E-इश्क:उसके सूटकेस में अब तक सूखे बुरांश के फूल सुरक्षित रखे हैं, कभी-कभी वह उन्हें छू लेता है

एक महीने पहले
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मृगांक को तहसीलदार बन कर संतोष नहीं करना था, उसे कलक्टर बनना था। तीन प्रयासों के बाद भी जब वह सफल नहीं हो पाया तो अपने सारे पोथा-पोथी, सारे नोट्स लेकर दूर पहाड़ों की तलहटी में बसे अपनी नानी के गांव में, नानी के घर में रहने चला आया। कम से कम इस छोटे से गांव में मन को भटकाने वाले वो साधन नहीं थे जो दिल्ली के ‘मुखर्जी नगर’ में होते थे। यहां न डिस्टर्ब करने वाले मित्रगण थे, न आए दिन के बहाने वाले सेलिब्रेशंस, न दारू पार्टी और न ही कोई दूसरा झंझट या आकर्षण। भीतर-बाहर की पूर्ण शांति थी इस गांव में, इस घर में। | ठीक है एक वर्ष सन्यासी का सा जीवन ही सही, अगर कलक्टरी का इम्तहान पास कर गया तो पूरा जीवन ही एक सेलिब्रेशन हो जायेगा। यूं अचानक उसके गांव पहुंच जाने से नानी तो जैसे खुशी से बावरी हो गई थी। गंगाराम से कह कर कितने ही पकवान बनवा दिए थे। अंततः मृगांक को कहना पड़ा कि नानी अगर इस तरह और इतना सारा खिलाओगी तो मैं कैसे पढूंगा और कब पढूंगा? गंगाराम, नानी के घर का बावर्ची, माली, चौकीदार, भिश्ती सभी कुछ था। नानी के साथ गंगाराम भी मृगांक का खूब ध्यान रखता। आहिस्ता-आहिस्ता मृगांक की पढ़ाई की गाड़ी पटरी पर आने लगी।

फिर एक सुबह जब मृगांक के लिए नानी स्वयं चाय ले कर आईं तो उसे पूछना पड़ा, “आज गंगाराम नहीं आया क्या नानी?’’

“गंगाराम बीमार पड़ा है बेटा। चंपा आई है, उसकी बेटी। रसोई में है|’’ नानी ने दुलार में भर कर कहा।

मृगांक को लगा कोई गंवार सी लड़की होगी चंपा। लेकिन जब वह किताबें बंद करके बाहर आया तो देखा नानी के साथ कोई लड़की गप्पें मार रही है। मृगांक देखता ही रह गया- यही तो चंपा थी। मोटी-मोटी दो चोटियों में बंधे खिंचे घुंघराले बाल, करीने से पहना सलवार सूट, प्यारा सुकुमार चेहरा, बेहद सुंदर कोमल गढ़न और बहुत काली आंखें जैसे हीरे की चमक लिए हों। वह हल्के से हंसी तो मृगांक को लगा कि वह अपना पूरा जीवन ही नानी के गांव में बिता दे। चंपा की मां बचपन में ही गुजर गई थी इसलिए नानी का दुलार कुछ अधिक ही बरसता था उस पर। चंपा बीए कर रही थी, कंप्यूटर सीख चुकी थी। छोटे बच्चों की ट्यूशन लेती थी। नानी के पास आकर बतियाती थी। ऐसा नानी की बातों से मृगांक ने जाना था।

दिनभर में कमरे से एक बार भी बाहर नहीं निकलने वाला मृगांक अब बरामदे में बैठकर ही पढ़ने लगा था। पता नहीं क्यों उसे लगता चंपा उसके आसपास ही रहे। जिस पल चंपा दिख जाती उस समय मृगांक की पूरी दुनिया मुस्कराने लगती।

मृगांक को लगातार पढ़ते देखकर नानी ने ही कहा था कि इस गांव-देहात में तो पढ़ते-पढ़ते मृगांक ऊब ही जायेगा। मन हो तो किसी दिन चंपा के साथ ताल के आस पास घूम आए। गंगाराम के पांवों में गठिया था इसलिए पहाड़ी ऊँचे-नीचे रास्तों पर चलना उसके लिए थोड़ा कठिन होता। चंपा के साथ मृगांक देवी के मंदिर तक चल दिया। उसके लिए पहाड़ी रास्ते, बादल, झरने सभी कुछ नव्य और भव्य था। शहर के कोलाहल से दूर यह छोटा सा गांव कितना प्राकृतिक था। सच, कितने बरसों के बाद उसका यहां आना हुआ था।

चंपा ने मंदिर में प्रसाद चढ़ाया और दोना मृगांक के हाथों में थमाकर वहां पर बच्चों को पेड़े निकाल कर बांटने लगी। दूर कहीं से पानी का स्वर सुनाई दे रहा था। मृगांक की आंखों की उत्सुकता चंपा ने भांप ली थी। वे दोनों उसी तरफ चल दिए। वह प्राकृतिक ताल मंदिर से थोड़ी ही दूर पर था। पहाड़ी से एक जल प्रपात निरंतर उस ताल में गिर रहा था। ताल के जल में पांव डाल कर मृगांक और चंपा बैठ गए। सहसा कुछ देर बाद ही जल के नीचे से झांकती चट्टानों पर चढ़कर चंपा पानी को लांघती सोते के ऊपर चढ़ने लगी, तो मृगांक ने हल्के से उसे टोक दिया, “चट्टान की काई पर फिसलोगी तो ...’’

चंपा ने मुड़कर मृगांक को गंभीरता से देखा था, “तो क्या? मुझे कुछ नहीं होने का। पड़ोसन काकी कहती हैं कि लडकियां जल्दी नहीं मरतीं। हां, कम से कम कुंवारी लड़कियां तो नहीं मरतीं। माता-पिता से दहेज का धन वसूल लेती हैं तो भले…” और एक अगम्य मुस्कराहट चंपा के अधरों पर, चेहरे पर गहरा गई।

मृगांक और चंपा पहाड़ों को लांघ कर ऊपर और ऊपर शिखर की ओर बढ़ रहे थे। खड़ी चढ़ाई पर चढ़ते हुए मृगांक हांफ गया था। चंपा का गोरा चेहरा लाल पड़ गया था। पहाड़ से नीचे वृक्षों की चोटियां दिखाई दे रही थीं। उन पर घने बादल… वे दोनों बादलों की ऊँचाई के पास थे। नीचे बादल बरस रहे थे। कितना अद्भुत दृश्य। मृगांक वहीं घास पर बैठ गया।

“आप थक गए होंगे,” चंपा ने कहा और वो मृगांक की पिंडलियां दबाने लगी, तो मृगांक उसे देखता ही रह गया। मासूम, अनछुई सी चंपा। शाम ढलने लगी थी। सूरज पहाड़ों से उतरकर जंगल में नीचे चला गया था। मृगांक ने देखा अनायास ही चंपा की आंखें नम हो गई थीं। उसने मृगांक के हाथ को अपने हाथों में थाम लिया। धीरे से झुककर अपने होंठ उसकी उंगलियों से छुआ दिए। और फिर एक झटके से तुरंत ही अलग भी हो गई। दूर कहीं काले पहाड़ों की काली पीठ पर दिपदिपाती बिजली की बत्तियां दिख रही थीं। सूरज पहाड़ से उतरकर जंगल में नीचे चला गया था।

उस हल्की धुंधली सांझ में मृगांक ने देखा चंपा के घुंघराले बाल ताल की ठंडी हवा से उड़ रहे थे। उसने चंपा को छूना चाहा, लेकिन चंपा ने अपने कंधे पर रखा उसका हाथ धीरे से अलग कर दिया।

“मृगांक, जिसे तुम स्वीकार नहीं कर सकते, उसके लिए हाथ मत बढ़ाओ।” उसके स्वर में कोई शिकायत, कोई उलाहना, कोई व्यंग्य, कोई कड़वाहट नहीं थी। शायद चंपा जानती थी- अपनी और मृगांक की सामाजिक स्थिति का फर्क।

परीक्षा देने के लिए मृगांक को नानी का गांव छोड़ना पड़ा। चंपा ने जाते हुए मृगांक को उदास मुस्कान के साथ बेस्ट विशेस का कार्ड और बुरांश के फूलों का एक गुलदस्ता थमाया था।

फिर मृगांक का रिजल्ट भी आ गया। वो कलक्टर बन गया था। दोबारा से नानी के गांव जाना चाहता था, लेकिन नहीं जा सका। मां ने ममता से कहा, “बेटा, ब्याह कर ले। बड़ी सुंदर लड़की देख रखी है तेरे लिए।” मृगांक की आंखों में चंपा का चेहरा तैर गया। उसने स्वीकृति में सिर हिला दिया।

समय बीता। हर क्षण के साथ वह दूर होता चला गया उस गांव से, उस पहाड़ से, उस चंपा से, लेकिन चंपा की स्मृतियों से नहीं। मृगांक का ब्याह हुआ। नही, चंपा से तो नहीं। मां को सुंदर सी बहू मिली। मृगांक को सहचरी, सहगामिनी। उसके घुंघराले बाल चंपा जैसे थे या वो ही कुछ-कुछ चंपा जैसी थी। जिस पत्नी को मृगांक ने जाना था, जिसे छुआ था, जिसे चूमा था वो पत्नी नहीं चंपा थी।

चंपा की याद मृगांक को हमेशा ही आती है। समय फिसल जाता है, पकड़ नहीं आता। कुछ पल यादों के ठिठके रह जाते हैं। आज भी मृगांक बरसों पहले का एक मासूम चेहरा नहीं भूल पाता, ताल की हवाओं से उड़ते घुंघराले बालों वाला चम्पई चेहरा जो समय और समाज की जद्दोजहद में कहीं छूट-बिसर गया, खो गया। उसके छोटे से सूटकेस की तली में अब तक शुभकामनाओं का एक कार्ड और सूखे हुए बुरांश के फूल सुरक्षित रखे हैं। कभी कभी वो उन्हें छू लेता है।

- आभा श्रीवास्तव

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