डिजिटल धारावाहिक:कौमुदी ने प्यार में अपना शरीर भी उन्हें सौंप दिया, लेकिन जब अधिकार देने की बात आयी तो डॉ. चंद्रा मुकर गए

8 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
रेखाचित्र- संदीप राशिनकर - Dainik Bhaskar
रेखाचित्र- संदीप राशिनकर

फूफा जी की हवस, पलाश का झूठा प्यार और अब शादीशुदा प्रोफेसर डॉ. चंद्रा का सानिध्य, कौमुदी को जीवन में सबकुछ अधूरा ही मिला। डॉ. चंद्रा से नजदीकियां कौमुदी के जीवन को किस दिशा में ले जाएंगी, ये इस किस्त में पढ़िए…

घर लौट कर कौमुदी ने बुआ मां को बताया तो वे तुरंत कुछ भी निर्णय नहीं ले सकीं। लेकिन वे नहीं चाह रही थीं कि बिन ब्याही कौमुदी इस तरह अकेली एक अनजान व्यक्ति के साथ बाहर जाये। कुछ कुछ असमंजस में होते हुए उन्होंने अपना विरोध प्रकट ही कर दिया, ‘’कुमु, मैं नहीं चाहती कि ब्याह से पहले तू ऐसे ही किसी अनजान, अजनबी के साथ बाहर जाये। अपने पापा से भी पूछ ले। मुझसे तो मना करते भी नहीं बनता और हां करते भी नहीं। तू बड़ी हो चुकी है। अपना निर्णय ले सकती है।’’ वे अनमनी सी थीं।

हार कर कौमुदी ने पापा को फोन लगाया और बुआ मां को पकड़ा दिया। बुआ मां और पापा में जो भी बात हुई, उसे नहीं पता, लेकिन फिलहाल बेमन से ही सही, बुआ मां से उसे नैनीताल जाने की अनुमति मिल ही गई।

वह स्वयं भी अपने जीवन की एकरसता से ऊब चुकी थी। नहीं जानती थी कि अनायास ही जिंदगी उसे ऐसा अवसर भी देगी। कुछ भी हो डॉ. चंद्रा और कौमुदी दोनों ही इस सहयात्रा से प्रसन्न थे। उन दोनों के प्रसन्न होने के अपने अपने कारण थे।

नैनीताल पहुंचने पर कौमुदी कुछ घबराई सी थी। घर से पहली बार अकेली बाहर आई थी। पता नहीं क्यों उसे कुछ छूटा छूटा सा लग रहा था।

“क्यों घबरा रही हो कौमुदी? अब कैसा डर? अब तो हम पहुंच ही गए हैं।’’ होटल के स्वागत कक्ष के सोफे पर बैठी कौमुदी के हाथ पर डॉ. चंद्रा ने अपना हाथ रखा। उनके स्नेह स्पर्श से कौमुदी को संबल मिला। रेलवे स्टेशन पर उन्हें रिसीव करने उनके होस्ट आए हुए थे। यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस का कंस्ट्रक्शन चल रहा था इसलिए उनके रहने की व्यवस्था होटल में की गई थी। दो अलग अलग कमरों में उनकी बुकिंग थी।

कौमुदी को सब कुछ नया नया लग रहा था। सफर की थकान से डॉ. चंद्रा क्लांत थे, लेकिन कौमुदी उत्फुल्ल थी, एक ताजे फूल की भांति। कमरा काफी अच्छा था, आरामदायक। कौमुदी ने मुंह हाथ धो कर कपड़े बदले। सफेद तांत की साड़ी पर हल्का गुलाबी बॉर्डर, घने बालों का शिथिल सा जूड़ा और हल्का सा मेकअप। डॉ. चंद्रा ने भी तैयार होकर स्वयं को दर्पण में देखा और संतुष्ट हो गए।

होटल से निकल कर वे दोनों मालरोड पर आ गए थे। उस समय नैनीताल का मौसम सुहावना था। वहां की रौनक और चहल पहल देखने वाली थी। सूर्य क्षितिज पर उतरने लगा था। लोअर माल पर दोनों साथ चल रहे थे। नीचे ठीक सामने झील, झील में अनगिनत नावें, सड़क पर अनगिनत आदमी। सहसा डॉ. चंद्रा ने कौमुदी को अपनी बांह से घेर लिया। उनका हाथ कौमुदी के कंधे को छूता हुआ उसकी पीठ पर आ गया था। हल्के झटके से उन्होंने कौमुदी को अपनी तरफ खींच लिया। उसकी बंद आंखों पर डॉ. चंद्रा के अधर थे। कौमुदी का शरीर पत्ते की तरह थरथरा उठा। उसके तनमन में एक पुलक सी जाग गई थी। कितना सुखद था अपने अनुकूल, प्रिय पुरुष के संरक्षण में एक स्मृतिशेष यात्रा।

सेमिनार समाप्त होने के बाद भी वे दोनों नैनीताल में दो दिन और रुक गए। उन दिनों के दौरान ही कौमुदी डॉ. चंद्रा के संवेदनशील व्यक्तित्व को समझ सकी थी। उनके उपकार, उनके आकर्षण से उसका पोर पोर बिंधा था।

उन दिनों के कोमलतम क्षणों में कौमुदी और डॉ. चंद्रा के बीच की सारी दूरियां समाप्त हो चुकी थीं। किसी परायेपन का प्रश्न ही नहीं बचा था। कौमुदी ने सोचा कि जिस सुरक्षा और संरक्षण को वह सदा से तलाश रही थी, वह क्या डॉ. चंद्रा के प्रति उसके समर्पण में समाप्त हुआ है। वह डॉ. चंद्रा के साथ जैसे एक स्वप्न प्रदेश में भ्रमण कर रही थी। उसे अपने और डॉ. चंद्रा के बीच उम्र या परिस्थिति का कोई अंतर नहीं समझ आ रहा था। उसे महसूस होता कि डॉ. चंद्रा की परिपक्वता में एक अद्भुत आकर्षण है। उसने अपनी डायरी में लिखा-

‘मां, जिस पुरुष की मुझे तलाश थी वो शायद मुझे मिल चुका है। डॉ. चंद्रा एक सुलझे हुए, विद्वान और समझदार व्यक्ति हैं। उनके व्यक्तित्व में एक परिपक्वता है। कम उम्र के अनगढ़ व्यक्ति के प्रति शायद मैं कभी समर्पित नहीं हो पाती। मां, तुम नाराज तो नहीं हो न?’’

नैनीताल से सुखद स्मृतियां लेकर कौमुदी और डॉ. चंद्रा दोनों ही वापस लौट आए। पाखी के ब्याह के दिन निकट आते जा रहे थे। कौमुदी को थीसिस के सिलसिले में लगभग रोज ही डॉ. चंद्रा से मिलने यूनिवर्सिटी जाना रहता। इसी बीच उसे अपने शरीर में कुछ अलग से बदलाव महसूस होने लगे थे। लेकिन तब भी अभी शुरुआत थी। उसे डॉ. चंद्रा से सच में सम्मोहन नहीं, प्यार हुआ था।

एकांत में वो डॉ. चंद्रा की बातें सोचती रहती, “घर परिवार से टूटा हुआ मैं अपने मन से बिल्कुल अकेला हूं, कौमुदी। मैंने कभी किसी के आगे अपने मन की भावनाएं नहीं उजागर करीं। पहली बार तुमको देखा तो लगा कि शायद मुझे तुम्हारी ही तलाश थी। मैं अब तक जैसे नागफनी के जंगलों में भटक रहा था। तुम मेरे जीवन में मानो हरसिंगार बन कर आईं। लेकिन तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिलीं ?’’

समर्पण के उन क्षणों का क्या परिणाम होगा, किसी ने नहीं सोचा था। कौमुदी कितनी भी भावुक रही हो, लेकिन इस आने वाले बच्चे के भविष्य के लिए उसे मजबूत बनना पड़ेगा, एक ठोस निर्णय लेना पड़ेगा उसे, ऐसा उसने सोचा।

इस बार जब वह डॉ. चंद्रा से मिली तो उसने उन्हें अपनी स्थिति बताई। उनका जो अंश कौमुदी के शरीर में बस गया था उसे कौमुदी को संभालना ही था। इतना तो कौमुदी निश्चित कर चुकी थी। डॉ. चंद्रा भी कौमुदी को इस हाल में अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे। लेकिन उनकी विवशता थी कि वे विवाहित थे।

जीवन के इस मोड़ पर कौमुदी का संग साथ पा कर वे नई जिजीविषा, नई ऊर्जा से भर गए थे। वे इतने कृतघ्न नहीं थे कि कौमुदी से मुक्ति पाने की सोचें। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि कौमुदी की दूसरे शहर में नौकरी लगवा कर उसके लिए एक घर का बंदोबस्त कर दिया जाए। लेकिन कौमुदी तो आज कुछ दूसरा ही निश्चय कर के आई थी।

“सर, मैं आपकी ब्याहता बन कर आपके घर में रहना चाहती हूं।’’ उसने ‘आपके घर’ पर विशेष जोर दिया। कौमुदी के मुंह से ये प्रस्ताव सुन कर डॉ. चंद्रा हतप्रभ हो गए, “कौमुदी, तुम्हें पता है कि मेरी पत्नी है, परिवार है, कैसे ब्याह सकता हूं तुम्हें?’’

“ये तो आपको मेरे साथ इन्वोल्व होने से पहले सोचना चाहिए था।’’ कौमुदी कुछ कड़े और कुछ दृढ़ स्वर में बोल पड़ी।

डॉ. चंद्रा ने कौमुदी की तरफ देखा। उनका चेहरा उतर गया था। उन्हें कौमुदी से ऐसे उत्तर की अपेक्षा नहीं थी।

“मुझे और इस बच्चे को अपना अधिकार चाहिए सर,’’ कौमुदी जिद्दी स्वर में बोल पड़ी, “आपने ही तो कहा था कि जीवन भर मेरा साथ निभायेंगे। तो अब क्या हुआ?’’

“मैं कब साथ छोड़ रहा हूं तुम्हारा? तुम्हें घर, नौकरी, सुविधा, सभी कुछ दूंगा। मैं भी आता जाता रहूंगा तुम्हारे पास।’’ डॉ. चंद्रा का स्वर बुझ गया था।

“तो आप तय कर चुके हैं कि मुझे रखैल बना कर रखेंगे।’’ कौमुदी का स्वर तल्ख हो आया।

डॉ. चंद्रा को एक धक्का सा लगा, “तुम चाह क्या रही हो?”

“मैं आपके घर में आपकी पत्नी के अधिकार से रहना चाहती हूं सर।’’

“ये असंभव है, कौमुदी।’’

“तब क्या करूं मैं? मेरी इस स्थिति के सीधे जिम्मेदार आप हैं।’’

“तुम गर्भ नष्ट करवा सकती हो। अभी तो शुरुआत है,’’ डॉ. चंद्रा ने बहुत असहाय हो कर कहा।

“गर्भ मेरा है, पैदा मुझे करना है। बस इतना चाहती हूं कि इस बच्चे को आप अपना नाम दें। नष्ट नहीं करूंगी इसे।’’ कौमुदी मानो आर पार वाली स्थिति में आ गई थी।

प्रोफेसर का चेहरा काला पड़ गया था। कौमुदी का निश्चय सुन कर वह नहीं समझ पा रहे थे कि उनकी कर्कशा पत्नी क्या कौमुदी से निभा सकेगी? पत्नी ही क्यों, इस दूसरी औरत को क्या उनकी सोसाईटी स्वीकार करेगी? उनके मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदार, समाज, सभी जगह थू थू हो जाएगी उनकी। वो एक भावुक क्षण था जब उनका चरित्र डगमगा गया था। आज उन्हें अपने किये पर सच में पछतावा हो रहा था। वे अपने किये हुये की भरपाई कौमुदी को नौकरी, पैसा, घर, सभी कुछ दे कर करना चाह रहे थे। लेकिन कौमुदी ने इन सभी को बिल्कुल नकार दिया था।

कुछ क्षण सन्नाटे में बीत गए।

“आप मेरे लिए बस एक नौकरी की व्यवस्था करवा दीजिये। बाकि मैं स्वयं सक्षम हूं।’’ कौमुदी ने जैसे आखिरी उम्मीद के साथ डॉ. चंद्रा को देखा। वहां कोई भाव नहीं था। इससे अधिक वो स्वयं को गिराना नहीं चाह रही थी।

“मुझे थोड़ा समय दो, मैं तुम्हारे लिए एक अच्छी नौकरी और रहने की व्यवस्था तो कर ही सकता हूं।’’ डॉ. चंद्रा ने एक छुटकारे की सांस ली। कौमुदी के स्वाभिमान को वे समझ चुके थे। ये लड़की उन्हें ब्लैकमेल तो नहीं कर सकती, इतना उन्हें विश्वास था।

कौमुदी वापस लौट रही थी। मन में बहुत से विचार चल रहे थे। बुआ मां से क्या कहेगी? चार दिन बाद पाखी का ब्याह है। निपट जाये तब बात करेगी उनसे। इस बच्चे को समाज नहीं स्वीकारेगा, वह समझ रही थी लेकिन तब भी वह इस बच्चे को जन्म देना चाह रही थी। घर लौट कर उसने डायरी में लिखा, “मां, मुझे नहीं पता कि मैं सही हूं या नहीं, लेकिन मुझे लगता है मेरी कोख से तुम जन्म लोगी। और तुम्हें जन्म देने के लिए मैं समाज, दुनिया, सभी से जूझ सकती हूं।’’

पाखी के ब्याह का दिन निकट आ गया था। बुआ मां का घर रौनकों से भर गया। घर में गेंदे के फूलों से सजावट हुई थी। आंगन में मंडप छाया था। दुल्हन बनी पाखी कितनी सुंदर दिख रही थी। पलाश और अन्तिमा भी ब्याह में आए थे। अन्तिमा मां बनने वाली थी। भावी मातृत्व की एक मीठी हिलोर ने उसके चेहरे की चमक द्विगुणित कर दी थी। हर कोई उसे हाथोंहाथ ले रहा था।

कौमुदी एक बार फिर भीतर से उदास हो गई। ये छोटे छोटे सुख उसके जीवन में क्यों नहीं आए? किसकी तलाश में वह प्यासी मृगी सी भटक रही है? वह भी तो मां बनने वाली है। लेकिन अंतिमा का मान है और उसका बच्चा अवैध। तब भी ये बच्चा उसका अपना है, बस उसका है, कौमुदी ने सोचा। भीड़ में अकेलापन उसे कचोटता था। ब्याह में आए पापा को देख कर कौमुदी के जी में आया कि जा कर उनसे चिपट जाये। इस बार पापा उसे बहुत बूढ़े और कमजोर दिखे।

पाखी विदा हो गई। सारे मेहमान जाने की तैयारी में थे। लगभग जा ही चुके थे। मृदुल का इंजीनियरिंग का आखिरी साल, उसका प्लेसमेंट अमेरिका की एक बड़ी कंपनी में हो गया था। पाखी के ब्याह में वह चार दिनों के लिए आया था। इसके बाद उसे दो साल के लिए अमेरिका चला जाना था।

ब्याह के बाद पाखी भी सिंगापुर चली गई। ब्याह की रौनकों से भरा घर बिल्कुल सूना हो गया। बिटिया के ब्याह के बाद मां-बाप कथा सुनते हैं सो बृहस्पतिवार को बुआ मां ने कथा रखी थी। कौमुदी पूजा की तैयारियों में लगी थी। बुआ और फूफा जी ने साथ मिल बैठ कर कथा सुनी। कथा समाप्त हो जाने पर सहसा फूफा जी अपनी रामनामी लपेट कर उठ खड़े हुए। बरसों बाद बुआ को सम्बोधित किया, “मृदुल की मां, मैं गंगा स्नान करके वापस आता हूं।’’ बुआ मां जब तक कुछ समझ पातीं, फूफा जी ने अपनी चप्पलें पांव में डालीं और बड़े बड़े डग भरते हुए घर से बाहर निकल गए।

- आभा श्रीवास्तव

कौमुदी ने सम्मान के साथ साथ अपना शरीर भी डॉ. चंद्रा को सौंप दिया, लेकिन जब अधिकार देने की बात आयी, तो डॉ. चंद्रा ने हाथ खींच लिए। बिनब्याही मां बनने जा रही कौमुदी के साथ आगे क्या हुआ, ये कल पढ़िए…

यह धारावाहिक 15 किस्तों का है, अगली किस्त कल पढ़िए…