दीपा के साथ तुम्हारे संबंध, सुगम चौंका:सिर्फ धोखा, भ्रमित करने का, तुमसे छुटकारा पाने का कोई तरीका नहीं मेरे पास

12 दिन पहले
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मन में चल रहा विचारों का तूफान उसे विचलित कर रहा था। एक तरफ मन सुषमा के अंदर आए बदलाव को स्वीकारने को तैयार नहीं था, लेकिन दूसरी ओर पिछले कुछ महीनों से जो घट रहा था, उसे भी तो झुठलाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था। वे घटनाएं तो जैसे उसे बार-बार सच का आईना दिखा रही हैं, बार-बार उससे कह रही हैं कि वह यकीन कर ले कि सुषमा कुछ बदल गई है। सुषमा को वह इतना चाहता है कि उसको लेकर कोई गलत बात अगर मन में आती भी है, तो वह स्वयं को ही बुरा मानने लगता है।

रात में लैंप जलाकर उसने टाइम देखा, दो बज गए, पर नींद थी कि जैसे उससे कोसों दूर ही रहना चाहती। बेड पर लेटी सुषमा गहरी नींद में थी, चेहरे पर बिखरी लटें, उसकी सुंदरता को और बढ़ा रही थीं। पारदर्शी गुलाबी नाइटी में लिपटा उसका शरीर किसी तराशी हुई संगमरमर की मूर्ति से कम नहीं लग रहा था। उसका सान्निध्य कितना सुख देता है और सुषमा भी तो…हमेशा उसकी बांहों में आने, उससे लिपटने को आतुर रहती थी। फिर आखिर सुषमा कैसे बदल सकती है? उसने अपनी सोच को विराम देने के लिए हल्के से सुषमा के गालों को चूमा।

वह थोड़ी-सी हिली, पर फिर सो गई। उनके आपसी संबंधों में हमेशा से ही ऊष्मा रही है। उसका कोमल जिस्म पूरे समर्पण के साथ जब उसकी बांहों में होता, तो उसे महसूस होता कि वह दुनिया का सबसे खुश नसीब पति है। विवाह के सात वर्षों के बाद भी उनके बीच नजदीकियां और साथ पाने की ललक थी।

हालांकि कुछ महीनों से सुषमा की गर्म सांसों में वह उत्तेजना नहीं रही, जो कभी उसे तुरंत पिघला दिया करती, लेकिन इसे काम का टेंशन मान सुगम ने नजरअंदाज कर दिया। विज्ञापन की दुनिया आसान भी नहीं होती और जब से सुषमा का प्रमोशन हुआ, तब से बहुत सारी जिम्मेदारियां उस पर आ गईं। वह कहां फ्री रह पाता। उनके बीच शुरू से ही इतनी अच्छी अंडरस्टैंडिंग रही कि तनाव की स्थिति कभी उत्पन्न होने की नौबत नहीं आई।

आज कल जब भी वह उसके करीब आना चाहता है, तो वह थकी हुई है कहकर मुंह फेरकर सो जाती है। पहले तो उसे कभी संदेह नहीं हुआ कि वह ऐसा जानबूझकर कहती है, लेकिन अब उसके अंदर शक के कीड़े कुलबुलाने लगे। सुषमा की दैहिक भूख तो हमेशा ही तीव्र रही है,फिर उसके अंदर इतना ठंडापन कैसे आ गया है? कहीं वास्तव में सुषमा बदलने तो नहीं लगी है? सुगम यह सोचकर स्वयं को ही धिक्कारने लगा।

सुषमा को उसने फिर चूमा तो वह कसमसाई। सुगम पूरी तरह से उस पर हावी हो गया और नींद में ही सुषमा ने उसे बांहों में जकड़ लिया। कोई ठंडापन नहीं था, फिर इतने दिनों से वह क्यों जता रही थी कि उसे संबंध बनाना अच्छा नहीं लगता।

आवेग के कम होते ही जैसे सुगम सोने लगा, तब तक सुषमा जाग चुकी थी। वह एकदम चिल्लाई, यह क्या बदतमीजी है। मेरी नींद खराब कर दी। कल से मैं दूसरे कमरे में सोऊंगी।’’पर सुषमा तुम्हारी मर्जी देखकर ही मैंने…’’सोते समय कहां ध्यान रहता है कि कौन है, किसकी बांहों में हूं,’’ अचानक बोलते-बोलते वह चुप हो गई और तकिया उठा दूसरे कमरे में चली गई।

सुषमा की उस बात का आखिर क्या मतलब हो सकता है। सुगम ने सोचा, उसे और कोई समझकर प्यार किया… किस के आगोश में होने की कल्पना में वह खोई हुई थी! सुषमा के किस रूप को वह सच माने। चाहे उसने कुछ भी समझकर उससे संबंध बनाए हों,पर उसके समर्पण को देखकर यह कतई नहीं लगता कि उसे पुरुष का सान्निध्य अच्छा नहीं लगता। कहीं कोई और पुरुष तो उसके जीवन में नहीं आ गया है। सुगम की आंखों के सामने वह दृश्य घूम गया जब सुषमा अपनी सहेली दीपा के साथ लिपटी हुई थी। वे दोनों एक-दूसरे को बेतहाशा चूम रही थीं। उसे एक बात समझ नहीं आई थी कि उन दोनों ने कमरे का दरवाजा खुला क्यों छोड़ा था। इन दिनों सुषमा दीपा से धीमे स्वर में फोन पर बात करती नजर आती। कई बार वह उसके घर पर भी रात गुजारने लगी थी। फ्रेंड होने की वजह से साथ वक्त बिताना कोई अचरज की बात तो नहीं थी, पर इस तरह…दीपा के अपने पति रजत के साथ संबंध मधुर थे। एक बेटा भी था। ऐसी सूरत में दोनों का इस तरह…सुगम को लगा कि वह बुरी तरह से उलझता ही जा रहा है।

उसने रजत से जब इस बारे में बात की तो वह हैरान हो गया। उसे पल दो पल का आवेग मान सुगम को इस बारे में चुप ही रहने को कहा। वैसे भी, यह जो प्रगतिवादी और स्वच्छंद नारी है न, वह तरह तरह के प्रयोग करना चाहती है। हो सकता है, इस तरह की समलैंगिकता भी एक तरह का प्रयोग ही हो। हर तरह का स्वाद चखना और फिर ये आजकल की फिल्में-इस तरह के विषयों को कुछ ज्यादा ही उछालने लगी हैं। ऐसा कुछ होता तो दीपा में भी परिवर्तन तो मुझे दिखता ही। जस्ट फॉरगेट इट, यह आधुनिक समाज में फिट होने का ही कोई शिगूफा हो सकता है।’’सुषमा, रात को एक गेट टू गेदर रखा है। विदेश से एक डेलीगेट आया है। हालांकि है तो वह भारतीय ही, लेकिन कुछ सालों से विदेश का ही होकर रह गया था। अब वापस यहीं लौटना चाहता है। कुछ ट्रेडिशनल इंडियन फूड का अरेंजमेंट कर लेना।’’ सुगम की बात सुन सुषमा के अंदर अनगिनत कलियां चटक उठीं। आने वाले मेहमान के बारे में सोच कर ही उसके गाल आरक्त हो उठे। सुगम को क्या पता कि वह और दिवाकर बरसों से एक-दूसरे को जानते हैं। कॉलेज में उनका प्यार परवान चढ़ा था। उसके विदेश जाने से जिंदगी में उथल-पुथल हो गई थी। सुगम को पता नहीं था कि वह चार महीने पहले भी इंडिया आया और उस दौरान उनके प्यार के रंग फिर से खिल उठे। सुषमा को दिवाकर के साथ सब कुछ अच्छा लगता था। बात अच्छी नहीं लगी तो झिड़की, अच्छी लगी तो चुंबन। रास्ते चलते गोलगप्पे खाने में कोई झिझक नहीं, वरना सुगम तो इन सब बातों को फूहड़ता की निशानी मानता है।उसकी मानें तो सब कुछ व्यवस्था के अनुसार होना चाहिए।ऊब गई है सुषमा उसकी परफेक्शन से। अब की बार दिवाकर इंडिया में सेटल होने के लिए ही लौटा है। उसका साथ पाने को वह बेताब थी। पार्टी में दोनों इस तरह मिले कि मानो एक-दूसरे को जानते तक नहीं हैं। दीपा और रजत भी थे।

दीपा और सुषमा बहुत सहज अंदाज से एक-दूसरे को देखतीं और मुस्कुरा उठतीं। कभी एक-दूसरे को बाहों में भर लेतीं।सुगम चाहे लाख सहज बने रहने की कोशिश करे, लेकिन अब तो सुषमा और दीपा खुल्लम-खुल्ला अमर्यादित आचरण करने लगी थीं। सुगम के लिए सब कुछ असहनीय हो उठा था। कहां कमी रह गई थी उसके प्यार में जो दूसरी औरत का साथ सुषमा को अच्छा लगने लगा था। हमेशा की तरह इस बार भी कुछ कहने, सुनने की उसे इच्छा नहीं हुई।

आज तक उसने सुषमा की किसी बात का विरोध नहीं किया था, फिर जब बात इतनी आगे बढ़ चुकी है, कुछ कहने का फायदा ही नहीं। सुषमा से सीधे सवाल कर वह अपनी ही नजरों में गिरना नहीं चाहता। तलाक के कागज उसके आगे रख बिना कुछ कहे उसने सुषमा के सामने पेन बढ़ा दिया। उसकी प्रतिक्रिया जानने के लिए वह एकटक उसे ही देख रहा था। नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं नहीं, कोई सवाल नहीं। मुस्कराते हुए उसने साइन कर दिए। थैंक यू सुगम। मैं तो कब से इन कागजों का इंतजार कर रही थी। देर लगी, पर तुम्हारे ऊबाऊ साथ से छुटकारा तो मिला। मैं तंग आ गई थी, इस नीरस जिंदगी से। कुछ भी नहीं था, हमारे बीच-सिवाय अंडरस्टैंडिंग के।

कोई कुछ नहीं बोलेगा, बस समझेगा। थोड़ी बहुत तकरार जिंदगी में रस भरती है। तुम्हारे महान बनने का शौक मुझे पागल कर रहा था। शुक्र है दिवाकर लौट आया। मैं जा रही हूं उसके पास सुषमा ने कहा’’ सुगम को लगा कि इस चक्रव्यूह को समझना उतना ही मुश्किल है, जितना कि उसे बाहर आना। दिवाकर, सुषमा,,सुगम एक बार फिर उलझने लगा, पर दीपा के साथ तुम्हारे संबंध?...सिर्फ धोखा, तुम्हें भ्रमित करने के लिए। तुमसे छुटकारा पाने का और कोई तरीका नहीं मेरे पास। तुम्हारी शिकायत करती, ऐसा मौका कहां दिया तुमने कभी। तुम ठहरे परफैक्शनिस्ट, इसलिए तुम मुझे ही छोड़ दो, ऐसा करने के लिए ही यह खेल-खेला गया था। बाय-बाय सुगम।’’सुषमा के चेहरे पर जीत की खुशी थी। जाती हुई सुषमा को देखता रहा सुगम... अच्छा बनने की क्या इतनी बड़ी सजा मिलती है?

- सुमन बाजपेयी

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