डिजिटल धारावाहिक:अब पति का सच नव्या के सामने था, रितेश उसकी और हिमा दोनों की जिंदगी के साथ खेल रहा था

6 महीने पहले
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रेखाचित्र - मन मोहन - Dainik Bhaskar
रेखाचित्र - मन मोहन

पति पर पूरा भरोसा था नव्या को, लेकिन हिमा के फोन ने उसके मन में संशय के बीज बो दिए। क्या हिमेश रितेश को बिना बताए हिमा से मिलने जाएगी? आगे क्या होता है, ये इस किस्त में पढ़िए...

‘‘मैं नव्या हूं। तुमने ही फोन किया था न रितेश को?’’ नव्या, हिमा के सामने बैठी थी। उसका स्टूडियो अपार्टमेंट बहुत ही करीने से सजा हुआ था। फर्नीचर के नाम के नाम पर एक कम ऊंचाई वाली चौकोर लकड़ी की मेज थी। मेज पर लूडो रखा था। नव्या के होंठों पर मुस्कान खेल गई। वैसा ही था हूबहू… संगमरमर का लूडो… मेज पर। जो जगह बची थी, उस पर उसका फोन रखा था। एक तरफ फर्श पर दोनों तरफ गद्दे बिछे थे। खिड़की वाली तरफ दीवार से कुशन सटे थे, ताकि बैठने के बाद पीठ टिकाई जा सके। खिड़की के पारदर्शी कांचों के परे जो एक स्लैब सी निकली हुई थी, उस पर दो गमलों में मनीप्लांट लहरा था, बड़े-बड़े पत्तों वाला। कमरे की दीवार पर एक पेंटिंग लगी हुई थी, …एब्सट्रैक्ट थी। झूमर बहुत ही सुंदर थे और किचन भी एकदम सारी सुविधाओं से लैस। सामान कम हो तो भी घर सुरुचिपूर्ण लग सकता है…, उसने सोचा।

हिमा ने उसके सवाल पर अपनी आंखें उसके चेहरे पर टिका दीं। बोली कुछ नहीं, बस हां में सिर हिलाया। जब आश्चर्य और ढेर सारे सवाल मन में उमड़-घुमड़ रहे हों तो शब्द चुक से जाते हैं जैसे। नव्या फिर से उसे गौर से देखने लगी। उफ…! आज न जाने क्यों जज करने का मन हो रहा था, मानो जो लड़की सामने बैठी है, उसकी चीड़-फाड़ करना चाहती हो। शरीर का आकार, लंबाई और अंगों का सौष्ठव देख पता लग रहा था कि रोज जिम जाती है। ढीली टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहनी हुई थी। गोरी टांगों की चिकनाई फर्श की टाइलों की तरह चमक रही थी। छोटे बाल, लकीर की तरह भौंहें और पतले होंठ… नीचे चिबुक के पास एक छोटा-सा तिल था। सामान्य जैसी लड़की होती है, वैसी ही थी। कुछ खास था तो हल्का सा यूं ही मुस्करा पड़ना और तब गालों पर पड़ने वाले गड्डे। नव्या से अगर उसकी तुलना की जाए तो उसका व्यक्तित्व गौण ही प्रतीत होगा।

‘‘रितेश जब भी आता है, हम लूडो खेलते हैं। उसे बेहद पसंद है लूडो खेलना। वही इसे लाया था।’’ नव्या को लूडो की तरफ हैरत से मुस्कुराते वह देख चुकी थी। पर हैरानी की वजह, उसके यहां आने की वजह की तरह ही उलझी हुई थी।

सवाल तो उसके पास भी थे अनगिनत…, एक अजनबी महिला उसके घर आती है, और उसी से निरंतर सवाल कर रही है। रितेश को दुबारा फोन मिलाने के ख्याल से उसने फोन उठाया तो फोन बज उठा। ‘‘मैंने डायल किया है तुम्हारा नंबर।’’

‘‘इस नंबर से तो अक्सर रितेश की फोन पर कॉल आती है। लगातार कई बार, …तभी मैंने नाम पढ़ा था, किसी नवजोत का नाम फ्लैश करता है।…’’ शब्द अटक-अटक कर निकल रहे थे। ‘‘उसने बताया कि कोई पुराना दोस्त है, डिप्रेस्ड रहता है, मां-बाप नहीं हैं, अकेला रहता है, पर है फ्लर्ट किस्म का इसलिए मुझसे मिलवाने का रिस्क नहीं ले सकता है। रितेश को बिना बताए ऐसे ही मैंने भी यह नंबर अपने फोन में सेव कर लिया था कि कभी जरूरत ही पड़ जाए, …पर आप? नंबर आपने मिलाया है न?’’ कौतूहल के न जाने कितने गवाक्ष उसके छोटे से कमरे में खुलते दिखाई दिए…, पर रोशनी किसी से भीतर नहीं आ पा रही थी।

‘‘रितेश का फोन साथ लाई हूं। तुम चाहो तो उसका नंबर मिलाकर देख सकती हो।’’ उसने रितेश का फोन निकालकर उसके आगे रख दिया।

फोन पर फ्लैश होते नाम को देख हिमा ने कुशन उठाकर गोदी में रख लिया और अपनी कोहनियां उस पर टिका दीं। संभलने के लिए किसी का सहारा ढूंढ रही हो जैसे।

‘‘मैं नवजोत हूं, यानी तुम्हारे लिए उसका दोस्त और तुम हिमेश हो, मेरे लिए उसका पुराना दोस्त, …इंटरेस्टिंग!…’’ नव्या को लगा बादल के टुकड़े को अचानक हवा उड़ाकर ले गई है। जो बादल कुछ बूंदें भी धरती को न दे सके… उनका क्या अस्तित्व…।

कुछ कहने-सुनने को शेष नहीं रहा था। आंखों ही आंखों में दोनों ने एक-दूसरे को देखा। नव्या जाते-जाते वापस मुड़ी। हिमा लूडो की गोटियों को ठीक से लगा रही थी।

- सुमन बाजपेयी

अब पति का सच नव्या के सामने था, रितेश उसकी और हिमा दोनों की जिंदगी के साथ खेल रहा था। नव्या का अगला कदम क्या होगा? हिमा से कैसे नजरें मिला सकेगा रितेश? आगे क्या हुआ, ये कल पढ़िए...