E-इश्क:उसने घबरा कर सुदीप के कमरे का परदा उठा कर अंदर झांका, सुदीप के साथ कोई लड़की थी

11 दिन पहले
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दिव्या घर बसाना चाहती थी- एक आम घरेलू लड़की की तरह। ठीक उसी तरह जैसे उसकी भव्या दीदी का घर बसा था। लेकिन दिव्या के भाग्य में घर से दूर जा कर पढ़ाई करना लिखा था और उसके बाद नौकरी करना। इधर भव्या दीदी का ब्याह हुआ और उधर दिव्या का फैशन डिजाइन के कोर्स में सेलेक्शन हो गया। उसे मुंबई जाना पड़ा। एक नई तरह की पढ़ाई, नई तरह की जिंदगी। दिव्या ने कभी प्रेम, प्यार का हिसाब किताब नहीं जाना था। वह तो सोचा करती थी कि मां-बाबा ने जैसे भव्या दीदी का ब्याह किया, वैसे ही वो लोग दिव्या के लिए भी अच्छा सा दूल्हा ढूंढ कर ले आएंगे और वो हंसी-खुशी अपनी ससुराल चली जाएगी। लेकिन उसकी नियति में विधाता ने कुछ अलग सा ही लिख रखा था।

मुंबई में पढ़ाई के दौरान वो सुदीप से मिली और उसके प्यार, आकर्षण में कुछ इस तरह बंधी कि सब कुछ भूल गई। डिग्री के बाद नौकरी, नौकरी के बाद घर। हां, हॉस्टल छोड़ देने के बाद मुंबई में रहने का एक ठिकाना तो ढूंढना ही था जो आसान नहीं था। आखिरकार दिव्या अपना बोरिया-बिस्तर उठा कर सुदीप के फ्लैट में साधिकार रहने चली आई। नौकरी चलती रही, दिन बीतते रहे। दिव्या समय-समय पर घर जाती रही। बरस दर बरस बीत रहे थे और उन बीतते हुए बरसों के साथ दिव्या की उम्र भी बढ़ती जा रही थी। मां उससे उसके ब्याह की बात करते हुए कई बार रुआंसी हो जातीं। दिव्या हर बार अपने ब्याह का प्रस्ताव आगे के लिए टालती रहती। बाबा अक्सर बीमार रहने लगे थे।

अपना और सुदीप का रिश्ता, पता नहीं क्यों दिव्या मां-बाबा को कभी बता ही नहीं सकी, क्योंकि सुदीप ने उसे कभी शादी का आश्वासन ही नहीं दिया था। वह कहा करता था कि प्यार के रिश्तों को कोई नाम नहीं देना चाहिए। रिश्ते समाज या कानून की मुहरों से नहीं बना करते। रिश्ते तो मन से बनते हैं। लेकिन इस बार दिव्या तय कर चुकी थी कि घर से वापस लौट कर सुदीप से शादी के बारे में पक्का करके ही मानेगी। अचानक ही पहुंच कर सुदीप को चौंका देगी। यही सोच कर दिव्या ने सुदीप को अपने वापस लौटने की कोई सूचना भी नहीं दी थी।

लिफ्ट से दिव्या ऊपर गई और कुछ देर फ्लैट के बाहर रुकी रही। सन्नाटा था। एक चाबी उसके पास रहा करती थी। दरवाजा खोल कर वह अंदर गई। बैठक कुछ अधिक ही अस्तव्यस्त लगी, कुछ अधिक बिखरी। वो जमीन पर गिरे अखबार और कुशन उठाने के लिए झुकी ही थी कि बेडरूम से किसी लड़की की आवाज आई। दिव्या की छठी इन्द्रिय एकदम से जाग्रत हो गई। उसने घबरा कर सुदीप के कमरे का परदा उठा कर अंदर झांका। सुदीप के साथ कोई लड़की थी। दिव्या को देख कर सुदीप का चेहरा फक्क पड़ गया, लेकिन तब भी उसने बड़ी ढीठता के साथ स्वयं को संतुलित किया। अजनबी नेत्रों से दिव्या को देखा। उसकी दृष्टि में एक उकताया हुआ भाव था।

“तुम तो कल…” दिव्या तेजी से मुड़ कर फ्लैट के दरवाजे से बाहर निकल गई। उसकी आंखें आंसुओं से अंधी हो गई थीं। सुदीप के साथ कितने सपने देखे थे उसने। मन से, आंखों से। मन और आंखों का सपना जब टूटता है तो सांसें टूटने लगती हैं। दिव्या की सांसें भी जैसे टूट रही थीं। किसी तरह उसने खुद को संभाल लिया। ये सच था कि पिछले कई हफ्तों से उसे सुदीप के व्यवहार में बदलाव दिखाई दे रहा था। वह दिव्या से उकता रहा था और दिव्या ये बात समझ कर भी समझना नहीं चाहती थी। आज सभी कुछ साफ-साफ दिख गया था।

ऑफिस में छुट्टी बढ़ाने की एप्लीकेशन देकर दिव्या एक बार फिर घर लौट गई। बाबा को बीमारी की हालत में छोड़ कर वह सुदीप से मिलने भागी आई थी। सोच कर उसके मन में पीड़ा भर गई। दिव्या को लौटा देख कर मां चौंक गईं। लेकिन उन्हें समझा-बुझाकर दिव्या अपने कमरे में चली गई। झूठ बोलना कभी-कभी कितना जरूरी हो जाता है और उसका परिणाम कितना शुभ निकलता है। मां माँ को विश्वास हो चला था कि इस बार दिव्या लंबी छुट्टी ले कर वापस लौटी है। अब शायद वह ब्याह के लिए खुद को तैयार कर लेगी। सुदीप का दिया हुआ शूल इतना दुखदाई था कि उसके दर्द से दिव्या बाहर नहीं निकल पा रही थी। लेकिन तब भी दिन कट रहे थे, बीत रहे थे। इस बीच भव्या दीदी का सात बरस का बेटा केतन नानी के पास रहने आया था। इन दिनों भव्या दीदी की तबीयत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। केतन को मायके छोड़ने आई भव्या ने भी दिव्या से उसके ब्याह के लिये पूछा था। मां-बाबा के लिए तो कुवांरी बेटी की बीतती हुई उम्र दुखदाई थी ही। बाबा ने कहा, “मरने से पहले दिव्या का ब्याह देख लूंगा तो निश्चिंत हो सकूंगा।” दिव्या ने देखा, उनकी मोतियाबिंद से धुंधलाई आंखों से आंसू निकल रहे थे। भीतर से कहीं दिव्या स्वयं को उनका दोषी समझने लगी थी। अंततः सुदीप को भूल कर दिव्या ने अपने ब्याह के लिए हामी भर दी।

केतन को मायके छोड़ कर भव्या अपने पति रितुकांत के साथ अपनी जांच कराने दिल्ली चली गई थी। केतन के साथ दिव्या का खूब मन लगता था। अक्सर वे दोनों भव्या के ब्याह का अल्बम देखने बैठ जाते। केतन दिव्या के साथ अबोध भाव से बातें करता रहता, “तुम्हारी शादी कब होगी मौसी? मैं बढ़िया सा कुरता-पायजामा पहनूंगा, डांस करूंगा।” उसकी बातें दिव्या को कातर कर देतीं। सुदीप उसकी यादों से दूर, बहुत दूर होता जा रहा था। अपनी जाती हुई उम्र का दंश दिव्या को भीतर तक खाली कर जाता। उस दिन दिव्या को बालों में कलर लगाते देख कर मां का चेहरा सफेद पड़ गया, तो दिव्या हंस पड़ी, “आजकल बालों को कलर करना तो फैशन है मां।’’

दिव्या की सांत्वना के बाद भी मां आहत दृष्टि से उसे देखती रही थीं। पता नहीं कैसा संयोग था कि दिव्या के ब्याह की बात कहीं बन ही नहीं पा रही थी। इसी बीच भव्या और रितुकांत वापस लौट आए थे। भव्या बहुत पीली और कमजोर लगी। रितुकांत ने ही बताया कि भव्या को लिवर कैंसर डाइग्नोस हुआ है। बताते हुए उनका स्वर कांप गया था। इसके बाद घर में एक अजीब सी चुप्पी छा गई। सभी के होंठ जैसे सिल गए थे। भव्या और रितुकांत, केतन को लेकर अपने घर जाना चाहते थे, लेकिन मां ने केतन को जाने नहीं दिया। सभी को उम्मीद थी कि भव्या ठीक हो जाएगी, लेकिन एक दिन सब कुछ समाप्त हो गया। भव्या आखिर इस दुनिया से चली ही गई… और इसके ठीक छह महीने बाद ही दिव्या का विवाह अपने विधुर जीजा रितुकांत के साथ हो गया। पहले की तरह रोशनियां, सजावट, शहनाइयां, बैंडबाजा, बारात और लाल जोड़े में सजी दिव्या ब्याह कर रितुकांत के घर आ गई। मां-बाबा पूरी तरह कृतज्ञता से भीग गए थे।

दिव्या को अपने नवजीवन में रितुकांत चिरप्रतीक्षित प्रथम पुरुष के समान ही लगे थे। अपना अतीत भूल कर वह पूरी तरह रितुकांत की ही हो जाना चाह रही थी। भव्या दीदी के अल्बम की सारी तस्वीरें उसकी आंखों में चलचित्र की तरह समाई थीं।

रितुकांत के साथ जब दिव्या हनीमून पर गई तो उसके तन-मन में बसी बरसों की सपनीली, सोई कामनाएं हरहरा कर जैसे जाग गईं। लाल, हरे, पीले चटख रंगों की साड़ियां, सूट पहनते हुए अपने यौवन और सौंदर्य पर खुद ही इतरा उठी थी वो। लेकिन रितुकांत का अपने प्रति उदासीन भाव उसे दुखी कर जाता। वो रितुकांत के साथ पहाड़ों की बारिश में भीगना चाहती, गर्म भुट्टे खाना चाहती, ठंडी आइसक्रीम खाना चाहती, माल रोड पर घूमना चाहती, लेकिन ऐसा कुछ भी हुआ तो बड़ी मुश्किल से। रितुकांत की सारी उदासीनता के बावजूद भी वो उनके साथ ठिठोली करती रही, उन्हें खींच कर घुमाने ले जाती रही। सारी कोशिशों के बाद भी रितुकांत अनमने और विरक्त ही रहे। फिर जब उसके बालों में फूल लगा देने के आग्रह को ठुकरा कर रितुकांत अपने मोबाइल में कुछ-कुछ देखने लगे तो दिव्या सच में उदास हो उठी। रितुकांत कई बार बेवजह दिव्या को उसकी उम्र का ताना भी दे दिया करते थे और वह चाह कर भी बुरा नहीं मान पाती थी।

फिर रात के मोहक एकांत में रितुकांत जब अपनी पुरुष साध को लिए दिव्या के पास आए तो वह एक बार फिर खिलखिला उठी। उसे बांहों में भर कर रितुकांत कह उठे, “बड़ी मुश्किल से छुट्टियां मिली हैं। परसों लौटना भी तो है।’’

“परसों ही क्यों?’’ दिव्या चिहुंक उठी।

“मैंने सोचा, मेरे लिए इन सब में इतना नया क्या है? वो तो तुम्हारे लिए तीन-चार दिनों की छुट्टियां ले ली थीं मैंने।’’

दिव्या के मन में खंजर जैसा कुछ चुभ गया। एक दुख उसके मन को आरपार चीर गया। लेकिन तब भी… तब भी..!

तैंतीस बरस की उम्र में सोलह बरस का मन लिए वो रितुकांत के पुरुष स्पर्श की अनुभव संपन्नता को झेलते हुए, आंखों में आंसू भरे हुए आखिरकार बेड पर सो ही गई।

- आभा श्रीवास्तव

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