पता है तुम झगड़ा क्यों करती हो?:रूठोगी नहीं तो तुम्हारी नाक सुंदर कैसे लगेगी बिना गुस्से के सागर ने कहा...

6 महीने पहले
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“एकदम रद्दी आइडिया है तेरा”

“मैंने भी किस पागल से पूछ लिया”

“तू पागल” “तू सनकी” “तू अड़ियल” “तू बेवकूफ” “मैं बेवकूफ?

तो जा कर ले मेरे बिना अपना कैम्पेन पूरा” “कर दिखाउंगी और तेरे बिना करके दिखाउंगी। समझता क्या है अपने आपको?”

“हुंह!” “हुंह!” सागर और सागरिका हमेशा की तरह झगड़कर पलट लिए। मन में एक दूसरे की शकल भी न देखने का विस्फोटक गुस्सा और अपनी-अपनी ईगो लिए। पूरा दिन बीत गया। लंच भी दोनों ने अपने-अपने ऑफिस में ही किया। शाम हुई और सागरिका ऐप पर कैब बुक कराती हुई ऑफिस के बाहर आई। सागर ने अपनी बाइक उसके ठीक बगल में लाकर खड़ी कर दी और उसके हाथ से मोबाइल छीन लिया – “चल बैठ पीछे।

बड़ी आई कैब बुक करके सीधे घर जाने वाली।” “मुझे घर जाकर अपने कैम्पेन की स्ट्रैटजी बनानी है।” और जो मैंने पूरे दिन बैठकर तेरे कैम्पेन की स्ट्रैटजी बनाई है, उस पर कौन वर्क-आउट शुरू करेगा?

सागरिका के होंठों की विजयी मुस्कान का बीज तुरंत अंकुरित होकर सागर के चेहरे तक पहुंचा और वहां एक संतोषजनक प्यारी सी सरेंडर करने वाली मुस्कान का पौधा उग आया।

सागर के घर के लिविंग रूम में ढेर सारे स्नैक्स और कोल्ड-ड्रिंक की बॉटल्स बिखरी पड़ी हैं। दोनों अपने लैप-टॉप पर जुटे हैं। काम खत्म हुआ और सागरिका ने सब समेटा। अपने घर जाते हुए वो दरवाज़े तक जाकर मुड़ी और सागर तक आकर एक जादू की झप्पी में कस गई – “थैंक यू, मैं तेरे बिना कभी कुछ पूरा कर सकती हूं?” सागर भी इठला गया – “पता है तो झगड़ा क्यों करती हो?” “तुम मना क्यों करते हो पहले?” “नहीं करूंगा तो तू रूठेगी कैसे? रूठेगी नहीं तो तेरी नाक कैसे सुंदर लगेगी बिना गुस्से के?

सागर ने सागरिका की नाक पर उंगली रखी और सागरिका उसे मुंह चिढाकर पलट ली। सागर की मां चेतना उदास बैठी थी तभी उसकी अभिन्न सखी सागरिका की मां शिवि आई – “पहुंच गए तेरे भैया अपने बेटे के पास लंदन?” “हां!” चेतना के होंठों पर उदासी मिश्रित खुशी आ गई “देख वहां की फोटो भेजी हैं।” “हां, तो उदासी कैसी?” “हर साल मैं गुड़िया से पहले मायके चली जाती थी और रक्षाबंधन करके आती थी..”

“यार तू ऐसे उदास मत हो। देख तेरे भैया के वहां पहुंचने से उनके बेटे-बहू कितने खुश हैं। और उनका नन्हा पोता...सो क्यूट” “बिल्कुल ठीक कहा तूने, मैं भी दुखी नहीं होना चाहती। भैया-भाभी का वहां जाना कितना ज़रूरी था। मैं उनके लिए बहुत खुश भी हूं, पर...” “पर-वर छोड़ मेरे पास एक इतना बढ़िया आइडिया है कि तेरी सारी उदासी अभी काफूर हो जाएगी।” और फिर सच में शिवि ने जो बताया उससे चेतना के होंठों पर शरारती मुस्कान खिल गई।

चेतना और शिवि बचपन की सहेलियां थीं। किस्मत की धनी थीं कि उनका विवाह एक ही शहर में हुआ। लगभग एक साथ बच्चे होने पर उन्होंने उनके नाम भी मिलते-जुलते रखे। घर बनवाने की आर्थिक स्थिति हो जाने पर दोनों ने अगल-बगल प्लॉट खरीदकर घर बनवाए। समय के साथ उनके पतियों और हम उम्र बच्चों में भी घनिष्ठ मित्रता हो गई। जब सागर और सागरिका बड़े हुए तो उनकी दोस्ती देखकर चेतना और शिवि मीठे सपने बुनने लगीं।

शिवि को एक जाने-सुने घर की मनपसंद बहू मिलने जाने का उत्साह था और चेतना को बेटी को नज़र के सामने रखने का। लेकिन जब वे आत्मनिर्भर हुए और विवाह की बात चलाई गई, तो एकदम अप्रत्याशित उत्तर मिले।

“मैं शादी ऐसे लड़के से करूंगी जिससे मुझे प्यार हो। जिसे देखकर मेरे मन में उमंगें जागें। जिसकी छुअन पुलक भर जाए और जिसके करीब आने पर दिल में हलचल भरी गुदगुदी जागे। और जिसके लिए मैं दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की होऊं।”

“जो मुझे देखकर थोड़ा शर्माएगी, सकुचाएगी। जिसकी सुंदरता के लिए जल्दी कोई उपमा समझ न आए। जो हौले से मेरे जीवन में ऐसे आए जैसे कोई विंड चाइम बजती है।”

चेतना और शिवि ने जितना उन दोनों को समझाने की कोशिश की वो उतना ही भड़कते गए। उनकी नज़र में इतने अच्छे दोस्त से शादी करने का मतलब था प्यार के एहसास और वैवाहिक जीवन की शुरुआत का सारा रोमांच, सारा थ्रिल खत्म कर देना। एक-दूसरे के साथ रोमांस का कोई इरादा नहीं था दोनों का।

फिर शुरू हुई जद्दोजहद उनके लिए मनपसंद जीवन-साथी ढूंढने की। पर सागर के लिए ढूंढ़े गए। रिश्तों में सागरिका कमी निकालते न थकती और उसके लिए ढूंढ़े गए रिश्ते में सागर। बड़ी मुश्किल से कुछ रिश्ते पसंद आए भी तो दो-तीन डेट्स के बाद ही दोनों ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया। ऐसे में शिवि का प्रस्ताव दोनो के पिता को भी भा गया।

“कल सुबह जल्दी उठकर तैयार हो जाना। रक्षाबंधन है।” चेतना ने सोने जाती सागरिका से कहा।

“हम किसके साथ रक्षाबंधन मना रहे हैं?” उनींदी सी सागरिका ड्राइंग रूम पर नज़र दौड़ाते हुए पूछ बैठी। “मैं सागर के पापा को राखी बांधूंगी और तू सागर को।” “सागर को? राखी? मैं?” सागरिका चौंक पड़ी। “कहा जाता है पड़ोसी पहला परिवार होते हैं। तो तेरी शिवि आंटी हमें उदास कैसे होने देतीं?” “मतलब उदासी दूर करने के लिए यही बचा है? हम कहीं घूमने जा सकते हैं..” इधर चेतना सागरिका को राखी के लिए जोर देकर उसकी नानुकुर बढ़ाने में लगी थी और इधर सागर के यहां का हाल भी कुछ ऐसा ही था।

“कभी कहते हो शादी कर लो, कभी कहती हो राखी बंधवा लो। ये सब क्या है मां? क्या हम उस पुराने युग में जी रहे हैं जहां एक लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त बने हुए अभिभावकों को अच्छे नहीं लगते?” “नहीं, हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहां लड़का-लड़की खुद से इतना प्यार करने वाले से सिर्फ इसलिए शादी नहीं करते क्योंकि वो अच्छे दोस्त हैं।” “प्यार और हम?”

“प्यार है क्या?” चेतना भी कैज़ुअली बोल रही थी। “एक-दूसरे को समझना और दुखी न देख पाना या कुछ और?” “हां, पर राखी? राखी क्यों बांधें?”

“राखी बांध लोगे, तो जिससे तुम लोग शादी करोगे। वो तुम्हारे रिश्ते पर बिला-वजह शक नहीं करेगा। शिवि भी बंदनवार सजाते हुए लापरवाही से बोली।

“ओ कम-ऑन-मम्मा, जिसे शक करना होगा उसे कोई शक करने से रोक नहीं सकता। सागरिका को भी ये तर्क बड़ा बेढंग लगा।

“तो इस बात के लिए भी तैयार रहना कि तुम्हें तुम्हारा वो मनचाहा रोमांस वाला प्यार मिल जाने के बाद अपना रिश्ता थोड़ा समेटना पड़ेगा। क्योंकि अपने स्पाउस की ज़िंदगी में इतना दखल कोई बरदाश्त नहीं करने वाला।” चेतना ने बहस समेटी।

“और फिर जब तुम्हें शादी करनी ही नहीं है एक-दूसरे से तो राखी बांधने में हर्ज ही क्या है? त्योहार मन जाएगा और चेतना की उदासी दूर हो जाएगी।” शिवि ने भी तर्क-वितर्क का पैक-अप कर दिया। रक्षाबंधन का त्योहार मना लेकिन सागर और सागरिका का कहीं अता पता न था। मुहूर्त खत्म होने के समय सागर की बाइक रुकी। तभी सागर के पिता ने फरमाया – “गालिब साहब ने क्या खूब कहा है – इश्क पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश गालिब, जो लगाए न लगे और..” “और कहो बच्चों कहां घूमने निकल गए थे?” सागरिका के पापा ने चुहल की तो दोनों के झेंपे चेहरे कुछ और झेंप गए।

“हम पहली डेट पर चले गए थे ये देखने कि वो आपके शायर की आतिश कहीं छिपी है क्या जिसे बुझाने की तैयारी आप लोगों ने कर ली थी।” थोड़ा झेंपने के बाद सागर खुला।

“हा, हा, हा” अब पूरा अभिभावक वर्ग खिलखिलाकर हंस पड़ा – “अगर वो आतिश जग गई तो तुम देश के इकलौते प्रेमी-प्रेमिका होंगे। जो रक्षाबंधन का दिन चुनते हैं पहली डेट के लिए।”

- भावना प्रकाश

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