E-इश्क:एक बार शाहरुख की तरह बाहें फैला देते, तो मैं सिमरन की तरह उसमें समा जाती

नई दिल्ली23 दिन पहलेलेखक: निशा सिन्हा
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तुम्हें शायद पता नहीं, तुम आज भी मेरे सपनों में आते हो। जब नींद टूटती है, तो साथ छूटने का अहसास होता है और मैं बेचैन हो जाती हूं। सपनों में भी तुम बस एकटक देखते हो कभी हाथ नहीं लगाते। तुम तो हकीकत में भी ऐसे ही थे मनोज।

पचीस साल हम साथ-साथ रहे, पता ही नहीं चला कि कब हम पर से बचपन की नादानियाें का रंग उड़ गया और शोख जवानी गले लग गई। कब हम नर्सरी से कॉलेज में आ गए।कितनी बार तुम अपने बगीचे से गुलाब लाते और मेरी ‘एवन’ साइकिल की बास्केट में रख देते, मैं तरसती रहती कि न जाने वह दिन कब आएगा जब तुम मेरी हथेलियों पर मेरे हाथों से गुलाब रखोगे।

‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ देखने के बाद एक ही ख्वाहिश थी कि एक बार तुम भी शाहरुख की तरह बाहें फैलाओ और मैं सिमरन बन उसमें समा जाऊं।

अफसोस… ! ऐसा हुआ ही नहीं। तुम्हें स्कूल और कॉलेज के मेरे सभी आशिकों के नाम पता थे, उसमें से कुछ तुम्हारे दोस्त भी थे और कुछ तुम्हारे जानी दुश्मन फिर भी तुम कभी इंस्क्योर नहीं हुए, जबकि मैं साइंस प्रैक्टिकल रूम में तुम्हारे आसपास मंडराती लड़कियों को देखकर कभी बेचैन हो जाती तो कभी जल भुन कर राख, हम केवल दोस्त नहीं थे, इस बात का अहसास तुम्हें मुझसे ज्यादा था और इसकी खबर भी थी मुझे।

मैं तुमसे दूर पढ़ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी क्या आ गई, और देखो, मेरे शहर छोड़ते ही तुमने इंगेजमेंट कर डाली, बचपन के प्यार को दो सालों में भूला दिया, क्यों? मैंने भी तुम्हारी सगाई की खबर मिलने के दिन से ही तुम्हें दिल से निकालने का फैसला किया। ठीक उसी शाम यूनिवर्सिटी के विश्वनाथ मंदिर के सामने मैंने आनंद के प्रपोजल को एक्सेप्ट कर लिया। उसे भी समझ में नहीं आया कि पिछले दो सालों से प्यार के जिस प्रस्ताव को मैं टाल रही थी, उसके लिए अचानक क्यों तैयार हो गई।

आनंद बीएचयू आईटी में फाइनल ईयर इंजीनियरिंग का स्टूडेंट था। पहली बार यूनिवर्सिटी के यूथ फेस्टिवल में उसने मेरी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। उस दिन के बाद हर रोज कहीं न कहीं दिख जाता। कभी मेरे डिपार्टमेंट के बाहर, कभी मेरे बैच के लड़कों के साथ बातें करता हुआ, कभी गर्ल्स हॉस्टल के आसपास। तुमसे बिल्कुल अलग, तुम सांवले वो गोरा, तुम मामूली घर के वो अमीर, तुम एमएससी जूलोजी के स्टूडेंट और वह इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर में, तुम दूसरी जाति के और वह ठेठ मेरी बिरादरी का। शादी में कोई झोल हो सकता था भला।

एक बात और आनंद को तुमसे अलग बनाती थी, वह था उसका फूल लाकर सीधे मेरे हाथ में थमाना, बातों-बातों में मेरा हाथ थामना। मैं ही थी, जिसने तुम्हारे इजहारे मोहब्बत के इंतजार में कभी आनंद के हाथों की गरमी महसूस नहीं की।

अब तुमने सगाई कर ही ली है, तो मैंने भी आनंद को ‘हां’ कह दिया है। 31 दिसंबर की रात चाय की गुमटी पर कॉफी पीते हुए मैंने आनंद की जिद के आगे तुमसे बदला लेने के लिए हथियार डाल दिए। उस पल हम दोनों के आंखों में आंसू थे। उसकी आंखों में खुशी के और मेरी आंखों में गम के। कभी खुशी कभी गम का मतलब मुझे उस रात पहली बार समझ आया। पिछले 2 सालों से आनंद मेरी ‘हां’ सुनने का इंतजार कर रहा था और पिछले 24 सालों से मैं तुम्हारी ‘हां’ सुनने के लिए बेचैन रही। किसी के दामन में खुशियां आई और किसी का दामन छन्नी हो गया। रात आंखों में गुजरी और पहली जनवरी की सुबह मेरे मन के लिए बहुत सुस्त थी और आज ही बिहार जा रही हूं।

घर से शादी करने, उसी मुहल्ले में शादी करने जहां मेरे बचपन का प्यार जवान हुआ वहीं से मुझे उसकी अर्थी जो उठानी है। इससे भी ज्यादा जरूरी है, तुम्हें तड़पाना। मेरे-तुम्हारे घर के बीच में केवल सात घरों का ही तो फासला है। मैं चाहती हूं मेरी शादी की शहनाई तुम्हारे कानों को बहरा कर दे। तुम जरूर मिलने आओगे, यह तो मैं जानती हूं।

बैंड बाजे की आवाज मेरे कानों तक आने लगी है। बारात बस पहुंचने वाली है। तभी मुझे वो आवाज सुनने को मिली जिसका मुझे सालों से इंतजार था।

“दुल्हा तो नंबर वन मिला है तुम्हें रागिनी।” मेरे सामने खड़े होकर तुमने कहा। मन किया तुमसे लिपट जाउं, तुम्हें अपने दिल में उठते तूफान का नजारा दिखाउं। मैं खुद को संभालते हुए उसकी ओर तंज का तीर फेंका, हां “लाखों में एक है। अपने बैच का टाॅपर है, सुंदर है, पैसेवाला है सबसे बड़ी बात है तुम्हारे जैसा बिहारी नहीं लगता।”

मनोज जैसे यही सुनना चाहता था, उसने तुरंत कहा, “तुम भी तो लाखों में एक हो । बचपन से ही देखने, सुनने-पढ़ने सबमें बेस्ट। गांव के सबसे रईस की इकलौती बेटी। परफेक्ट मैच है तुम्हारा उसके साथ। मुझे हमेशा से पता था, ‘तुम बेस्ट को ही चुनोगी क्योंकि उस पर तुम्हारा हक था और मेरा लेवल तो गुड का भी नहीं।’ मनोज ने मुझे ध्यान से देखते हुए कहा, “तुम्हारी बारात दरवाजे पर आ गई है और मुझसे फाइनल विदाई का वक्त भी आ गया है।”

उसके इस हमले से मैं तड़प पड़ी। मनोज की बात सुनते ही उसकी मोहब्बत का रंग निचुड़कर मेरी आंखों से बह निकला। एक बार कहा तो होता मेरेे शाहरुख खान, मैं तुम्हारी बाहों में हमेशा के लिए सिमरन बन समा जाती और ये दुल्हिनयां किसी और की नहीं होती।