विश्वास की सजा:निहारिका उसके प्यार को यूं ठुकरा देगी ये अंतिम ने कभी सोचा नहीं था, अब वह उससे जवाब चाहता है

5 महीने पहले
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‘प्यार कभी भी, कहीं भी, किसी के भी साथ, कितनी भी बार हो सकता है, यह समझना जरूरी है। मुझे भी समझ आ गया और तुम भी जितनी जल्दी समझ लो, अच्छा है। मुझे पता है, बहुत तकलीफ होगी, लेकिन सोचो, मैंने भी कितनी तकलीफ से गुजरकर यह सब लिखा है। तुम्हारे सारे पैसे ब्याज सहित लौटा रही हूं। तुम्हारे प्यार का कर्ज लेकिन हमेशा रहेगा। कभी चुका नहीं पाऊंगी। हो सके तो मुझे माफ कर देना। ये नहीं कहूंगी कि भूलने की कोशिश करना या मुझसे बेहतर कोई मिल जाएगी। बस, हो सके तो मुझे माफ कर देना। हैप्पी बर्थडे वन्स अगेन अंतिम। खूब जियो और खुश रहो यही दुआ है।’

- निहारिका

अंतिम न जाने कितनी बार वह लेटर पढ़ चुका था। अब तो उसकी स्याही भी आंसुओं में धुल चुकी थी। कागज से शब्द मिट गए थे, लेकिन उसके मन पर जैसे किसी ने गर्म लोहे दाग दिए थे।

आज उसका जन्मदिन था और 120 की स्पीड में ड्राइव करके वह हॉस्पिटल से घर आया, जब उसे पता चला कि रशिया से ग्रीटिंग कार्ड और बुके आया है। रात 12 बजे से वह निहारिका की कॉल का इंतजार कर रहा था। बीस सालों में यह पहली बार था, जब सबसे पहली बर्थडे विश निहारिका की न हो।

निहारिका, उसकी बचपन की दोस्त, साथी, हमराज, पहला और आखिरी प्यार। बचपन से हर काम दोनों ने साथ किया था। एक स्कूल, एक कोचिंग में पढ़ाई, स्पोर्ट्स, हॉबीज सब एक जैसे। दोनों पड़ोसी थे, लेकिन जहां निहारिका एक सरकारी स्कूल मास्टर की बेटी थी, वहीं अंतिम खानदानी बिजनेस टाइकून परिवार का इकलौता बेटा। लेकिन दोनों परिवारों में बहुत गहरी दोस्ती थी।

दोनों डॉक्टर बनना चाहते थे और इसके लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे। कुछ मेहनत और कुछ भाग्य की करनी यह हुई कि अंतिम का सिलेक्शन एमबीबीएस के लिए हो गया, निहारिका रह गई। दोनों ने साथ ही परीक्षा दी थी। साढ़े पांच साल अलग रहने का वे सोच भी नहीं सकते थे।

"मोहल्ले के लड़कों का प्यार डॉक्टर, इंजीनियर ले जाते हैं, कोई लड़का यह डायलॉग मारे तो हिट हो जाता है। यह नहीं सोचते, मोहल्ले की लड़कियों का प्यार भी डॉक्टर-इंजीनियर ले जा सकती हैं।" निहारिका पूरी दुखियारी मीना कुमारी बनी हुई थी।

"दुनिया के किस डॉक्टर, इंजीनियर में इतना दम है कि तुम्हारे पंजों से शिकार छीन ले?"

अंतिम की बात पर निहारिका और तप गई।

"अच्छा, अभी गए नहीं हो मेडिकल कॉलेज और तुम बेचारे शिकार हो गए, और मैं शिकारी। सोचो, कैम्पस में कदम रखते ही कातिल हसीनाएं दिखेंगी, स्मार्ट, इंटेलीजेंट, खूबसूरत। उनके सामने एक गरीब स्कूल टीचर की क्या बिसात कि…" निहारिका की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अंतिम ने उसे टोक दिया।

"एक मिनट रुको। अच्छी-खासी मूवी चल रही है, यह स्कूल टीचर का नया कैरेक्टर कौन है लव ट्राइंगल में?"

"वाह, ट्राइंगल भी बन गया। गुड! मैं हूं वह गरीब टीचर। अब एमबीबीएस में नहीं हुआ तो नर्सिंग या फिजियोथेरेपी में तो जाऊंगी नहीं कि तुम सिस्टर, सिस्टर करो या मालिश वाली बाई कहकर चिढ़ाओ। न फार्मेसी ही करना है मुझे। बचा टीचिंग ही न।" मजाक करते-करते भी निहारिका की आवाज भर्रा गई।

"बस इतना ही जानती हो अपने अंतिम को? इतना ही भरोसा है? मैंने सारा अरेंजमेंट कर लिया है, तुम्हें रशिया भेजने का। वहीं से डिग्री लोगी तुम। फिर हम अपना नर्सिंग होम खोलेंगे।" अंतिम की बात पर निहारिका की बड़ी-बड़ी आंखें और फैल गईं।

"लेकिन इतने पैसे, नहीं अंतिम, मैं किसी का एहसान नहीं ले सकती, फिर वह चाहे तुम ही क्यों न हो। पापा भी नहीं मानेंगे और अगर…

"अगर न मगर। मेरे पापा ने तुम्हारे पापा से बात कर ली है। लोन समझकर ले लो, डॉक्टर बनकर चुका देना।"

इस तरह निहारिका रूस रवाना हो गई। चूंकि दोनों दिन-रात एक दूसरे के कॉन्टेक्ट में रहते, तो दूरी ज्यादा मायने नहीं रखती थी। लेकिन जैसे-जैसे कोर्स बढ़ा, व्यस्तताएं बढ़ीं, कॉल्स कम होते गए। फिर भी जब भी कोई भी फ्री होता, दूसरे को मैसेज कर ही लेता। ऐसे ही वक्त गुजरता जा रहा था। दोनों की डिग्री बस कम्प्लीट होने ही वाली थी। 'अब है जुदाई का मौसम, दो पल का मेहमान।’ अक्सर वह उसे गाने रिकॉर्ड करके भेजा करता था।

लेकिन अंतिम के वहमो-गुमान में भी नहीं था कि निहारिका के दिल पर कभी उसके अलावा किसी और का राज भी हो सकता है।

आज उसका जन्मदिन था और आज ही उसे अपनी जिंदगी के सबसे बड़े सदमे से दो-चार होना पड़ा। निहारिका ने उसे लेटर लिखा, क्योंकि वह सामने से यह सब बता नहीं सकती थी।

मैक्स, अमेरिका में सर्जन है। किसी ट्रिप पर रशिया आया था, वहीं हॉस्पिटल में निहारिका से मिला और एक हफ्ते की मुलाकात में ही दोनों इतने करीब आ गए कि निहारिका बचपन के प्यार को बिसरा बैठी। दोनों लंबे समय से कॉन्टेक्ट में थे और अब निहारिका ने उससे शादी करके अमेरिका में ही बस जाने का फैसला कर लिया था। साथ ही लिखा था कि वह पूरे खर्च की पाई-पाई चुका देगी। यह दूसरा झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा था उस पर।

नफरत, दुख, निराशा, वेदना, पीड़ा के इतने सारे भाव एक साथ आ-जा रहे थे कि उसका शरीर और दिमाग सुन्न हो गया। घर पर सब एक-दूसरे से नजरें चुराए घूम रहे थे। निहारिका के पापा भी शर्मिंदा से थे। दोनों परिवार जानते थे कि ये दो जिस्म एक जान हैं। लेकिन उनमें से एक सिर्फ जिस्म रह गया था, जान नहीं रही थी, किसी जिंदा लाश की तरह।

उसका मन अभी भी यह मानने को तैयार नहीं था कि निहारिका ऐसा कुछ कर सकती है। थोड़ा होश बहाल होने पर उसने निहारिका का सोशल मीडिया अकाउंट चेक किया, जहां मैक्स के साथ उसकी हंसती-खिलखिलाती कई तस्वीरें मौजूद थीं। अब अंतिम खुद को ही दिलासा दे रहा था। निहारिका ने सही तो कहा है, प्यार कभी भी, कहीं भी, किसी से भी, 'कितनी भी' बार हो सकता है, यह समझना जरूरी है। उसकी मदद करके उसने उसे खरीद तो नहीं लिया। वह आजाद है अपने फैसले लेने के लिए, हक है उसे खुश रहने का।

लेकिन उसका क्या? उसके दिल का क्या, जो अभी भी एक ही नाम पर धड़कता है और उसके बिन मुर्दा हो चुका है। वह जिसे रोने-धोने वाले सीरियल्स से हद नफरत थी, आजकल लूप में सुनता था, ‘मेरा ये भरम था, मेरे पास तुम हो।’

जाने वाले जब आगे बढ़ जाएं, तो उन्हें चाहिए कि जो पीछे छूट गए हैं, उनको अपने बिन जीना सिखाकर जाएं। बिन सर्वाइवल टिप्स उनका क्या बनेगा? इसकी फिक्र कौन करेगा?

पता नहीं समय सबसे बड़ा मरहम होता भी है या नहीं। या समय के साथ-साथ हम अपनी खोल में कैद होते जाते हैं। भावनाओं को उस तीव्रता से व्यक्त नहीं करते। कुछ जख्म बस अंदर-अंदर रिसते रहते हैं नासूर की तरह। तीन महीने हो चुके थे लेकिन अंतिम अपने कमरे से बाहर ही नहीं आया था। इंटर्नशिप, डिग्री सब छोड़ो, अब तो खाने-पीने की भी सुध नहीं थी। फिर उसे बुखार ने आ घेरा। इतना तेज कि लगभग बेहोशी की हालत में पहुंच चुका था। दवाइयां भी असर नहीं कर रही थीं।

हॉस्पिटल में बेड पर मां उसका हाथ थामे उसके पिता से कह रही थीं, "सुनिए, अगर मेरे बच्चे को कुछ हुआ तो मैं कभी आपको माफ नहीं करूंगी। अपनी इकलौती औलाद पर बिल्कुल रहम नहीं आता आपको। इसको कुछ हो गया तो आग लगा दूंगी आपके सारे बिजनेस और मंसूबों पर, और खुद भी भस्म हो जाऊंगी।"

"बस करो सरिता। मैं कोई जल्लाद नहीं हूं। बस उस समय जो ठीक लगा, वही किया। मुझे नहीं पता था, यह सब ऐसे हो जाएगा। और निहारिका भी तो तैयार थी।" पिता की कमजोर सी आवाज उभरी।

निहारिका का नाम सुनते ही अंतिम ने आंखें खोल दीं।

"मां, प्लीज बताइए, क्या हुआ है। आपक मेरी कसम…” बमुश्किल वह कुछ बोल पाया।

"बेटा, दरअसल निहारिका भी बाकी स्टूडेंट्स के साथ वार-जोन में फंस गई थी। ये लोग रास्ते में थे, जब रशिया-यूक्रेन वार शुरू हुआ। काफी समय बर्फ में रहने से उसके हाथ में फ्रॉस्ट बाइट हो गया, हाथ गल चुका था, बचाया नहीं जा सका। हालांकि कोशिश पूरी की थी। आर्टिफिशियल हाथ लग जाएगा, बस एक बार सर्जरी से रिकवर हो जाए। वह इसीलिए अमेरिका में है। डॉ मैक्स उसके पति नहीं, सर्जन हैं जो उसका केस देख रहे हैं। इस सबका खर्च भी तुम्हारे पापा ही उठा रहे हैं। लेकिन उन्होंने निहारिका को तुमसे दूर रहने को कहा, वे नहीं चाहते थे कि एक अपाहिज लड़की..." मां बोलते-बोलते रुक गईं।

"अगर आपका बेटा अपाहिज हो जाता पापा, तब भी यही सोचते? अगर इस दिमागी बुखार के कारण मेरा शरीर काम करना बंद कर दे तो आप मुझे भी यहीं छोड़ जाएंगे क्या? जैसे मेरी आत्मा को छोड़ आए मेरे शरीर से निकालकर।"

"बस बेटा, तुम जल्दी ठीक हो जाओ, और कुछ नहीं चाहिए। मुझे अपनी गलती का एहसास है। सुधार भी मैं ही करूंगा।"

अंतिम ने कैलेंडर पर नजर डाली, 15 दिन बाद निहारिका का बर्थडे था। अब उसे जल्दी से जल्दी इस हॉस्पिटल से निकलना था और अमेरिका की फ्लाइट बुक करना थी, कोई कार्ड, बुके या गिफ्ट नहीं, खुद सामने से बर्थडे विश करना था।

- नाज़िया ख़ान

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