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E- इश्क:हाथ की तस्वीरें बिस्तर पर रख वह सोचता है, जोया का वो इतना भी विश्वास नहीं पा सका था कि वो उसे अपनी शादी की खबर भी सुना सके?

3 दिन पहले
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स्टेशन की भागमभाग में वो एक परिचित चेहरे को खोजता रहा... हजारों चेहरों में भी तलाश लेता उसे... चार सालों का अंतराल... सारा अतीत उसके सामने आ गया... शायद मेल नहीं पढ़ा होगा... नहीं तो जरूर आती स्टेशन।

वही शहर, वही गलियां, वही रिक्शों की जानी-पहचानी शक्लें, सड़क किनारे कान हिलाते आम के बौर लदे वृक्ष! टेसू खिले पेड़... ‘हां, यही तो मेरा शहर है।’ मन में एक अजीब सी हलचल होने लगी।

जोया क्या आज भी वैसी ही होगी? दुबली-पतली, भावुक, हिंदी फिल्में देखती चुपके-से सिनेमा हॉल में आंखें पोंछतीं।

“कहां जाएंगे बाबूजी?”

“महात्मा गांधी मार्ग”

बंगले की नेम प्लेट पढ़ने में उसे दिक्कत होती है। ‘कनुप्रिया"हां, यही तो है जोया का घर। पहले का समय होता तो धड़धड़ाता हुआ सीढियां चढ़ जाता, पर अब एक अव्यक्त संकोच उसके पांव जकड़ लेता है। माली पानी का नलका छोड़कर हॉल पार करता हुआ अंदर चला जाता है। घास में पानी की बूंदें चांदी की छोटी घंटियों सी चमकने लगती हैं। पानी देखकर उसे महसूस होने लगता है कि उसे प्यास लगी है।

“तुम?”

परिचित मीठी आवाज सुनकर वी पीछे मुड़ जाता है। हां, जोया ही थी, बिल्क़ुल नहीं बदली इन चार लंबे सालों में। वही निश्छल छोटे बच्चे सी मोहक हंसी। वही गेहुआं रंग। आत्मविश्वास के साथ-साथ आधुनिकता आ गयी है चेहरे पर, भंगिमा में शायद एक आई.ए.एस. ऑफिसर होने का अभिमान भी। मैं इन वर्षों में संघर्ष करते-करते कितना बदलने लगा हूं। क़नपटियों पर चांदी के तार झलकने लगे हैं।

“मैसेज कर देते, हम स्टेशन आ जाते।”

“मैसेज किया तो था। प्लेटफॉर्म की भीड़ में काफी देर तक तलाशता भी रहा तुम्हें।”

“तुम्हें पता था मैं नहीं आ रही?”

“पता नहीं, पहले भी ऐसा होता था न, मैं लाइब्रेरी में बैठा-बैठा कल्पना करता था कि तुम आ रही हो और सच तुम आ ही जाती थीं। इस बार भी यूं ही सोचता रहा। बहुत बार ऐसा होता है कि यह जानते हुए भी कि अगला नहीं आ रहा, फिर भी इंतजार करना, अपने आपको मीठा-सा छलावा देना अच्छा लगता है।”

“कविता करना अभी तक नहीं छोड़ा तुमने?”

“पिछले दिनों कुछ चीजें लिखी हैं... एक कहानी संग्रह भी लाया हूं, तुम्हें समर्पित किया है।”

जोया की दृष्टि रह-रह कर दीवार घड़ी की ओर जा रही है, इलेक्ट्रॉनिक घड़ी पर अक्स बनते-बिगड़ते जा रहे हैं।

“मैं आकर पूछूंगी, अभी निकलना होगा मुझे। तब तक तुम लंच कर लो।”

जोया के माथे पर शिकन है। उसे शायद बातचीत अच्छी नहीं लग रही है। अश्विनी जानता है, जोया को गुस्सा आता है तो वो मुंह से कुछ नहीं कहेगी, बस माथे पर बल डाल लेगी। पिछले नौ सालों के परिचय में उसकी एक-एक भंगिमा, एक-एक आदत याद हो गई हैं उसे। वो घंटों जोया के साथ संगम की रेत पर निस्तब्ध बैठा रहा है।

एक जीप और दो कारों का काफिला पोर्टिको से बाहर निकल जाता है। उसे अपनी उपस्थिति अनावश्यक और निरर्थक सी लगने लगती है।

सड़क के पार टेसू के खूब फूल खिलने लगे हैं। पहले ये टेसू, ये लाल गुलमोहर कितना आकर्षित करते थे उसे। घंटों पेड़ के नीचे चुनता रहता था। छात्र परिषद के चुनाव की गहमागहमी में भी वो या तो संगम पर होता था या विश्वविद्यालय के टेसू के नीचे। कमरे से निकल कर आम के पेड़ों की छांह में टहलते हुए सोचता है, पुराने यार-दोस्त बिखर गए हैं। कुछ देश के बाहर चले गए हैं, कुछ प्रशासनिक सेवाओं में लग गए हैं। एक वही अभिशप्त-सा भटक रहा है। पहाड़, जंगल घूम रहा है।

“जोया अभी लौटी नहीं?” वो आम के पेड़ों की छांह से कमरे में लौट आया है।

“वहां से कहीं और निकल गई होगी। उसे सूट के डिजाइन पसंद करने थे। मुझे तो कुछ पता नहीं उसे किस काट के पसंद हैं? जोया का ब्याह है न जून में।”

“बताया नहीं उसने।”

“शायद बताना भूल गयी हो! सगाई के फोटो देखे तुमने?” जोया की मम्मी उसके सामने एक छरहरे युवक की तस्वीर रख देती है। “अच्छा लड़का है। लाखों-करोड़ों का व्यापार है, पर मांग कुछ नहीं है, फिर जोया ने खुद चुना है लड़के को।”

उनकी आंखें खुशी से चमक रही हैं। बेटी का घर बस रहा है, उसी बेटी का जिसे ब्याह से चिढ़ थी।

“बड़ा अफ़सोस होता रहा बेटा, तुम्हारे जैसा होनहार लड़का बार-बार वायवा में फेल होता रहा। अभी कहां हो?”

“आर्मी में, सेकेंड लेफ़्टिनेंट हूं।”

“मम्मा!” जोया थी दरवाजे पर। बाहों में ढेर सारे पैकेट थामे। हाथ की तस्वीरें बिस्तर पर रख वह सोचता है, जोया का वो इतना भी विश्वास नहीं पा सका था कि वो उसे अपनी शादी की खबर भी सुना सके? क्या उसने जाने-अनजाने, दिन-रात, सुबह-शाम जोया से उन प्रश्नों के उत्तर का इंतजार नहीं किया, जो उसकी आंखों में हमेशा मौजूद रहते थे.

“तुम बेवक़ूफ़ हो अश्विनी! उसे भूल जाओ। या तुम मूर्ख हो या वो तुम्हें मूर्ख बना रही है।”

तिक्त अवस्थी शराब के नशे में अक्सर उसका मजाक उडाता था।

“तुम कुछ बनोगे, कुछ करोगे जिंदगी में तो मुझे भी गर्व होगा न!”

कभी कहा था जोया ने, तब उसके सामने सुनहरा भविष्य था, शानदार कैरियर चुनने के अवसर थे। वो अपने शहर आकर आई. ए. एस. के लिए कड़ी मेहनत कर रहा था। तब जोया की मुलाकातें बड़ी उत्साहवर्धक होती थी। पर शायद समय ने उसका साथ नहीं दिया। जोया के मैसेजेस का भी स्वर बदलता गया।

"कविता लिखना, टेसू के फूल चुनना, ज़िंदगी जीना अलग-अलग ध्रुव हैं, सिर्फ टेसू के रंग के सहारे ज़िंदगी के रंग तो नहीं जिए जा सकते न? मैं तो वही करूंगी जो मम्मी कहेंगी।”

“लेट्स गो आउट।”

किले के प्राचीर पर बैठे हुए उसे ठण्डी हवा से सिहरन सी होने लगी है। गेस्टरूम की छनती रोशनी, क़िले के बाहर गंगा के पानी पर कांप रही है थरथराती लौ सी। ‘तमन्नाओं के बहकावे में हम अक्सर आ ही जाते हैं।’ टेप पर चित्रा की तीखी-कांपती सी स्वर लहरी आ रही है। जिस आस लौ के सहारे सारे टूटते स्वप्नों को जोड़-जाड़ कर वो अब तक जीता रहा है, सहसा खील से बिखर गए हैं। फौज के कठिनतम जीवन में भी एक लौ हर पल, हर शाम, हर सुबह उसके मानस में धीरे-धीरे अगरबत्ती-सी सुगंध बिखेरती रही है, वो थे जोया के कभी कभार पहुंचने वाले मैेसेजेस।

वापसी में कार ड्राइव करती जोया ने गंभीरता से उससे पूछा, “इतने गंभीर क्यों हो? पहले तो बात करके भेजा खा जाते थे!”

“क्या बात करूं? लगता है सारी सोच-समझ जंगल में कहीं भटक गई है।”

“पता है इस बार यहां टेसू खूब खिले हैं।”

“लेकिन उनका रंग कहीं अंधेरे में बिखर गया है।” वो व्यंग्य से हंसता है।

“मैं सिर्फ सोचती रही और टेसू का रंग कब मेरी राह से पीछे छूट गया, मैं जान ही नहीं पाई।”

“टेसू तो वहीं खड़े हैं, तुम ही आगे निकल गईं।”

“लेकिन अब पीछे नहीं लौटा जाएगा, हो सके तो मुझे माफ कर देना, मुझे न सही उन पलों को जो हमने एक साथ जिए थे कभी।”

जोया के कांपते होंठ उसके होंठों पर झुकते हैं।

“जोया, मैंने तो शिकायत नहीं की, तुमने ही अपनी राह चुनी न? फिर ये आंसू?” उसको बाहों में खींचकर अविनाश ने पूछा।

“ये आँसू, जो पीछे छूट गया, उसके लिए हैं। जानती हूं, जो पीछे छोड़ आयी हूं, उसके लिए कभी पीछे जाया नहीं जा सकेगा,” जोया अपने को अलग कर लेती है।

टेसू के पेड़ पर से एक पक्षी पंख फड़फड़ाता हुआ दूर, दूसरे पेड़ पर जा बैठता है। हवा चलती है, कार की छत पर टप-टप फूल टपकते हैं। अच्छा है अंधेरा है, टेसू को भी उसकी गीली आंखें नहीं दिखेंगी।

- पुष्पा भाटीया

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