पीछा करने वाला आशिक:मैत्रेयी ने महसूस किया कि वह रोज उसकी स्कूटी का पीछा करता है, एक दिन वह उसके घर आ पहुंचा

12 दिन पहले
  • कॉपी लिंक

श्रीनिवासन रोज उसे रोज भीकाजी कामा प्लेस जाते हुए देखता था। वह लाजपत नगर में रहता था। वह शायद कहीं और रहती थी, लेकिन दोनों का काम पर जाने का समय लगभग समान होता था और वह उसे दिखाई दे जाती थी। वह बहुत शान से अपनी स्कूटी चला रही होती थी। पतली, छरहरी काया थी उसकी। अक्सर जींस और कुर्ती पहनी होती थी। उसका चेहरा श्रीनिवासन नहीं देख पाता था, क्योंकि वह हमेशा दुपट्टे या स्कार्फ से ढका होता था। श्रीनिवासन ने उसका चेहरा नहीं देखा था, फिर भी न जाने क्यों वह उसकी ओर आकर्षित महसूस करने लगा था।

वह उसके आगे तो कभी बगल से निकल रही होती थी। सिग्नल पर वह उसकी स्कूटी के ठीक पीछे होता था और एक खुशबू उड़ती हुई उस तक पहुंचती थी। आज परफ्यूम की खुशबू है या किसी शैंपू की, यह अनुमान वह कार में बैठे-बैठे लगाता रहता। हो सकता है बॉडी स्प्रे हो।

श्रीनिवासन कोई 20-25 साल का युवा तो है नहीं कि बस लड़की देखी और दीवाना हो गया। वह 35 साल का हो चुका है, लेकिन अपनी पसंद की लड़की न मिलने के कारण अभी तक कुंआरा है। अपनी पसंद को वह शायद ठीक से जान भी नहीं पाया है। लेकिन इस लड़की का चेहरा देखे बिना, उससे कोई परिचय या मुलाकात हुए बिना, उसे लेकर मन में कुछ हलचल जरूर हो रही है। वह सुबह एक मिनट की भी देरी या जल्दी नहीं करता निकलने में। वह नहीं चाहता था कि वह उससे पहले निकल जाए। एक दिन भी उसे न देखे, यह ख्याल उसे अच्छा नहीं लगता है।

किसी तरह बहुत जुगाड़ लगाने और थोड़ी जासूसी करने के बाद, वह जान गया कि वह कहां रहती है। खुद को बहुत रोकने के बावजूद वह एक इतवार उसके घर पहुंच गया। जो होगा, देखा जाएगा, उसने सोचा।

एक बूढ़े व्यक्ति बाहर बालकनी में रॉकिंग-चेयर पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उन्होंने श्रीनिवासन को ऐसे देखा मानो पूछ रहे हों कि क्या किसी को ढूंढ रहे हो।

"बैठो,” उन्होंने श्रीनिवासन से ऐसे कहा जैसे वह उसे जानते हों।

"मैं तुम्हें नहीं जानता। तुम मुझे नहीं जानते। फिर भी तुम यहां कुछ खोजते हुए आ गए हो,” उन्होंने श्रीनिवासन की ओर देखते हुए कहा।

श्रीनिवासन को लगा जैसे वह कोई चोरी करते पकड़ा गया है। वह मुस्कराया।

“लेकिन मैं जानता हूं कि तुम किसी ऐसी चीज की तलाश में हो जो यहां इसी घर में है,” बूढ़े व्यक्ति ने मुस्कराते हुए कहा।

"सर, मुझे समझ नहीं आ रहा है कि आप किस बारे में बात कर रहे हैं।”

"परेशान मत हो। तुम मुंह से चाहे जो बोलो, पर तुम्हारी आंखें सब कुछ बता रही हैं।”

श्रीनिवासन को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। लेकिन वह व्यक्ति उसे एक दोस्त की तरह लगा।

“मुझे लगता है कि तुम्हें मिठाई पसंद है।”

श्रीनिवासन को आश्चर्य हुआ कि वह इस बारे में कैसे जानते हैं। कहीं यह कोई फेस रीडर तो नहीं या कोई ज्योतिषी जो माथे की रेखाओं को पढ़ लेते हों। यह सच है कि श्रीनिवासन को मीठा बहुत पसंद है।

"मैत्रेयी! मिठाई और कॉफी लेकर आओ।"

कुछ ही मिनटों में, वह आ गई। मैसूर पाक, नारियल की बर्फी, केले के चिप्स लिए वह उसके सामने खड़ी हो गई। फिल्टर कॉफी की ट्रे भी उसने मेज पर रख दी। उसका चेहरा ढका हुआ नहीं था। पहली बार श्रीनिवासन ने उसे देखा। सांवली रंगत पर खिलते नैन-नक्श… वह बहुत खूबसूरत थी। उसे लगा जैसे उसके दिल ने धड़कना बंद कर दिया है। इस समय उसने सलवार-कुरता पहना हुआ था। पतली होने के कारण अपनी उम्र से कम लगती थी। लेकिन 30 साल की तो होगी ही, उसने अनुमान लगाया।

"मेरी पोती है। हाउस सर्जन है।”

श्रीनिवासन हिचकिचाते हुए बोला, “सर, मैं श्रीनिवासन हूं। एमएनसी में पीआरओ के तौर पर काम करता हूं।”

मैत्रेयी अपने दादा के बगल में बैठते हुए बोली, “जानती हूं। मैंने आपको अपनी स्कूटी के पीछे कम से कम 150 बार देखा है।”

उसके दादा तुरंत बोले, “तुमने तो 130 बार कहा था।”

"उसके बाद और बीस बार ऐसा हो चुका है,” मैत्रेयी ने थोड़ी झुंझलाहट के साथ कहा।

श्रीनिवासन झट से बोला, “150 बार नहीं, 200 बार पीछे था, आपने सही ढंग से गिनती नहीं की।”

“इस गणना के बारे में बहस करने का क्या फायदा,” मैत्रेयी बोली। श्रीनिवासन ने इस बार निडरता से उसे देखा। आखिर वह उससे प्यार करता है, अब तक वह जान चुका था।

“कुछ जांच-पड़ताल की जानी जरूरी है तुम्हारी,” उसके दादा हंसते हुए बोले।

वह श्रीनिवासन के प्यार के दिन की शुरुआत थी। वह उसे न जाने कब से देख रहा था इसलिए कह नहीं सकता कि कैसे और कब शुरू हुआ प्यार करने का सिलसिला। वह जानता था कि वह उसी के लिए बनी है, शायद इसीलिए वह अब तक कुंआरा था।

उसके बाद कुछ शाम एक-दूसरे को समझने में बीतने लगीं। तब श्रीनिवासन को महसूस हुआ कि मैत्रेयी बहुत पजेसिव है उसे लेकर। वह उसकी हर बात में दखल देने लगी है। प्यार का मतलब किसी की स्पेस में घुसना तो हर्गिज नहीं होता। कुछ दिनों बाद उसे लगा कि वह अकेला और अविवाहित ही ठीक है।

"मैत्रेयी, मैं तुमसे प्यार करता हूं, पर शादी करने के बारे में हमें अभी और सोचना चाहिए। तुम मुझे अपने मरीज की तरह ट्रीट करने लगी हो जो तुम्हारी हर बात माने।”

उसके बाद श्रीनिवासन ने अपना रास्ता बदल लिया।

मैत्रेयी ने कभी फोन नहीं किया, मैसेज नहीं भेजा। श्रीनिवासन फिर से अकेला था, लेकिन हर दिन, हर रात वह उसे याद करने से खुद को रोक नहीं पाता था। उसे ऐसा लगता जैसे वह उसकी जिंदगी है और उसके बिना सब व्यर्थ है। लेकिन उसने फिर भी पहले वाले रास्ते पर जाने के बारे में नहीं सोचा। एक बार फिर से उसकी स्कूटी के पीछे चलने के बारे में नहीं सोचा।

कुछ महीने बीत गए। किसी ने उसे बताया कि मैत्रेयी की शादी मयूर विहार के गुरुवायुरप्पन मंदिर में हो रही है। यह खबर उसे तोड़ गई। आखिर ऐसे कैसे हो सकता है। वह उससे प्यार करता है। वह मंदिर में पहुंच गया। भीतर वह तैयार हो रही थी।

"तुम विवाह कैसे कर सकती हो?"

वह कुछ नहीं बोली। उसे हैरानी से देखने लगी।

"मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं।"

"हां मुझे पता है।"

"मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता, क्योंकि हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं।"

"मैं कैसे विश्वास करूं? तुम मुझसे अलग हुए थे। मेरे साथ तुम्हारा दम घुटने लगा था।”

"तुम मुझसे प्यार करती हो न?"

"हां।"

"फिर शादी क्यों कर रही हो?"

"शादी? मैं तो यहां अपनी दोस्त की शादी में शामिल होने आई हूं।"

"तुम मुझसे शादी करोगी?”

“मुझे कुछ समय चाहिए," मैत्रेयी बोली।

"मैं जानता था तुम यही कहोगी। तुम समय ले लो। लेकिन मुझे कुछ आश्वासन तो दो, किसी किस्म की गारंटी।"

तभी बाहर से विवाह की मंगल ध्वनि आने लगी। पुरोहित कह रहा था, "शुभ समय हो गया है। देरी न करें। ताली (मंगलसूत्र) मंगलसूत्र पहनाएं।”

तभी श्रीनिवासन ने अपनी जेब से ताली (मंगलसूत्र) निकाली और मैत्रेयी के गले में तीन गांठ लगाते हुए बांध दी। वह पल भर को समझ नहीं पाई कि क्या हो गया है। तभी उसे बुलाने आए उसके दादा ने यह देखा और मैत्रेयी और श्रीनिवासन दोनों पर अक्षत फेंक दिए।

"मुझे कुछ गारंटी चाहिए थी। अब चाहे जितना समय लो। मुझे विश्वास है कि तुम मेरी पत्नी हो, अब चाहे जितना समय लो।”

मैत्रेयी ने मंगलसूत्र को गले में झूलते हुए देखा और उसकी आंखों में एक संतोष उभर आया। वह मुस्कराई और उसने श्रीनिवासन को अपनी बांहों में कस लिया। उसके गालों पर अपने अधर रख दिए। श्रीनिवासन ने बहुत पास से उसकी खुशबू को महसूस किया। वह खुशबू उसके भीतर तक उतर गई थी। इस बार वह आश्वस्त था।

- सुमन बाजपेयी

E-इश्क के लिए अपनी कहानी इस आईडी पर भेजें: db.women@dbcorp.in

सब्जेक्ट लाइन में E-इश्क लिखना न भूलें

कृपया अप्रकाशित रचनाएं ही भेजें