E-इश्क:मानसून अपने शबाब पर था और हमारा प्रेम पराकाष्ठा पर

एक महीने पहले
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तन्हाई में अक्सर दिल के दरवाजे पर तुम्हारी यादों की दस्तक से कुछ खट्टे- मीठे और दर्द में भींगे लम्हे जीवंत होकर मानस पटल पर मोतियों की तरह बिखर जाते हैं उन्हीं में से एक खुबसूरत लम्हा है "मैं तुम और मानसून" आज भी याद है मुझे हमारे प्रणय का प्रथम मानसून....

तुम मेरे सामने वाले घर में किरायेदार के रूप रहते थे और हमारा खुद का घर था। संयोग था हमारा कॉलेज एक ही था साथ साथ कॉलेज जाते थे एक दूसरे के घरों में भी आना जाना था धीरे -धीरे कब एक दूसरे के दिलों में उतर गए दोनों को ही खबर ना थी... बेखबर और बेपरवाह थे। आज की तरह मोबाइल पर मैसेज आदान प्रदान करने की सुविधा नहीं थी लेकिन हमारी आंखों के इशारे ही हमारे मैसेज थे ... चिट्ठी पत्री में भी विश्वास नहीं था एक दूसरे की खामोशी को शब्दों में ढालकर पढ़ने का जबरदस्त हुनर था हम दोनों को। एक बार यूं ही प्लान बना लिया ताजमहल का शायद दोनों के मन में प्रेम के प्रतीक ताजमहल के समक्ष अपना प्रणय निवेदन करने की चाह थी। बस एक रोज निकल पड़े ताजमहल निहारने। घरों से अलग अलग निकले छिपते छिपाते... सावन का महीना था बादल सूरज से लुका छिपी का खेल खेल रहे थे हल्की फुल्की बौछारों से नहाए ताजमहल की खूबसूरती में चार चांद लग रहे थे संगमरमर से टपकती बूंदों से उस वक्त मुहब्बत के साक्षात दर्शन हो रहे थे... उस हसीन नजारे को देखकर हम दोनों भावुक हो उठे .. एक नजर ताजमहल पर डाली तो लगा जैसे प्रकृति ने बारिश की बूँदों के रूप में पुष्पों की बारिश करके उसे ढक दिया है जिससे उसका सौष्ठव और दैदीप्यमान हो उठा है। अचानक बादलों की तेज गड़गड़ाहट से मैं डरकर तुम्हारे सीने से लग गई और तुमने मुझे इस तरह से थाम लिया जैसे मैं कहीं तुमसे बिछड़ ना जाऊं। और फिर जोर से झमाझम बारिश होने लगी मैं तुम्हारी बाहों में लाज से दोहरी होकर सिमट गई... मैं झिझक रही थी लजा रही थी और तुम्हारी बाहों से खुद को छुड़ाने का असफल प्रयास कर रही थी बारिश जब तक थम नहीं गई तब तक हमारी खामोशियाँ रोमांचित होकर सरगोशियां करती रहीं मौन मुखर होकर सिर्फ आंखों के रास्ते से एक दूसरे के दिलों को अपना हाल बता रहा था बारिश में भीगते अरमान मुहब्बत के नग्मे गुनगुना रहे थे मानसून अपने शबाब पर था और हमारा प्रेम अपने चरम की प्रकाष्ठा पर। तुमने मेरे आरक्त चेहरे को उठाकर मेरे सुर्ख और तपते हुए अधरों को अपनी चाहत भरी पवित्र नजरों से निहारा फिर हौले से कहा "अभी नहीं , अभी पाप है ये" कहते हुए अपनी नजरों को झुका लिया और अपनी बाहों के बंधन से मुझे मुक्त कर दिया मुक्त होते ही मैं पानी से बाहर निकाली गई मछली की तरह छटपटाने लगी तब तुमने मुझे संभाला, "अनु , पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद अच्छी जॉब मिलते ही तुम्हारे घर तुम्हारा हाथ माँगने आऊँगा।

पढाई पूरी होते ही तुम्हारे पापा का ट्रांसफर हो गया और तुम जल्दी ही मिलने का वादा करके चले गए...वक्त निकलता गया ना तुम्हारी कोई चिट्ठी ना फोन ना कोई पता हर आहट पर लगता जैसे तुम आए हो दौड़कर दरवाजे पर जाती और किसी और को देखकर निराश हो जाती डाकिए का बेसब्री से इंतज़ार करती लेकिन तुम्हारा खत ना देखकर रो पड़ती बहुत गुस्सा आता तुम पर ...दो साल बीत गए और तुम मेरी नजर में बेबफा बन गये। पापा मम्मी शादी के लिऐ जोर देने लगे। कब तक मना करती तुम्हारा इंतजार करते करते आंखें पथरा गयीं। हमारे प्रेम का गवाह था तो सिर्फ वह मानसून था जिसमें हमारी मुहब्बत परवान चढ़ी थी। आखिर शादी के लिए हाँ कर दी। पति के रूप में वेदांत मिले बेहद प्यार करने वाले... धीरे धीरे घर गृहस्थी और बच्चों में रम गयी लेकिन तुम्हारी बेबफाई को नहीं भुला पाई और उसे कहानी के रूप में ढाल दिया और शीर्षक दिया "मैं तुम और मानसून" हमेशा की तरह कहानी किसी पत्रिका में भेजने से पूर्व वेदांत को कहानी पढ़ाई कहानी पढ़ते ही वेदांत उदास स्वर में बोले , "अनु तुम्हारी हर कहानी को मैं अच्छे से पढ़ता हूं और वह बहुत अच्छी होती हैं लेकिन इस कहानी में कहानी नायक को तुमने बेवजह बेवफा क्यों कहा है? हो सकता है उसकी कोई मजबूरी हो और फिर तुमने ये शेर तो सुना ही है कुछ तो मजबूरियां रही होंगी बेवजह कोई बेवफा नहीं होता"

"तुम ऐसा किस आधार पर कह रहे हो वेदांत?"

"अनु, मेरी बैंक की पहली पोस्टिंग चंडीगढ़ में थी एक सहकर्मी था देवेन उसके पापा की जब आगरा में पोस्टिग थी तब पड़ोस में रहने वाली एक हम उम्र लड़की से उसे प्यार हो गया था। उसके पापा का ट्रांसफर हो जाने के बाद वह लोग कानपुर आ गये और जल्दी ही उसकी नौकरी बैंक में लग गई लेकिन वह बेचारा बदनसीब था उस लड़की से चाह कर भी शादी नहीं कर सका क्योंकि उसे ब्लड कैंसर था।"

"क्या ? ये क्या कह रहे हो हो वेदांत ?" इसके बाद मुझे होश नहीं रहा जब होश आया तो मैं मन ही मन ताजमहल में उस मानसून वाले लम्हे की याद करके बड़बड़ाने लगी... देवेन, अगर वह तुम्हारी नजर में पाप था तो काश! वह पाप हो जाने दिया होता... उम्र के इस पड़ाव पर आकर वह पाप अब तक पुण्य में तब्दील हो गया होता...

- डॉ. अनिता राठौर मंजरी (आगरा)

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