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E-इश्क:डॉक्टर आशीष के लिए कई रिश्ते आए, लेकिन कभी दहेज के लालच का इल्जाम लगा, कभी आशीष को चरित्रहीन बताकर रिश्ता तोड़ दिया गया

14 दिन पहले
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”सिम्मी, कौन कहता है कि धरती और आकाश कभी एक नहीं हो सकते? देखो उस क्षितिज को जहां अंबर और धरती परस्पर एक हो रहे हैं।” सिम्मी ने अपनी नीली आंखों पर से घनेरी पलकों का आवरण हटा कर, अपनी आकर्षक निगाहों से आशीष की आखों में झांकते हुए पूछा,”एक बात बताओ आशीष, मुझे पाने के लिए तुमने अपनी धन पिपासु मां, सिद्धांत धनी पिता व इस आडंबर मयी निष्ठुर समाज से लोहा कैसे लिया?” ”बहुत संघर्ष करना पड़ा सिम्मी। सच, प्रेम की राह इतनी आसान नहीं जितनी लोग समझते हैं!” कहते हुए आशीष की आंखों में अतीत की स्मृतियां दौड़ने लगीं। नर्सों के समूह से अलग-थलग, शांत और गंभीर सिम्मी, रोगियों की सेवा में तन्मयता से जुटी रहती, मुस्कान विहीन चेहरे पर हर समय घनघोर उदासी छाई रहती। डॉक्टर आशीष उसकी इसी उदासीन छवि पर मुग्ध हो उठे थे। उसकी स्वच्छ पारदर्शी पनीली आंखों का सौंदर्य आशीष की आंखों में गहराई से उतरता चला गया था। कई बार वो उससे बोलने का प्रयास करते, लेकिन सिम्मी केवल यस सर, नो सर, सॉरी सर कहकर ही बातचीत खत्म कर देती। उन्हीं दिनों उनका चुनाव पोस्ट ग्रेजुएशन विषय के लिए हो गया था। मन में एक अभिलाषा रह गई कि वो मन में उपजी चाह सिम्मी के सामने जाहिर नहीं कर पाए। एक दिन मौका मिलते ही उन्होंने अपने मन के भाव सिम्मी के सामने रख दिए थे। ”मैं तुम से...” आगे के शब्द उनके कंठ में ही अटक कर रह गए थे। ”नो सर, धरती और आकाश की कोई समानता नहीं। वो कभी एक नहीं हो सकते।” नतमस्तक सिम्मी उंगलियों के पोरों से आंसू पोंछते हुए कमरे से बाहर निकल गई। विशेषज्ञ बनने के बाद आशीष के रिश्ते के लिए धन कुबेरों की लंबी लाइन लग गई। हर कोई अपनी बेटी की तारीफ करते नहीं थकता, लेकिन आशीष किसी भी प्रस्ताव से सहमत नहीं होते थे। माता-पिता और आशीष के बीच इस बारे में कई बार बहस हुई। पिता ने अपनी प्रतिष्ठा का हवाला दिया और मां ने तो स्पष्ट चेतावनी दे दी थी कि अगर आशीष अपनी मर्जी की लड़की से शादी करेगा, तो मां का मरा हुआ मुंह देखेगा।

डॉक्टर आशीष ने अस्त्र-शस्त्र डाल दिए। उनके मुंह से स्वीकृति मिलते ही सेठ रघुवीर प्रसाद ने अपनी बेटी का रिश्ता आशीष के लिए सुनिश्चत करके अपनी तिजोरी का मुंह खोलकर सबको पूरी तरह संतुष्ट कर दिया। जैसे किसी व्यक्ति को जीवित ही दफन करने की तैयारी की जा रही हो। हॉस्पिटल में रोगियों के बीच आशीष का मन नहीं लगता था, घर का सूनापन काटने को दौड़ता। बस यहां-वहां भटकते रहते। एक शाम पास खड़े पौधे की पंखुड़ियों को बेरहमी से तोड़-तोड़ कर फेंक रहे थे कि एक मधुर आवाज ने उन्हें चौंका दिया। सिम्मी खड़ी थी सामने। “ये फूल तो गले का हार बनाने के लिए होते हैं, कुचलने-मसलने के लिए नहीं।” ”अपने अरमानों की बारात सजा रहा हूं।” वो फीकी हंसी हंसे, “इस ठूंठ को अपनी बाहों का सहारा दे दो सिम्मी।” चुपचाप खड़ी सिम्मी सोच में पड़ गई, “ये किस दर्द की महक आ रही है?”आशीष की आंखों से छलके आंसुओं को अपनी कोमल हथेलियों से पोंछते हुए सिम्मी बोली, ”मैं भी आपसे बहुत प्यार करती हूं आशीष, लेकिन एक तरफ माता-पिता के अनेकों अरमान और दूसरी तरफ माथे पर हार्ट स्पेशलिस्ट का रुतबा, लोग अपनी तिजोरियों के मुंह खोले हुए हैं, उसके लिए क्या मुझ जैसी साधारण नर्स का संबंध सही होगा? मेरे पिताजी में तो इतना भी सामर्थ्य नहीं कि अपनी कैंसर ग्रस्त पत्नी का इलाज सही ढंग से करा सकें। इतनी असमानताएं क्या हमें एक होने देंगी आशीष?” ”अपनी बांहें पसारकर एक बार मेरा नेह आमंत्रण स्वीकार तो करो! फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा।” सिम्मी ने अपने दोनों हाथ आशीष की ओर बढ़ा दिए। दोनों के मन में जैसे अनगिनत फूलों की क्यारियां एक साथ खिल उठीं। शादी की तैयरियां चल रही थीं। एक दिन अचानक गुस्से में पैर पटकते हुए सेठ रघुवीर प्रसाद ने आशीष के साथ अपनी बेटी का रिश्ता तोड़ दिया। बोले, “मेरी बेटी ने ऐसे चरित्रहीन लड़के के साथ शादी करने से साफ इनकार कर दिया है। मैंने जो कुछ दिया है वापस कर दो, वरना पुलिस हथकड़ियां पहनाकर वसूल करेगी।” मुहल्ले वालों की भीड़ लग गयी। मित्रों, परिजनों द्वारा किए गए समझौते के सभी प्रयास फेल हो गए। उसके बाद भी डॉक्टर आशीष के लिए कई रिश्ते आए, लेकिन कभी दहेज के लालच का इल्जाम लगा, कभी आशीष को चरित्रहीन बताकर रिश्ता तोड़ दिया गया। जैसे सब कुछ किसी डोर से सुनियोजित रूप से संचालित किया जा रहा हो। माता-पिता हैरत में थे कि अचानक उनके बेटे और परिवार पर कीचड़ कौन उछाल रहा है और क्यों? क्या आशीष का विवाह भविष्य में कभी नहीं हो पाएगा? फिर जैसे चमत्कारिक रूप से सिम्मी के पिता अपनी बेटी का रिश्ता लेकर आशीष के घर आए। बोले, “मेरी बेटी जैसी भी है, जो कुछ भी है, आपके सामने है। आप साक्षात्कार करके संतुष्ट हो सकते हैं। इस हीरे के अतिरिक्त मेरे पास कुछ भी नहीं है।” मां की नजर जब उस निर्मल, भोले और नैसर्गिक सौंदर्य पर पड़ी, तो उसे एकटक निहारती रह गईं। बोलीं, “तू ही मेरे घर की लक्ष्मी बनेगी। परिणय संस्कार आज की ही शुभ घड़ी में होना चाहिए।” कहकर उन्होंने तुरंत सिम्मी को गले लगा लिया। ”आशीष, आपने ये तो बताया नहीं कि ये सब संभव हुआ कैसे?” ”मैं इन सब उम्मीदवारों को आवाज बदलकर फोन कर देता था कि आपकी बेटी जीवनसाथी के रूप में जिस राजकुमार के सपनों में खोयी हुई है, वो चरित्रहीन है और उसका पिता दहेज का लोभी। आपको आगाह करना मेरा कर्त्तव्य है, आगे आपकी मर्जी।” ”बड़े नाटकबाज हो।” ”अगर नाटकबाज न होता तो क्या तुम्हें पा सकता था?” आशीष, सिम्मी की आंखों की झील में उतर आए। सिम्मी की आंखें झुक गईं। आशीष ने उसे बांहों में भर लिया और उसकी गुलाबी पंखुड़ियों पर चुंबनों की झड़ी लगा दी। सिम्मी उसकी बाहों में सिमट गई।

- पुष्पा भाटिया

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