वो निम्मी स्वार्थी और मतलबी:अगर कोई उसकी तरह बनकर अनीश से फोन पर बात करे तो शायद उसे सब्र आ जाए...

5 महीने पहले
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"विश्वास नहीं होता, इच्छापुर का यह तालाब, जो सबकी इच्छाओं की पूर्ति करता था, आज ख़ुद सूख रहा है। समय-समय की बात है।" सरपंच जी की आंखों में अथाह दुःख था।

"कभी दूर-दूर के गांव-शहर के लोग आते। बसों से यात्री पुलिया से सिक्के फेंककर मन्नतें मानते थे। उन सिक्कों को निकालकर कुछ आमदनी ही हो जाया करती थी।" दुबले-पतले सुखिया का भी अलग ही दर्द था।

"वह सब तो ठीक पर यह तालाब सूखता चला जा रहा है। सिंचाई से लेकर मछली-पालन और सिंघाड़े की खेती तक, यह हमारे छोटे से गांव की जीवन-रेखा है। पहले ही इतना गहरा है, हमारी कई पीढियां इसने पाल दीं, अब हमारे समय यह सब देखना पड़ रहा है।" सरपंच जी के माथे की रेखाएं गहरी हो गई थीं और आवाज़ रुंध गई थी।

"और हमारे हाइड्रोलॉजिस्ट दुनिया जहान भुलाए मजनूं-महिवाल बने फिर रहे हैं, किस काम की इतनी पढाई-लिखाई, जब दिन-रात मारे-मारे फिर रहे हैं। इससे अच्छे तो हम गांव के गंवार हैं।" सूरज ने तपकर कहा।

सूरज सरपंच का इकलौता बेटा और अनीश का सबसे पक्का दोस्त, जो कि हाइड्रोलिक इंजीनियर था, गांव में सबसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा भी। लेकिन पिछले साल भर से वह सब-कुछ छोड़कर गांव-गांव, शहर-शहर मारा फिर रहा था।

कभी-कभी उसे तालाब किनारे पीपल के पेड़ के तले शून्य में ताकते देखा जा सकता था। किसी के पुकारने पर वह सूनी-सूनी आंखों से ऐसे देखता था, जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो, बोलता कुछ नहीं। जो भी उसे इस हाल में देखता, उसका दिल भर आता था, उस पर बेतहाशा तरस और निम्मी पर बेइंतेहा ग़ुस्सा आता।

निम्मी, जिसमें अनीश की जान बसती थी, जो उसकी बचपन की मांग थी, जिसे उसने बड़ी मुश्किलों से राज़ी किया था शहर जाकर पढ़ने के लिये, जो बड़ी डिग्री लेकर किसी अमीरज़ादे के साथ विदेश सिधार गई, पीछे छोड़ गई थी अपनी यादें और अनीश के रूप में जिन्दा लाश।

हमेशा ख़ामोश और खोया-खोया रहने वाला अनीश जब भी निम्मी का नाम सुनता, थोड़ी देर को जैसे होश में आ जाता, उसकी आंखों की चमक लौट आती। कभी उसकी एक-दो बातें करता, ख़ुद ही हंसता और हंसते-हंसते रोने लगता। उसे साइकोलॉजिस्ट की ज़रूरत थी, जो गांव में था नहीं और किसी के हाथ वह आता नहीं, जो उसे शहर ले जाए। वैसे भी उस अनाथ का जो था, निम्मी थी और सरपंच का परिवार।

"अनीश मेरे यार, देख गांव को तेरी ज़रूरत है। तेरी पढाई, तेरी काबिलियत कुछ काम तो आए हमारे। एक वह निम्मी थी, स्वार्थी, मतलबी, बस अपने भले का सोचा। अब कम से कम तू तो उस जैसा न बन। तुझे इलाज की ज़रूरत है और इस तालाब को, गांव को और मुझे सबसे ज़्यादा तेरी ज़रूरत है। और तू यहां पीपल तले पड़ा रहता है। कोई चुड़ैल चिमट जाएगी। एक निम्मी क्या कम थी।"

"निम्मी" अनीश के होंठ धीरे से खुले, फिर बन्द हो गए।

"वह नहीं जाना चाहती थी। वह मुझसे दूर कभी नहीं जाना चाहती थी। वह कहती थी, मेरे बिन रहना उसे आता नहीं, उसने सीखा ही नहीं और उसे सीखना भी नहीं। मैंने ही उसे अपनी कसमें देकर धकेल-धकेल कर भेजा था, उसी के भले के लिए, ख़ुद से बड़ी मुश्क़िल से दूर किया था।" अनीश की एक आंख से एक बूंद टपक कर हथेली पर गुम हो गई।

"हां जी! और इतनी दूर चली गई, डायरेक्ट सात समंदर पार सेट हो गई। आत्मनिर्भरता की हद पर। अब आएगी भी अगर तो डिग्री के साथ एक दो छोटे-मोटे डिप्लोमा भी होंगे और तू अभी तक उसके लिए आंसू बहा रहा है।" सूरज फिर गर्म होने लगा था।

"नहीं, वह मुझसे दूर नहीं जा सकती। बिन कुछ कहे, बिन कुछ सुने, ऐसे तो नहीं जा सकती...."

"कैसे जा सकती है? अरे मेरे भाई, जा चुकी है। इस छोटे से गांव में घुटने की बजाय उसने अमेरिका तक पंख फैला लिए। ख़ुश होना चाहिये तुझे तो उसकी ख़ुशी में। अब तू यह मान ले और पागलपन छोड़ दे, यही सबके लिए अच्छा है।"

"ख़ुश होऊंगा, सबसे ज़्यादा मैं ही ख़ुश होऊंगा, अगर एक बार, वह यह बात मुझसे ख़ुद कह दे। एक बार कहकर तो देखती, मैं ख़ुद ख़ुशी-ख़ुशी विदा करता उसे।"

"किस मुंह से कहती। थोड़ी लाज-शर्म बची होगी आंखों में। कुछ लिहाज़ रहा होगा तेरा। इसीलिये शर्मिंदा होकर चुपचाप चली गई..."सूरज और भी बहुत कुछ कह रहा था, पर अनीश का ध्यान अभी कहीं और ही था।

"ऐसे टुकुर-टुकुर क्या देख रहे हो, मुझे उलझन हो रही है।"

"तुम्हारी आंखें।"

"कौनसी नीली, पीली, हरी, बिल्लौरी हैं, काली ही तो हैं इतनी, कोयले जैसी।"

"न दो जगमगाते दीयों जैसी, जो हज़ार साल से अंधेरी पड़ी जगह को भी रोशन कर दे। इनकी स्याही से अंधेरे पनाह मांगते हैं।"

"कहां इंजीनियरिंग में ख़्वार हो रहे हो। कवि, शायर, लेखक बन जाओ।"

"वही करूंगा। जब लिखूंगा, जो लिखूंगा, तुम पर लिखूंगा, तुम्हारे लिए लिखूंगा। बस तुम डिग्री ले आओ, मैं रिटायरमेंट ले लूंगा और लिखना शुरू कर दूंगा।"

"ओ बतकुच्चन, देखो तुम्हारी बातों में उलझकर देर हो गई। काली बदरी घिर आई, अब तो भीगते-भीगते ही जाना होगा लगता है।" निम्मी ने फ़िक्रमंद से आसमान को देखा।

"मैं बतकुच्चन हूं, अरे मैं तो बस तुम्हें सुनता रहता हूं, रसमलाई के झरने जैसी बहती, बर्फ़ के गोले की तरह मीठी, नर्म, ठंडक पहुंचती आवाज़। कोयल, शहद, किससे मिसाल दूं, समझ ही नहीं आता मुझे तो। बस सुनते रहने को जी चाहता है उम्र भर।" अनीश पूरी रवानी में था।

"लो, हो गई बरसात शुरू।" निम्मी परेशान हो रही थी।

"कभी मन भर बरसा देना, कभी बूंद-बूंद को तरसा देना, बादल की अदाएं मेरे यार सी हैं।"

अनीश की शरारत पर वह मुस्कुरा दी।

"लाओ छाता दो सस्ते शायर साहब।"

"पहले यह बताओ, तुमने फॉर्म भरा।"

"मुझे नहीं जाना, कहीं नहीं जाना तुम्हें छोड़कर।

'यूं कहीं डूब के मर जाऊं तो अच्छा है मगर

आप की चाह का पानी नहीं भरना मुझ को'

थोड़ी शायरी मुझे भी याद है। हुह..." निम्मी ने मुंह बनाया।

"अरे हम कॉन्टेक्ट में रहेंगे न मेरी जान। पाषाण युग में नहीं 4G युग में रह रहे। 24 घंटे वीडियो कॉल से टच में रहेंगे। लेकिन तुमको इंजीनियरिंग करना ही है। इस गांव की पहली लड़की बनोगी तुम, जो यह डिग्री लेकर आएगी। यह मेरा सपना है।"

"मेरा सपना तो तुम हो बस और तुम्हारी हर इच्छा, मेरे जीने का मक़सद।"

"अनीश, अनीश उठ, चल घर चल, अंधेरा होने को है।" सूरज की आवाज़ से वह एक ट्रांस की कैफ़ियत से बाहर आया।

"अगर कोई निम्मो बनकर अनीश से कॉल पर बात कर ले, तो शायद इसे सब्र आ सकता है। निम्मो का अमेरिका वाला कॉन्टैक्ट नम्बर तो किसी के पास है नहीं, वरना मैं ही उससे हाथ जोड़कर विनती करता, इस प्यारे से बच्चे को मुक्त कर दे। वह वहां ख़ुश है और यह दिन-रात एक नई मौत मरता है। पागलों जैसे उसे हर जगह तलाशता है।" सरपंच जी सच में एक पिता की तरह चिंता में थे।

"वाह। यह सही आइडिया है। पहले क्यों नहीं आया मेरे दिमाग़ में। करता हूं, इंतज़ाम इसका।" सूरज को कुछ तसल्ली हुई।

दो दिन बाद सूरज दौड़ा-दौड़ा पीपल के पेड़ के नीचे पहुंचा, जहां बैठा अनीश तालाब को निहार रहा था।

"निम्मो को कॉन्टैक्ट नम्बर मिल गया है, वह आज पूरे गांव से माफ़ी मांगना चाहती है, ख़ासकर तुमसे। उसने कहा है दो घण्टे बाद फोन लगाएगी।"

अनीश एकदम बिजली की फुर्ती से उठा और सूरज को गले लगा लिया। वह समझ नहीं पा रहा था, दो घण्टे कैसे कटेंगे। वह दोनों पूरे गांव को इकट्ठा करने चल दिये। सबने सोचा कि चलो, अगर इसी से अनीश की हालत सुधर जाए, तो यही सही।

दो घण्टे बाद तमाम गांव सरपंच जी के आंगन में मौजूद था।

फोन की रिंगटोन से सबकी धड़कनें तेज़ हो गई थीं। धड़कते दिल से अनीश ने कॉल रिसीव की। फोन स्पीकर पर था।

"हैलो अनीश, मैं निम्मी..."

"नहीं, ठहरो, तुम निम्मी नहीं हो, उसकी आवाज़ मैं लाखों नहीं करोड़ों में पहचान सकता हूं...."

"हां अनीश, मैं निम्मी नहीं, उसकी रूममेट सुजाता बोल रही हूँ। आज साल भर बाद, अपनी सारी हिम्मत जुटा पाई हूँ। तुम्हारी निम्मी कहीं नहीं गई तुम्हें छोड़कर। पूछो अपने दोस्त सूरज से। बरसों से उसे परेशान कर रहा था, पर तुम्हारी वजह से हिम्मत नहीं हो पाती थी। वहां शहर में तो जैसे इसे पूरी छूट मिल गई थी। और एक दिन तो इसने सभी हदें पार कर दीं। निम्मी के जूस में नशीली दवाएं मिलाकर उसे किडनैप करके ले गया। ज़बर्दस्ती शादी करना चाहता था, लेकिन वह जैसे-तैसे बचकर वापस आ गई।जब निम्मी पर इसका वश न चला, और पुलिस की टेंशन हुई तो उसकी जान ले ली और इसी तालाब में उसकी लाश फेंक दी। यह सब मेरे सामने हुआ लेकिन मैं कुछ नहीं कर पाई क्योंकि मुझे भी जान से मारने की धमकी दी थी इसने। पर अब मैं इससे नहीं डरती। कोई चुड़ैल नहीं है पीपल पर, यही सबसे बड़ा नर पिशाच है सरपंच जी, आपका इकलौता बेटा। यह निम्मी का श्राप है जो इस तालाब को सुखा गया है।" हिचकियों से रोती सुजाता ने कॉल कट कर दिया। तमाम गाँव सकते में था, सरपंच जी ज़मीन पर सिर पकड़े बैठे थे, सूरज का कहीं पता नहीं था और अनीश एकदम शांत, मूर्ति की तरह खड़ा था। फिर वह धीमे-धीमे कदमों से तालाब की ओर बढ़ चला।

"मैंने कहा था न, वह मुझे छोड़कर नहीं जा सकती।

बिछड़ के ख़ाक हुए हम तो क्या ज़रा देखो

ग़ुबार जा के उसी कारवां से मिलता है"

- नाजिया खान

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