिए|’’ कृष्ण ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा और मैंने उसे रोका नहीं|

वापस आ कर एक प्याला चाय बनाई और थकी सी सोफे पर पसर गई मैं| खिड़की का आधा परदा खुला हुआ था| दूर तक धुन्ध छाई हुई थी| आज ज़रूर बरसात होगी- आंखों से, आसमान से| देखा एक ओला टैक्सी गेट पर रुकी| उससे एक परिचित आकृति उतरी थी| राजन थे| दस दिन के टूर के बाद वापस लौटे थे| वही मुस्कराता चेहरा, खुशमिजाज़ स्वभाव| तब भी मेरे मन में एक खालीपन क्यों?

भीतर आते आते ही बोल पड़े, ‘’मोबाईल नहीं देखा क्या? तन्वी और मोहन ने अपनी कोर्ट मैरिज की तस्वीरें वाट्स एप करी हैं|’’

मुझे याद आया आज बेटी की शादी हुई थी यू. एस. में और कोविड के कारण हमारा शामिल होना सम्भव नहीं हो पाया था| कृष्ण के प्रेम में सब कुछ भूली हुई थी मैं| दिन, तारीख, महीना| मोबाईल ऑन किया| तन्वी का मोहन बिलकुल कृष्ण जैसा था|

सुना है दुनिया में सात लोगों की सूरत एक सी होती है |

- आभा श्रीवास्तव

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