कसम तुम्हारी मैं रो पडूंगा:अगर मैं रुक गई अभी, तो जा न पाऊंगी कभी, यही कहोगे तुम सदा कि दिल अभी भरा नहीं

4 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

बारिश बहुत देर पहले ही रुक चुकी थी, लेकिन पत्तों से पानी अभी भी टपक रहा था। सूरज तो सुबह से निकला नहीं, धुंधलाते आसमान की बेचैनी उसे सारे दिन परेशान करती रही। खिड़की से बाहर झांकता हुआ, न जाने कितने कप कॉफी के भीतर उड़ेल चुका था। बादलों की टोली को आसमान में चक्कर लगाते देख चुपचाप गुनगुना रहा था, ‘‘न जाओ सैंया, छुड़ा के बहियां, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूंगा।’’ फीका-सा चांद झांकने लगा तो वह कमरे में आ गया।

म्यूजिक प्लेयर पर गाना चला दिया और इस बार थोड़े तेज स्वर में खुद भी गाने लगा। नहीं रह पाता वह बिना गाए! दर्द, खुशी, प्यार, न जाने कितने भावनात्मक पल इस गाने के साथ गुजरे हैं।

“न जाओ सैंया, छुड़ा के बहियां, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूंगा”

गाना बज रहा था और जैसे उसके होश गुम हो गए थे। उसने अलमारी खोली और दराज बाहर खींची तो पीतल का एक चौकोर डिब्बा निकाला। अपनी गुनगुनाहट के साथ ही एक स्वर और कानों से टकराने लगा

“अगर मैं रुक गई अभी, तो जा न पाऊंगी कभी, यही कहोगे तुम सदा, कि दिल अभी नहीं भरा” मुस्कान फैल गई उसके होंठों पर क्षण भर के लिए।

डिब्बे में रखे कागजों का सौंधापन, गोल, बड़ी नथ, मुरझाए हुए फूलों की बिखरी पत्तियां, घुंघरुओं वाली पाजेब, पाजेब पहने छन-छन करके उसका हिरनी की तरह एक कमरे से दूसरे कमरे में कुलांचे मारना और उसका उसे अपने आगोश में समाने के लिए पीछे भागना। शादी के बाद के दिन उसकी आंखों के सामने नर्तन करने लगे।

वे केवल कागज नहीं थे। वे पत्र थे, जिनके अक्षरों में उसकी खुशबू थी, उसके प्यार के पल थे, जिन्हें दोनों ने जीया था। वह पत्रों को ऐसे पढ़ने लगा, मानो पहली बार पढ़ रहा हो।

2 मई 1990 को हॉस्टल की पिछली दीवार के पीछे जब हम खड़े बात कर रहे थे, तो वैशाली ने हमें देख लिया। उसने कहा कि वह सब को बता देगी। फिर उसने शर्त रखी कि अगर मैं उसे अपने नोट्स दे दूं, तो वह चुप रहेगी। अपने प्यार की खातिर इतना तो मैं कर ही सकती थी। वरना तुम्हारा लड़कियों के हॉस्टल में आना बवाल खड़ा कर सकता था। सुकुमार, हम दोनों काफी दिनों से मिल रहे हैं, लेकिन मैं अपने दिल की बात जुबान पर नहीं ला पाई। खत में लिखना ज्यादा आसान है। मुझे नहीं पता कि तुम मुझे लेकर क्या महसूस करते हो। हमारी दोस्ती को किस रूप में देखते हो, लेकिन मैं तुमसे प्यार करती हूं। तुम्हारी राधा

पहली बार तो नहीं पढ़ रहा वह खत, फिर भी उसकी आंखें नम हो गईं। लेकिन जिस दिन पहली बार उसने यह पत्र पढ़ा तो खुशी से आंखें भीग गई थीं। हवा में पत्र को लहराकर नाचने लगा था वह। वह यह सोचकर कभी उससे कह नहीं पाया था कि कहीं इजहार करने से दोस्ती भी न टूट जाए। उसने जवाब में आई लव यू लिखकर पत्र भेजा।

10 जुलाई 1991 को कॉलेज खत्म हुए एक साल से ज्यादा हो चुका है। वैशाली, मेरी और तुम्हारी दोस्ती के बारे में कौन नहीं जानता, लेकिन इन दिनों मुझे महसूस हो रहा है कि तुम वैशाली के करीब आ रहे हो। मेरा वहम हो सकता है। हम तीनों की बॉडिंग निराली है, लेकिन डर लगता है कि तुम मुझसे दूर न हो जाओ। मैं वैशाली से ईर्ष्या नहीं करती, पर तुम्हें खोना नहीं चाहती।

“अभी न जाओ छोड़ कर, के दिल अभी भरा नहीं” आजकल यही गाने का मन करता है।

सुकुमार, हमें अपने माता-पिता से शादी करने के बारे में बात कर लेनी चाहिए। तुमसे दूर रहना मुमकिन नहीं। साथ रहकर सोच लेंगे कि जिंदगी में आगे क्या करना है। तुम्हारी राधा

गाना बजना बंद हो गया था। पत्तों पर टपकती पानी की बूंदों की आवाजें भी थम गई थीं। शायद मेरे भीतर उठती सिसकियां सुन कर। सालों बाद भी राधा के पत्र मेरे अंदर की मीना कुमारी को जगा देती है। विरह-वेदना में तड़पती फिल्म ‘साहब बीवी गुलाम’ की। दोनों के ही माता-पिता को हमारी शादी से कोई एतराज न था। वह भी जल्दी से जल्दी राधा के डर को दूर करना चाहता था। प्रेम वास्तव में इंसान को अगर ताकत देता है, तो कमजोर भी बना देता है। 4 फरवरी 1992 को हम और हरे रिश्ते में बंध गए।

शादी के बाद भी उन दोनों के बीच पत्रों का आदान-प्रदान होता। वह हंसती, ‘कोई सुनेगा तो हैरानी में पड़ जाएगा कि शादी के बाद भी, एक ही छत के नीचे रहते हुए हम एक-दूसरे को खत लिखते हैं।’ चांदनी रात में उसका हाथ थामे हुए तारों को गिनते हुए उसने कहा था।

“तुम हमारे प्यार की चिंगारी को हमेशा जलाए जो रखना चाहती हो। यह भी समझ लो यह एक तरीका है, नायाब तरीका।’’ सुकुमार ने उसे चूमते हुए कहा।

‘‘कितनी ऐसी बातें हैं जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते। कई बार हम एक-दूसरे को परेशान करते हैं, एक-दूसरे से खीझ भी उठते हैं। ऐसे क्षण होते हैं, जब हम एक साथ होने के बावजूद अधूरा महसूस करते हैं। हालांकि ये सब भी प्यार के ही चिह्न हैं। तब पत्र लिखकर भड़ास निकाल लो, झगड़े से बच जाओगे। कुछ भी बुरा लगे तो लिख देना। अच्छा तो तुम बिंदास होकर कह ही दोगी।’’

“हमारे बच्चों ने अगर ये पत्र पढ़े तो न जाने क्या सोचें”

चांदनी रात में उसके चेहरे पर खिली आभा सुकुमार को बावरा बना रही थी।

“बच्चे? क्या खूब कही तुमने। शादी को 10 साल हो गए। अभी तो सोचा तक नहीं हमने इस बारे में।”

“चलो सोचना शुरू करते हैं और पत्रों को छिपाने के लिए एक सुरक्षित जगह भी ढूंढ लेते हैं”

सुकुमार चौंका। राधा की आवाज, कहने का अंदाज—कुछ तो अजीब था।

27 जून 2003 को राधा को अस्पताल ले जाया गया। डिलीवरी रूम में उसने एक इच्छा व्यक्त की। उसने सुकुमार से “न जाओ सैंया, छुड़ा के बैंया, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूंगा” गाने के लिए कहा।

सुकुमार को पहले तो गुस्सा आया। यह भी कोई बात हुई। जीवन में एक फूल खिलने वाला है, और राधा की ऐसी बेतुकी फरमाइश! पर गाना पड़ा उसे।

सुकुमार ने अपनी बेटी को गोद में लिया तो राधा जा चुकी थी। वह पत्रों को थामे न जाने कब से बैठा रो रहा था, उसे अंदाजा तक नहीं हुआ। वरना रोक लेता अपने बहते आंसुओं को। कदमों की आहट सुनी तो वह पत्रों को डिब्बे में रखने लगा।

“आज रिकॉर्ड प्लेयर पर फिर से वही गाना लगाया आपने? पत्र पढ़ रहे थे”

वह जानती है इन खतों के बारे में। कितने तो छुपाकर रखे थे उन्होंने।

‘‘डिनर तैयार है बाबा।’’

‘‘तुम चलो। आता हूं। पत्रों को सहेजते हुए डिब्बे के ढक्कन के कपड़े के पीछे से झांकता गुलाबी रंग का कागज दिखा। इसे तो कभी नहीं पढ़ा।

3 दिसंबर 2002 को, सुकुमार पिछले सप्ताह जब मैं रेगुलर चेकअप के लिए गई थी तो पता चला कि मेरी कोरोनरी आर्टरीज सिकुड़ गई हैं। पता क्यों नहीं चला क्योंकि क्षति आंतरिक है। डॉक्टर ने कहा मेरे पास समय कम है। अगर मैं बच्चे को जन्म देती हूं, तो मैं बचूंगी नहीं। अगर मैं अबॉर्शन कराने के बारे में सोचती हूं तो भी रिस्क है, अगर कराती हूं तो 10 महीने और जी लूंगी। बच्चा हो या न हो, मेरा जाना तय है। मैंने सोचा कि इससे बेहतर है कि एक जीवन को ही पल्लवित होने का मौका दूं।

मेरी निशानी के रूप में, हमारे प्यार के प्रतीक के रूप में। तुम दुखी होते, इसलिए तुम्हें नहीं बताया। कभी पत्र पढ़ो तो इस बात को छिपाने के लिए माफ कर देना। हमारी संतान को खूब प्यार देना। जब मैं नहीं रहूंगी तो तुम टूट जाओगे और मीना कुमारी की तरह खुद को गम में डुबो दोगे। जानती हूं मेरी निशानी को तुम बहुत प्यार से पालोगे। वह तुम्हें टूटने नहीं देगी। तुमने सच कहा था पत्र में वह सब लिख सकते हैं जो कह नहीं पाते। -तुम्हारी राधा

- सुमन बाजपेयी

E-इश्क के लिए अपनी कहानी इस आईडी पर भेजें: db.women@dbcorp.in

सब्जेक्ट लाइन में E-इश्क लिखना न भूलें

कृपया अप्रकाशित रचनाएं ही भेजें