E-इश्क:मैं तुम्हारे साथ प्यार के पंख लगाकर उड़ना चाहता हूं। तुम क्यों बार-बार मेरे पंखों को कुतरने की कोशिश करती रहती हो?

एक महीने पहले
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‘‘ट्रैकिंग पर चलें अमरकंटक इस बार?’’ अचानक ऑफिस के कुछ कुलीग्स ने जिद पकड़ ली। ‘‘सुना है बहुत मजा आता है। नर्मदा नदी का उद्गम स्थल भी है। मौसम भी बहुत खुशनुमा है वहां अभी।’’

‘‘नहीं,’’ एकदम सपाट शब्दों में उसने कहा था। स्वर में तीव्रता थी या चिढ़, हैरत से देखने लगे थे सब।

तभी उसे लगा कि उसका फोन वाइब्रेट हुआ है। बिना नंबर, बिना नाम के उसका फोन कंपकंपाता है। अक्सर ऐसा होता है जब भी शौमित्र उसके भीतर आवाज बन उतर आता है। हाथों की जुंबिश से जो कांप उठती हैं उसकी याद आते ही, दिल की धड़कनें जो उसे महसूस कर धड़कने लगती हैं, प्यार की थपकियों से… शायद उसे लगता हो कि उसके फोन में थरथराहट हुई है। फिर वे आपस में बातें करने लगते हैं।

‘‘क्यों नहीं जाओगी?’’

‘‘वहां तुम्हारी यादें हैं। हम दोनों के साथ गुजरे पल हैं।’’

‘‘तो अच्छा ही है न, हम फिर से जी लेंगे उन पलो को। आखिर कब तक तुम खुद को एक अंधेरी गुफा में बंद कर उस सवाल का जवाब ढूंढती रहोगी, जिसका जवाब कोई नहीं दे सका है। चली जाओ, मैं रहूंगा न तुम्हारे साथ।’’

‘‘जानती हूं तुम होगे। लेकिन बता सकते हो कि जब इतना प्यार करते थे तो गए ही क्यों मुझे छोड़कर?’’

‘‘जाने दो इन बातों को शिवी, नियति के आगे किसका वश चला है। वरना क्या वह छोटी-सी बीमारी मुझे तुमसे छीन पाती!’’

‘‘यार शिवानी, चल ना। मजा आएगा।’’ बिंदा उसके सामने आकर खड़ी हो गई थी। बिलकुल बिंदास और अलमस्त है वह। शिवानी ने इस ऑफिस में दो महीने पहले ही ज्वायन किया था और अभी तक वह बिंदा से ही थोड़ा खुद को कनेक्ट कर पाई थी। वैसे भी शौमित्र के जाने के बाद से उसने स्वयं को समेट लिया था। उसके इस पन्ने के बारे में ऑफिस में कोई नहीं जानता था।

‘‘बताती हूं, सोचकर,’’ कहती हुई वह वॉशरूम की ओर बढ़ गई थी। आंखों में नमी अकसर उतर आती है। अच्छा ही है उसने काजल लगाना छोड़ दिया है। नहीं भूल सकती वह शौमित्र को…शिवानी ने तो उसे अपनी जिंदगी में आने से कितना रोका था, पर वह था एकदम नटखट, शरारती…, रोकने से भी नहीं रुका, …धड़कनों में समा गया।

‘‘तुम मुझसे उम्र में छोटे हो शौमित्र,’’ वह उसे समझाने का प्रयत्न करती।

‘‘तो क्या कम उम्र वालों का दिल नहीं धड़कता? कम उम्र वालों के अंदर वह खूबसूरत एहसास जिसे हम प्यार कहते हैं, कुलांचे नहीं मारता? मैं तुम्हारे साथ प्यार के पंख लगाकर उड़ना चाहता हूं। तुम क्यों बार-बार मेरे पंखों को कुतरने की कोशिश करती रहती हो?’’ थोड़ा संजीदा हो जाता तो उसे हंसी आ जाती। समझ चुकी थी कि उसके लिए गंभीर रहना असंभव बात है, बस थोड़ा अभिनय आजमा रही है उस पर।

‘‘अपनी आंखों में काजल लगाया करो। बहुत गहरी हैं, डूब चुका हूं मैं तो।’’ काजल पेंसिल थमा दी थी उसने शिवानी के हाथों में। ऐसा ही था शौमित्र, …कब क्या कह दे, कब क्या कर दे, अंदाजा लगाना मुश्किल था। आर्टिस्ट था, इसलिए संवेदनाओं में डूबते-उतराते शायरी करता रहता। एक दिन शिवानी ने पायल पहन ली तो उसे रुनझुन कहकर पुकारने लगा।

‘‘तुम बंगाली, मैं ब्राह्मण, क्या कॉम्बिनेशन होगा?’’

‘‘कॉम्बिनेशन नहीं, कनेक्शन है यह शिवानी पांडे। न उम्र का बंधन है न सरनेम का, इसलिए इस प्यार के कनेक्शन को लेकर ज्यादा एनालिसिस मत करो। तुम मेरी सोल हो और मैं तुम्हारा कनेक्शन। आई लव यू शिवानी, इतना ही क्या काफी नहीं जिंदगी साथ गुजारने के लिए?’’ वह उसकी आंखों में झांकने लगता।

पल भर को शर्म से उसके गाल लाल हो जाते।

अमरकंटक दोनों साथ गए थे ट्रैकिंग पर। खूब मस्ती की थी। नर्मदा के उद्गम स्थल पर बैठकर शौमित्र ने उसकी तस्वीर बनाई थी।

‘‘अपनी अगली एक्जीबिशन में लगाऊंगा इसे। टाइटल होगा—सोल कनेक्शन।’’ कितना खुश था वह।

शिवानी उसका साथ पाकर जैसे किसी सपनीली दुनिया में छोटे-छोटे ख्वाब बुन रही थी। अमरकंटक से लौटने के दो महीने बाद वह कोलकाता गया था, अपने घरवालों को शिवानी के बारे में बताने। उसके गाल सहलाते हुए बोला था, ‘‘मुझे कोई आडंबर नहीं करना, इसलिए एक-दो महीने में ही सादे ढंग से शादी कर लेंगे। कैरियर पर भी फोकस करना है भई।’’ वह चला गया था। वही था उसका अंतिम स्पर्श।

फोन पर बात होती रही, पर शौमित्र ने नहीं बताया कि वह बीमार हो गया है। ‘‘किसी कीड़े ने रात में काट लिया, शिवी, ओ मां! जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा।’’ न जाने कैसा इंफेक्शन था जिसने उसके शरीर को खोखला कर दिया था।

वह चला गया, पर उसके साथ है। वह महसूस करती है उसे अपने आसपास। वह बात करती है उससे। उसे लगा फिर फोन बाइब्रेट हुआ है। दिल की धड़कनें तेज होने लगीं।

‘‘जा रही हो न तुम अमरकंटक?’’

‘‘हां।’’

‘‘किससे बात कर रही हो?’’ बिंदा थी।

‘‘जस्ट ए सोल कनेक्शन।’’ वह बाहर निकल आई।

- सुमन बाजपेयी

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