E-इश्क:एक बार मुझसे प्यार करके देखो, तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारी सो कॉल्ड सोफेस्टिकेटेड दुनिया से कहीं ज्यादा बेहतर हूं मैं

5 महीने पहले
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गाड़ी तेज गति से भागती जा रही थी। रात का सन्नाटा उसे परेशान कर रहा था। सुबह का समय हो तो खिड़की से बाहर झांककर प्रकृति का आनंद उठाया जा सकता है। जब भी सुकेश की जिद के आगे झुककर उसने खुली खिड़की के साथ बैठकर सफर किया था तो उसे अच्छा ही लगा था। हालांकि यह बात उसने सुकेश से कभी कही नहीं थी। वह अक्सर ही हिचकिचा जाती थी अपनी छोटी-छोटी खुशियों को व्यक्त करने में। उसे लगता था ऐसा करना उसके स्टेटस और सोच के साथ फिट नहीं बैठता है। यही वजह है कि वह कभी मौसम का मजा नहीं ले पाई। नंगे पांव नरम ओस से भीगी घास पर नहीं चल पाई।

उसका मन भी गाड़ी की रफ्तार के साथ भाग रहा था। बीती बातें भी उसके साथ-साथ दौड़ रही थीं। नहीं, वह नहीं सोचेगी किसी भी चीज के बारे में…, उसे तो बस जल्दी से जल्दी बनारस पहुंचना है।

कहते हैं कि यहां पहुंचकर एक अजब-सी शांति का एहसास होता है। तभी तो शांति की तलाश में सुकेश ने भी यहीं का रुख किया था। घरवालों, रिश्तेदारों और दोस्तों… सभी ने कहा कि कोई तलाश नहीं है, यह तो पलायन है। भला कोई घर-गृहस्थी की जिम्मेवारी छोड़कर यों भागता है। वह तो अच्छा है कि रुचि कमाती है, वरना क्या होता उसका।

न वह विरोध कर सकती थी और न ही उनकी बात का समर्थन कर स्वीकृति दे सकती थी। आखिर गलती तो उसी की थी। हर बात में परफेक्शन ढूंढने वाली वह सुकेश के सलीके से न रहने पर अक्सर व्यंग्य कसती। सबसे ज्यादा गुस्सा तो उसे तब आता जब वह उसकी हर बात को हंसकर टाल देता या फिर उसे कहता, “रिलैक्स रहा करो। खुश रहने के लिए सहज रहना जरूरी है, न कि परफेक्ट होना।

वह और चिढ़ जाती। मन में खयाल आता कि आखिर यह आदमी अपने आप को समझता क्या है। विवाह हुए चार साल हो गए थे, लेकिन अभी तक उसके प्रति प्यार नहीं पनप सका था। दैहिक संबंध बनते भी तो बिना किसी उष्मा और प्यार के। हमेशा एक ही बात उसे परेशान किए रहती कि सुकेश स्मार्ट नहीं है। माना कि वह मथुरा जैसे शहर में पला-बढ़ा है और छोटे शहर की मानसिकता से बाहर आना आसान नहीं होता, पर दिल्ली आए भी तो उसे बरसों हो गए हैं। आखिर क्यों वह ग्रो नहीं करना चाहता? रंग-रूप पर तो किसी का बस नहीं है, पर अपनी चाल-ढाल और सोच को तो संवारा जा ही सकता है।

वह एक ब्यूरोक्रेट की बेटी, सोफिस्टिेकेशन उसके खून में था, लेकिन बिजनेस के दांव-पेंच में उलझे सुकेश को उसकी सोफिस्टिकेशन बेवकूफी लगती। गीला तौलिया बिस्तर पर छोडऩा, उसके लिए सामान्य बात थी और ठंडा खाने से उसे कोई परहेज नहीं था। वह वैसे ही करता जैसे उसका दिल करता। वह कुढ़ती रहती। धीरे-धीरे कुढ़न शब्दों में प्रकट होने लगी। “तुम हर काम को एक बेगार की तरह क्यों करते हो? हर चीज को करने का एक ढंग होता है।”

‘‘यह सलीका तुम्हें इसलिए सूझता है, क्योंकि तुम एक सरकारी आदमी की बेटी हो। समय की कमी तो होती नहीं उनके पास। मेरे पास इतना वक्त नहीं कि इन चोंचलों में उलझूं।”

‘‘ये चोंचले नहीं हैं सुकेश, जीवन को सही ढंग से जीने की कला है।”

“फिजूल है सब। तुम्हारी तरह बेवकूफी मैं नहीं कर सकता कि लिफाफे पर स्टैंप भी जगह पर लगाऊं। अरे टेढ़ा-मेढ़ा लग भी गया तो क्या पोस्टमैन उस लैटर को डिलीवर करने से मना कर देगा?”

वह जल-भुन जाती। धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। उसे सुकेश के साथ जाने में, साथ चलने में एक हीनता महसूस होने लगी।

“मैं तुमसे प्यार नहीं करती।” अपने चार वर्ष के वैवाहिक जीवन में हजारों बार वह उससे यह बात कह चुकी थी।

“लेकिन मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं।”

रुचि उसकी बात सुन वह हैरान रह जाती।

“मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती। कम से कम अपने कपड़ों पर तो ध्यान दिया करो और फोन पर कितना चिल्लाकर बात करते हो।”

“मुझ पर किताब लिखना बंद करो। बातें अपने मन में रखा करो। मैं ऐसा ही हूं। नहीं रहना चाहती तो जा सकती हो, मेरी तरफ से तुम आजाद हो।” वह तिलमिलाकर रह जाती। आखिर कैसे हराए इस आदमी को। किसी बात से आहत नहीं होता।

वह तरक्की करती गई और अपने पद और पैसे के सामने उसे सुकेश का व्यक्तित्व और भी बौना लगता गया।

“एक बार तुम मुझे समझने की कोशिश करो, मुझसे प्यार करके देखो, तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारी सो कॉल्ड सोफिस्टिेकेटेड दुनिया और अपने को स्मार्ट कहने वाले पुरुषों से कहीं ज्यादा बेहतर हूं मैं।”

तर्क-वितर्क लंबे खिंचते गए। लड़ाई वर्चस्व की नहीं थी, लड़ाई थी उसे बदलने की जो स्वयं तो आत्मविश्वास से भरपूर था पर रुचि में एक हीनभावना भर रहा था। वह चार दिनों के लिए ऑफिस के काम से मुंबई गई थी। वापस आई तो घर में खिंचा सन्नाटा उसे कंपा गया। सुकेश जा चुका था। मोबाइल पर तभी एक मैसेज आया। ‘रुचि, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं और तुम्हें खुश देखना चाहता हूं इसलिए जा रहा हूं।’

कुछ पल को रुचि को लगा कि वह अब उन्मुक्त गगन में उड़ सकती है, वह जो चाहे कर सकती है, जैसा चाहे रह सकती है। उसने अपने ढंग से उसने घर को सजाया। हर चीज से परफेक्शन झलकने लगी। इस सबके बावजूद उसे कुछ खालीपन महसूस होने लगा था। उसने अपने मन को टटोला कहीं ऐसा सुकेश के न होने की वजह से तो नहीं है। नहीं, नहीं, ऐसे कैसे हो सकता है? वह क्या उसे प्यार करती थी? उसकी अनुपस्थिति उसे इतनी खल क्यों रही है? महीना ही बीता था कि उन चमकने वाली चीजों में धूल नजर आने लगी उसे। वह खाली घर में लौटती तो परदे, दीवारें और सलीके से सजी हर चीज उसे मुंह चिढ़ाती प्रतीत होती।

उसके सोफिस्टिकेटेड दोस्तों ने जब उसे अकेला देखा तो उसका फायदा उठाना चाहा। एक झटका सा लगा उसे। सुकेश का यही लोग कितना मजाक उड़ाते थे, पर क्या सुकेश ने अपने या उसके दोस्तों की पत्नियों के साथ अभद्र व्यवहार किया था। हमेशा एक सीमा में रहता था वह। ग्रो करने की शायद उसकी परिभाषा ही गलत थी।

“बारिश में भीगकर जुकाम नहीं होता, बल्कि बहुत लुत्फ आता है। एंज्वॉय करना इसे कहते हैं न कि कमरे की खिड़कियों से झांकते हुए अपने को बचाते हुए बारिश की बूंदों को गिरना देखने को। ये जो मौसम होते हैं न, मन में जीने की नई उमंग भरते हैं,” सुकेश ने एक दिन रुचि से कहा था।

“एंज्वॉय छोटी-छोटी बातों से कर सकते हैं। कभी-कभी जमीन पर लेटना भी अच्छा लगता है।” सुकेश की बात याद आते ही रुचि पलंग से उठ जमीन पर आकर लेट गई।

“लौट आओ सुकेश, उसके दिल से आवाज निकली। हमेशा कहता था बनारस जाने का मन है। वह ढूंढ ही लेगी उसे, इस विश्वास के साथ वह ट्रेन से उतरी। अपनी साड़ी की सिलवटों को ठीक करने की कोशिश नहीं की। बच्चों की तरह भागते हुए वह दो-दो सीढ़ियां एक साथ उतरने लगी। रात की बारिश का असर सुबह की हवा और वातावरण में भी महसूस हो रहा था। मौसम की खुशनुमा तस्वीर को उसने अपनी मन की गहराइयों में बसा लिया।

मंदिरों में बजती घंटियां उसके भीतर प्यार के तार को झनझना गईं। सुकेश से वह प्यार करती है, उगते हुए सूरज को देख यह सच उसकी आंखों में सतरंगी सपनों की तरह बिखर गया।

- सुमन बाजपेयी

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