कुछ अधूरे ख्वाब:क्या नारी की पहचान हर पीढ़ी में बदल जाती है, या उसकी मुश्किलें कुछ भिन्न हो जाती हैं

9 महीने पहले
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क्या नारी की पहचान हर पीढ़ी में बदल जाती है, या उसकी मुश्किलें कुछ भिन्न हो जाती हैं? क्या वजह है कि एक मां या एक सास अपनी बहू या बेटी को समझ नहीं पाती? क्या इसके पीछे उन्हें पूरी तरह से जिंदगी जीने की छूट ना मिलना है?

ऊषा अपने लम्बे बाल संवारते हुए सोच में पड़ी थी। उसके बेटे रोहन ने शादी करने का फैसला किया था। ऊषा को अपने पुराने दिन याद आए। वह एक कालेज में पढ़ाती थीं जब उनके घर उनके पति सुभाष का रिश्ता आया था। सुभाष ने साफ-साफ कह दिया था की शादी के बाद ऊषा नौकरी नहीं कर सकती क्योंकि उसे घर और परिवार को संभालना होगा। इस बात से ऊषा के माता-पिता भी सहमत थे और उन्होंने भी हामी भरी। उन दिनों, लड़कियों को ज्यादा विरोध करने की इजाजत नहीं थी। जैसा कहा जाता था, वह चुपचाप मान लेती थी और उनकी जिंदगी की हर पहलू का फैसला उनके माता-पिता या फिर उनके पति किया करते थे। ऊषा के साथ भी यही हुआ।

ब्याह हुआ, ऊषा अपनी नई जिंदगी जीने लगी। शादी के 1 साल बाद, रोहन पैदा हुआ और ऊषा अपनी छोटी सी दुनिया में खुश थी। घर गृहस्थी मैं वो इतनी व्यस्त थी की उसे पता ही नहीं चला कब रोहन बड़ा हुआ और स्कूल जाने लगा। धीरे-धीरे समय बीतता गया। कुछ वर्ष पश्चात, ऊषा की एक बेटी भी हुई। सीमा रोहन से 7 साल छोटी थी। बच्चों की पढ़ाई, उनके अलग-अलग प्रशिक्षण क्रीड़ाएं और घर गृहस्थी में वह इतनी उलझी हुई थी, कि जब उसने अपने लिए कुछ समय निकालने की सोची, तो कई वर्ष बीत चुके थे।

रोहन जब कालेज जाने लगा, सीमा छठी कक्षा में पढ़ती थी। ऊषा अब भी व्यस्त थी क्योंकि बच्ची अभी छोटी थी। पर अब, जब रोहन 25 साल का हो चुका था, और सीमा भी कालेज जाने लगी थी, ऊषा का समय जैसे बीतता ही नहीं था। उसके पास अब समय था अपने पुराने अधूरे शौक पूरे करने के लिए परंतु घरवाले उसका मजाक उड़ाते, “ये भी कोई उम्र है संगीत सीखने की? अब तो बस बच्चों की शादी के बारे में सोचो” या फिर, “चूल्हा-चौका छोड़कर ये क्या तस्वीरें बनाती रहती हो? बूढ़े सास-ससुर की सेवा करोगी तो कुछ पुण्य ही कमा लोगी। इन तस्वीरों में क्या रखा है?”

ऊषा अपने प्रतिबिंब को गौर से देखने लगी। आईने में कभी अपने चेहरे पर पड़ी झुर्रियों की तरफ देखती तो कभी अपने पके हुए बालों की तरफ। वह कब इतना बदल गई? उसे पता ही नहीं चला कब जिंदगी की शाम उसके यहां दस्तक देने चली आई।

आज शाम को लड़की वालों से मिलने जाना है। वह अचानक बहू और मां से अब सास बनने वाली थी। एक नया रिश्ता, और उससे कई अरमानों का जुड़ना, मन में कुछ डर सा भी था। एक अजनबी लड़की अब उसके घर आने वाली थी।

अचानक उसका मोबाइल फोन बज उठा और उसका ध्यान फिर से अपने वर्तमान की ओर केंद्रित हुआ। रोहन का फोन था। कहने लगा, “मम्मी, मेरी वो नीली शर्ट जरा निकाल के इस्त्री करके रख देना, शाम को पहनूंगा। आप भी कुछ अच्छी तरह तैयार होना। कामकाज में उलझ के मत रह जाना”। उसने हामी भरी और रोहन के कमरे में जाकर, उसने उसके कपड़े निकाल के तैयार किए। आंगन में बैठे अपनी सास से वो हंसते हुए बोली, “देखो तो, वह कितनी उत्सुकता से शाम की तैयारी कर रहा है”? सास मुस्कुराईं और बोली, “ठीक ही तो कह रहा है। अब तुम्हें अपने रहन-सहन का ध्यान रखना होगा, सास जो बनने वाली हो। कुछ रौब जमाना सीखो। अब तुम्हें खुद नहीं काम करना, बहू से काम करवाना है”। ऊषा चुप रहीं।

सुभाष भी दफ्तर से जल्दी घर वापस आ गया। ऊषा उस वक्त शाम को निकलने के लिए तैयार हो रही थी, इसलिए सुभाष ने अपनी अलमारी खोली और कपड़े खुद निकालने लगा। कपड़े टटोलते वक्त उसके खाने से एक डायरी फर्श पर जा गिरी। डायरी खुल गई थी। सुभाष झुका और जैसे ही उसने डायरी उठाई, उसकी नजरें डायरी की खुली पन्नों पर पड़ी। घर की खरीदारी के हिसाब-किताब एक तरफ लिखे हुए थे और दूसरे पन्ने पर उसकी नजर एक कविता पर जा पड़ी, जिसमें से कुछ अक्षर धुंधले हो चुके थे। उनपर शायद आंसुओं के गिरने से, धब्बे लगे हुए थे। चार पंक्तियां कुछ उभरकर इस तरह सामने आईं,

माली ने पौधे को बड़े प्यार से खाद दिया और सींचा। ज्यों ही कली और फूल मुसकाए, उन्हें तोड़ दिया गया। बाजार में बिकी कली किसी मेज की शोभा बनी। कुछ देर तक तो मुसकाई, फिर दुख से मुरझा गई। मुरझाई हुई कली की कोई कदर नहीं थी। वह निकालकर फिर कूड़ेदान में फेंक दी गई। क्यों नहीं उसे बागीचे के खुली हवा में खिलने दिया? खूब लहराती वो, महकती और खुशबू फैलाती। भंवरे दोस्त और तितली सहेलियां मिलने आतीं। क्यों अकेले सुनसान मेज पर यूं उसे वीरान किया?

इसके नीचे की पंक्तियां मिटी हुईं थी। शायद आंसुओं के गिरने की वजह से स्याही फैल गई थी। सुभाष हैरान हो गया। उसे नहीं पता था कि ऊषा को कविता लिखने का भी शौक था। पंक्तियों की गहराई ने उसके दिल को छू लिया। वह सोचने लगा कि 26 साल के साथ के बावजूद भी, ऐसी और कितनी चीजें होंगी जिसके बारे में उसे पता नहीं? उसने कभी अपनी पत्नी पे इतना गौर ही नहीं किया। वो शायद अपनी पत्नी को अच्छी तरह से जान ही नहीं पाया।

इतने में ऊषा तैयार होकर कमरे में आई। नीले और सफेद रंग की सिल्क की साड़ी उस पर खूब जंच रही थी। बालों में गजरा और आंखों में काजल उसने शायद बरसों बाद लगाया था। सुभाष उसकी तरफ देखता ही रहा मानो वह उसे पहली बार देख रहा हो। ऊषा की नजर सुभाष के हाथों में अपनी डायरी पर पड़ी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी कशमकश थी। ऊषा पहले तो झेंप गयी, फिर दबी हुई आवाज में बोली, “बहू को काम करने से ना रोकना। उसे भी सीमा की तरह ही छूट देना”। उसने धीरे से सुभाष के हाथों से डायरी ली, और उसे बंद करके वापस अपने स्थान पर अलमारी में रख दिया।

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