E-इश्क:पन्द्रह बरसों में अकेले रहते हुए पता नहीं कितनी बार वो रोई, टूटी, बिखरी, लेकिन तब भी इंतजार करती रही

9 दिन पहले
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श्वेता की विदाई सुबह ही हो गई थी। घर कितना खाली-खाली सा लग रहा था। द्वार पर सजे बंदनवार और गेंदे के फूल सूख गये थे। पूरे घर में एक मीठी महक फैली हुई थी- मिठाइयों की, फूलों की, पूजा के हवन की, धूप की। नवंबर की धूप सुखदाई होती है। यही नवंबर था जब बरसों पहले ब्याह कर वह इस घर में आई थी। अलमारी का पल्ला खोल कर वैष्णवी अपनी यादों के नवंबर में डूब उतरा रही थी। पिछले तीन चार दिनों की उतरी हुई साड़ियां यों ही बिना तह लगे रख दी थीं उसने। कितनी सुंदर लग रही हैं ये रंगबिरंगी साड़ियां। सबसे ऊपर सलेटी रंग की कांजीवरम है- नन्हीं सुनहरी बूटियां और गहरा मैरून बॉर्डर। कल शाम ही तो पहनी थी ये साड़ी वैष्णवी ने, श्वेता के द्वारचार के समय। जूड़े में बेला का गजरा और मोती की एक लड़ डाल ली थी गले में। जैसे ही कमरे से बाहर निकली, विनय सामने पड़ गए थे। ये मात्र एक संयोग था या विनय सचमुच उसे लेने आए थे दामाद के स्वागत के लिए? वैष्णवी को देखते ही ठिठक गए , “ ये साड़ी...”

एक पूरा अतीत कौंध गया इन दो शब्दों की गूंज से। विनय की गहरी दृष्टि ने कितना कुछ याद दिला दिया था वैष्णवी को। घर छोड़ने से पहले ये विनय का अंतिम उपहार था उसके लिए। बीत गए पन्द्रह बरसों का खालीपन जैसे इन दो शब्दों से भर सा गया। क्या विनय को इस साड़ी की याद है? उस समय तो कभी भी वैष्णवी के साज सिंगार, पहनने ओढ़ने पर ध्यान नहीं देते थे विनय।

विनय और वैष्णवी का विवाह एक चर्चित विवाह था। विनय क्लास वन अफसर और वैष्णवी एमए फाइनल की छात्रा। रिश्ता अच्छा मिल गया था तो इम्तहान से दो महीने पहले ही विवाह की तारीख रख दी गई थी। विनय की पद-प्रतिष्ठा वैष्णवी के घरवालों के लिए गौरव और सुकून की बात थी।

नादान, अपरिपक्व और आदर्शवादी- यह वैष्णवी थी। गंभीर, ज़िम्मेदार, मातृभक्त और दिदिया के दुलारे- ये विनय थे। वैष्णवी के बचपने, शिकायतों और उलाहनों पर एक शान्त सी मुस्कराहट दे कर रह जाते थे विनय, जिसका वो कोई अर्थ नहीं समझ पाती थी।

सहसा पास के कमरे से कुछ ऊँचे स्वरों को सुनकर वैष्णवी अतीत को पीछे छोड़ती हुई वर्तमान में वापस आ गई। मेहमानों के जाने की चहल पहल और उनकी विदाई का हल्का हल्का शोर आ रहा था। बीच बीच में अम्मा और दिदिया के स्वर। मेहमान- वैष्णवी को झटका-सा लगा। उसकी हैसियत भी तो इस घर में मेहमान जैसी ही है। श्वेता की मां है वो- लेकिन मेहमान। विवाह के दो दिन पहले आई और दो दिन बाद चल देगी। कैसी विडंबना है कि उसे अपनी कोख़जाई के विवाह में इस तरह आना पड़ा है।

वो लौट जाएगी फिर से अपनी दुनिया में। सुबह ऑफिस, शाम को कोई मूवी या डिनर और रात को देर तक किताबें पढ़ते रहना। ये चहल पहल, ये भाभी, चाची, मामी, दुल्हन के संबोधनों की पुकार, ये लाल हरी चूड़ियां, मेहंदी, आलता, सिंगार, सब कुछ यहीं छूट जायेगा। दूसरे कमरे में अम्मा, दिदिया और विनय की बातचीत चल रही है। वैष्णवी सबकुछ साफ-साफ सुन रही है। पगफेरे के लिए श्वेता को शाम को आना है। बेटी दामाद और उनके घरवालों को उपहार क्या दिया जायेगा या उनके लिए खाने में क्या बनेगा- इसी बात पर चर्चा चल रही है। वैष्णवी निर्लिप्त भाव से अजनबी की तरह अकेली बैठी थी। लेकिन मन में एक ईर्ष्या भाव क्यों? ये अधिकार तो उसे पहले भी नहीं था जब वो सच में इस घर की बहू हुआ करती थी।

पन्द्रह बरस पहले पार की थी इस घर की दहलीज, इस वादे के साथ कि श्वेता के ब्याह में कन्यादान का अधिकार बस उसका ही होगा। क्यों पार करी थी दहलीज? बहुत से छोटे छोटे कण और कारण थे जो मिलकर अलगाव का पर्वत बन गए थे। साहित्यानुरागी वैष्णवी का मन पन्त, महादेवी और निराला की कविताओं में अनुरक्त था। शिवानी की नायिकाओं का सौन्दर्य, कोमलपन उसका आदर्श थे। लेकिन यहां आकर उसे लगता कि उसका अस्तित्व कुएं में गिर गया है। सुबह से शाम तक रिश्तेदारों की मेहमाननवाज़ी, उनकी निरर्थक बकवास सुनते रहना, आए दिन के व्रत उपवास, ढकोसले, रीति रिवाज, छुआछूत, पाखंड, इन सभी में वो खोती जा रही थी। श्वेता के जन्म के बाद अम्मा ने तो उसे कभी वैष्णवी के पास आने ही नहीं दिया। कभी ढंग की साड़ी-गहने पहन कर तैयार होती तो विधवा दिदिया की भेदने वाली निगाह वैष्णवी को आरपार बींध जाती। वो न मन का खा सकती थी, न पहन सकती थी, न मन से सो सकती, न जग सकती थी।

श्वेता के लिए तो विनय सावधान हुए और समय रहते उसका दाखिला देहरादून के एक प्रख्यात कॉन्वेंट में करवा दिया, लेकिन वैष्णवी, उसका क्या? कितनी कोशिश करी थी उसने अपने मन को समझाने की, लेकिन उसके मस्तिष्क ने हर तर्क की काट उसके मुंह पर दे मारी थी।

वैष्णवी ने सोचा कि प्रेम का प्रवाह हर अवरोध को मिटा देगा। लेकिन कैसा प्रेम? प्रेम की सरसता भी तो कहीं नहीं थी कि जिसके पीछे वो सारा जीवन यों ही काट देती। कभी घड़ी दो घड़ी बैठ कर विनय के साथ कहने सुनने का समय भी तो न था। विनय का डरपोक प्रेम निवेदन बस रात के अंधेरे में ही जागृत होता। पति से रूठने मनाने के सपने भी तो कभी के दफन हो गए थे। विवाह के दस वर्षों में उसका मन रीता का रीता ही रह गया। वो विनय से कभी मन से जुड़ ही नहीं पाई। बूढ़ी मां और विधवा दिदिया की भावनाओं को कहीं से ठेस न पहुंचे, इस बात का विनय विशेष ध्यान रखते। लेकिन वैष्णवी न तो बूढ़ी थी, न ही विधवा। कितना सहन करती।

एक ठोस निर्णय ले पाना उसके लिए आसान न था। उसने तय किया कि ऐसा जीवन उसे नहीं चाहिए। लक्ष्मण रेखा उसे पार करनी ही थी। विनय स्तब्ध थे, अवाक् थे। लेकिन वैष्णवी दृढ़ थी अपने निर्णय पर। श्वेता के लिए उसने कोई विवाद नहीं किया। बस उसके कन्यादान का अधिकार मांगा था।

पन्द्रह बरसों में अकेले रहते हुए पता नहीं कितनी बार वो अपने एकांत में रोई, टूटी, बिखरी, पछताई, लेकिन तब भी इंतजार करती रही कि शायद विनय उसे पुकार लें, बुला लें। लेकिन नहीं, कहीं, कभी, किसी ने नहीं पुकारा। इन वर्षों में विनय जब जब सरकारी काम से दिल्ली आए, वैष्णवी से मिलते रहे। उसी तरह जैसे एक मित्र दूसरे मित्र से मिलता है, लेकिन कभी लौट चलने के लिए नहीं कहा।

वैष्णवी के गले में कुछ फंसने सा लगा था। दरवाज़े पर आहट हुई। विनय थे। वे भीतर आकर सामने सोफे पर बैठ गए। हमेशा की तरह गंभीर। शायद कुछ उदास से भी थे। उनके हाथ में एक मखमली डिब्बी थी। वे कैबिनेट पर रखे अमूर्त चित्रों को देख रहे थे। शायद देख वहां भी नहीं रहे थे। सहसा लगा कमरे का सन्नाटा बहुत गहरा हो गया है। कमरे में विनय, वैष्णवी और सन्नाटे की गहरी चादर।

“ये तुम्हारे लिए... मेरी तरफ से एक उपहार.... श्वेता की मां को।” विनय का स्वर कातर हो आया था। वैष्णवी अनझिप आंखों से विनय को देख रही थी। उसकी दृष्टि विनय की कनपटी के कई सारे सफेद बालों पर ठिठक गई थी। जी में आया विनय से लिपट कर रो दे। उसने डिबिया खोली- लाल कागज में लिपटा झक-झक करता मंगलसूत्र और सोने के कंगनों का एक जोड़ा। बरसों पहले सोने के जेवर पहन लेने पर अम्मा का कसा एक तंज याद आया- शौक़ीन बुढ़िया, चटाई का लहंगा।

“मैं अब सोने के जेवर नहीं पहनती, विनय।” उसका कंठ भर आया था। विनय, वैष्णवी को रोक लेना चाहते थे शायद। उनकी आंखों के कोरों का गीलापन वैष्णवी ने देख लिया था। उम्र बढ़ने के साथ भावनाओं को छिपाना कितना कठिन हो जाता है।

वैष्णवी ने अपना सामान सूटकेस में जमाना शुरू कर दिया था। विनय बहुत मंद स्वर में कह उठे, “रुक जाओ विशु, जाना इतना भी जरूरी है क्या?” वो उसके बिल्कुल पास आ गए थे। वैष्णवी कांप उठी। इन कुछ ही पलों में उसकी दृष्टि में पूरा अतीत, वर्तमान की सी तीव्रता के साथ घूम गया। हर क्षण उसने मानो दोबारा से जी लिया। उसने पलट कर विनय को देखा। वहां एक आस थी, एक आग्रह था वैष्णवी को रोक लेने का। उन पर तरस हो आया उसे। लेकिन तरस से क्या रिश्ते निभ सकते हैं? नहीं, इस क्षण कमजोर नहीं पड़ना है उसे।

“मुझे जाना होगा विनय, तुमने पुकारने में बहुत देर कर दी। वहां कोई मेरे इंतजार में है।”

वैष्णवी के लिए अब स्वयं को संभाल पाना कठिन होता जा रहा था। जाते हुए उसने आभूषण की डिब्बी टीवी के कैबिनेट पर रख दी थी।

- आभा श्रीवास्तव

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