प्यार की सजा:भाई के अहम की सजा प्रणव और सत्या को जान देकर चुकानी पड़ी, मां सबकुछ जानकर भी कुछ न कर सकी

23 दिन पहले
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"भैया थोड़ा और स्पाइसी कीजिए न प्लीज।"

सुर्ख होंठ, बड़ी-बड़ी आंखें और टपकती नाक को पोंछती पोनीटेल वाली उस लड़की को देखकर प्रणव को अजीब सी चिढ़ हुई।

"भैया, एक काम कीजिए, दिवाली के पटाखे बचे होंगे न, गोलगप्पों में फोड़ दीजिए। मस्त स्पाइसी हो जाएंगे।" उसकी आवाज पर लड़की ने पलटकर देखा, कुतुब-मीनार सी हाइट वाले इस नकचढ़े से लड़के की आंखों पर दोने का सारा पानी फेंक दे, मन तो यही कर रहा था, पर इतनी ऊंचाई तक हाथ पहुंचता नहीं, तो बस दांत किचकिचाकर रह गई।

"लीजिए भैया, आपका सौ रुपए का पार्सल।" माहौल न बिगड़ जाए इसलिए गोलगप्पे वाले ने चालाकी से सबसे पहले उसका ऑर्डर पार्सल करके चलता किया कि कहीं लड़कियों का ग्रुप बिदक न जाए।

"ले मर। अब ये लड़कियों वाले शौक खुद पूरे करना जाकर। मुझे हद नफरत है गोलगप्पे जैसी वाहियात चीज से और उन बड़ी औरतों से जो सी-सी करती जाएंगी और भैया और तेज और तीखा करती जाएंगी। अगले दिन सुबह पता चलता होगा कि…”

"अरे, बस कर भाई। फीवर न आ रहा होता तो चला ही जाता न। अब क्या बताऊं क्रेविंग ही ऐसी हो रही थी। नहीं तो कभी फोन नहीं करता। अब मैंने अभी यहां के रास्ते भी तो नहीं देखे। खो जाऊं कभी तो..." यह पुनीत था, प्रणव का छोटा भाई, जिसकी कोई बात कभी प्रणव टाल दे, ऐसा तो हुआ ही नहीं अब तक।

"अजी हां, छोटा बालक है न तू, खो जाएगा बे। जीपीएस के जमाने में पैदा हुए हो तुम लोग और यह घर शहर के बीच है, किसी जंगल में नहीं।"

पुनीत का एडमिशन मेडिकल कॉलेज में हो गया था। रैगिंग से बचने के लिए हॉस्टल की बजाय पुश्तैनी घर में रहना प्रिफर किया गया, जो बहुत समय से खाली पड़ा था। कुछ साल पहले किरायेदार रहते थे।

"बेरी बुला रही है, सीटी बजा रही है…” सत्या बेर के पेड़ को ललचाई नजरों से देखकर गा रही थी।

"कोई कुछ नहीं बुला रहा। चुप करके अंदर चल।" यह प्रिया भाभी थीं। पर सत्या कहां मानने वाली थी। भाभी कुछ कहतीं या करतीं, इससे पहले ही वह बेर तोड़ने पड़ोस की बाउंड्री पर चढ़ चुकी थी।

"चोर… चोर… पकड़ो चोर…”

अचानक हुई इस चीख-चिल्लाहट से सत्या का पैर स्लिप हुआ और वह धड़ाम से पड़ोस के अहाते में आ गिरी। किस्मत से चारपाई पर गद्दा कम्बल बिछा था, जिससे उसे चोट नहीं आई। बिन मुड़कर देखे वह दरवाज़े से सरपट भाग गई।

"कांटा लगा, हाय लगा, बंगले के पीछे तेरी बेरी के नीचे..." अब भाभी उसके मजे ले रही थीं।

"आप भी न भाभी। वह भूतिया घर कब से खाली पड़ा था। मुझे क्या पता था कोई इडियट वहां मौजूद है। मुझे चोर बोल रहा था।" सत्या इस वक्त बिल्कुल मजाक के मूड में नहीं थी।

"इंट्रेस्टिंग।"

"भाभी प्लीज...."

"ओके-ओके। वह तो शुक्र मना चोट नहीं लगी, नहीं तो वन-पीस में वापिस नहीं आती।"

तभी कॉलबेल सुनकर दोनों चौंक गईं।

"क्या मुसीबत है भाई, चलकर ही आएगा इंसान उड़कर तो आ नहीं जाएगा।" सत्या ने गेट खोला तो एकदम से ज़ुबान पर ब्रेक लग गए।

"ओह! आप हैं मिस गोलगप्पा।" बेल बजाने वाले ने कहा।

"ओह! आप यहां कैसे मिस्टर दीवाली के पटाखे।"

"आप अपनी सैंडिल और दुपट्टा हमारे यहां छोड़ गई थीं मिस बेर-चोर।" प्रणव ने दोनों चीजें पकड़ाते हुए कहा और बिन उसकी आंखों की शर्मिंदगी देखे फुर्ती से रवाना हो गया।

"बस करवा लाईं बेइज्जती। अरे बीस रुपट्टी के खरीदकर खा लेती इतना ही मर रही थी तो।" सत्या को अब सच में खुद गुस्सा आ रहा था अब।

"कोई बात नहीं। लगे-लगे सड़ रहे थे, सोचा काम ही आ जाएंगे, वेस्ट हो रहे। इसमें कुछ गलत नहीं था।"

भाभी ने उसे समझाया। "लेकिन अब होशियार रहना, भैया को बिल्कुल भनक नहीं पड़ना चाहिए। तुझे तो पता ही है न…” प्रिया बोलते-बोलते रुक गई।

"सत्तो, पापा का साया सिर से उठने के बाद यह मत समझना कि तुम अनाथ हो, आज से तुम्हारा ये बड़ा भाई पिता की जगह है, तुम्हारी रक्षा करेगा हर दम।"

सत्या के सिर पर हाथ फेरते हुए सक्षम ने नर्मी से कहा।

पिता के जाने के गम में डूबी सत्या तब कहां जान पाई थी कि उसकी नहीं, तथाकथित सामाजिक प्रतिष्ठा और रूढ़ियों की रक्षा करने को संकल्पबद्ध था उसका भाई।

"सत्तो, ये कैसे कपड़े पहने हैं तुमने, पापा ने बहुत शै दे रखी थी तुम्हें, छोटी बच्ची समझते थे बिल्कुल। ढंग का सूट डालो फिर जाना बाहर।"

"क्या करोगी इतना कठिन सब्जेक्ट लेकर? कौनसा वैज्ञानिक बनना है तुम्हें? चश्मा चढ़ गया तो लड़का कैसे मिलेगा, जो सब्जेक्ट गर्ल्स कॉलेज में हैं, उन्हीं में से चुनो। को-एड में हमारे ख़ानदान की लड़कियां नहीं पढ़ा करतीं।"

"कोई कॉलेज-वॉलेज ट्रिप नहीं, पढ़ने भेजा है पढ़ाई करो। मजबूरी है कि बिन ग्रेजुएशन ढंग का रिश्ता नहीं मिलता, सबको पढ़ी लिखी बहू चाहिये आजकल। छूट मिली है तो बेजा फ़ायदा मत उठाओ।"

"मोबाइल फोन की क्या ज़रूरत? घर में फोन है, कॉलेज के ऑफिस में भी, कॉलेज बस से आना जाना है, जरूरत क्या है?"

रोज़ की टोका-टाकी और हज़ार बंधनों के बावजूद सत्या को इसी बात का सन्तोष था कि कम से कम पढ़ने को तो मिल रहा है।

लेकिन प्रेम कब चुपके से मन की दहलीज़ पर कदम रख लेता है, किसको पता।

अगले दिन घर में कदम रखते ही बेरों की तेज़ महक सत्या की नाक में घुसी। सामने पुनीत बैठा था, जिससे मां हंस-हंसकर बातें कर रही थीं। उसे देखकर दोनों चुप हो गए।

"आई एम सॉरी दीदी। कल मैं अकेला था तो थोड़ा पैनिक हो गया था आपको देखकर। ये लीजिये ताजे तोड़कर लाया हूं।" पुनीत ने बेर का बोल आगे किया।

सत्या का मन तो हुआ कि उठाकर बाहर फेंक दे पुनीत को बेर सहित, पर वह ख़ामोश रही। फिर कुछ देर बाद बोली, "सॉरी मुझे कहना चाहिये। ऑफ्टर ऑल आप लोगों का घर है। दरअसल दो साल से कोई दिखा नहीं और बेर वेस्ट हो जाते थे ऐसे ही तो..."

"इट्स ओके। आपका जब भी मन करे, यू आर मोस्ट वेलकम।" मुस्कुराते हुए पुनीत ने बाहर का रुख किया।

"क्या ज़रूरत थी मां ये लेने की। सक्षम को पता लगा तो..?" प्रिया भाभी की आवाज में चिंता थी।

"उसको बताएगा कौन। जल्दी से खाकर खत्म कर दो।" मां ने कहा।

"पर मां ये लोग छोटी जात के हैं और आपको पता है न सक्षम इन सबमें कितना मानते हैं।"

"अरे भगवान राम ने तो शबरी के जूठे बेर खा लिए थे। और यह बेचारा ताजे तोड़कर लाया है इतने प्रेम से।" मां की आवाज में वात्सल्य भाव था।

आगे बहस करना बेकार था। सत्या बेर लेकर छत पर चली गई। वह मगन होकर खा ही रही थी कि टक से एक पत्थर आकर उसके कंधे पर लगा। चोट तो ज़्यादा नहीं लगी लेकिन अचानक से चौंक जाने से वह बैलेंस नहीं बनाए रह सकी और लड़खड़ाकर गिर गई।

"आई एम सॉरी। सो सो सो सॉरी, मैं बंदर भगा रहा था ग़लती से आपको लग गया। प्लीज माफ कर दीजियेगा।" सामने बेहद शर्मिंदा प्रणव खड़ा था।

ऐसे गिर जाने की शर्म, शर्मिंदगी और ग़ुस्से के मारे सत्या की आंखों में आंसू आ गए। शोले बरपाती निगाहों से उसे घूरकर वह नीचे चली गई।

"भैया....."

"भैया, थोड़ा एक्स्ट्रा तीखा कर दीजिये मैडम को।" प्रणव सत्या की बात काटते हुए बोला। वह गुस्से से घूरकर रह गई।

तीन दिन बाद दुबारा वे लोग उसी जगह थे।

"आप मेरा पीछा कर रहे हैं?"

"जी नहीं, बस आपके कंधे की तबीयत पूछने आया था। और आपके घुटने की तबीयत भी पूछना थी। चोट तो नहीं लगी न ज्यादा।"

प्रणव की बात पर वह एकदम तप गई। दुबारा वह शर्मिंदगी भरा दृश्य याद हो आया। गुस्से से लम्बे-लम्बे डग भरती हुई वह बहुत आगे निकल गई। प्रणव लगभग दौड़ते हुए उसके पीछे आया।

"आई एम सो सॉरी मिस। आपको ऑफेंड नहीं करना चाहता था। मैं कल वापस जा रहा हूँ अपने घर। बस आप ग़ुस्सा रहेंगी तो सुकून से नहीं जा पाऊंगा। आप बताएं कैसे शांत होगा ग़ुस्सा आपका।" प्रणव एक सांस में बोल गया।

सत्या चलते-चलते रुक गई। वह बहुत कुछ पूछना चाहती थी लेकिन बस खामोश रह गई। कुछ देर बाद इतना ही कहा, "मैं नाराज नहीं हूं। इट्स ओके। पर आप सुकून से जाएं, यह नहीं चाहती।"

फिर वह बिन पलटे, सीधी चलती चली गई और उसकी नज़र से ओझल हो गई। प्रणव उसकी बात का मतलब समझता रह गया।

हालांकि मतलब उसे अपने घर पहुँचकर समझ आया। पूरे रास्ते वह सत्या के ख़यालों में खोया था और जैसे-जैसे स्टेशन नज़दीक आता जा रहा था, उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसे फिर से देखने की तमन्ना इतना जोर पकड़ चुकी थी कि उसका सोना-जागना, खाना-पीना सब मुहाल हो चुका था।

सत्या को समझ नहीं आ रहा था चार दिन को आया हुआ वह लड़का, जिससे कुछ ही बातें हुई हैं, क्यों उसके हवासों पर सवार हो चुका है। वह छत पर अपने ख़यालों में खोई हुई थी कि एक पतंग टक से उसके सिर को छूती निकल गई।

"हैलो। आपके सिर की तबीयत कैसी है? पतंग से चोट तो नहीं लगी? आख़िरकार पुनीत की खैर-खबर लेने के बहाने अगले ही हफ़्ते प्रणव फिर हाजिर था।

इस बार उसे देखते ही सत्या की आंखें खुशी से चमक उठीं, जिन्हें छिपाने की उसने कोशिश भी नहीं की।

अब तो वे पूरे टाइम एक-दूसरे को देखने के लिए बेचैन रहते थे। एक झलक देखने का कोई मौक़ा नहीं गंवाते थे। अकेले कहीं मिलने की हिम्मत तो थी नहीं, लेकिन कभी छत पर कपड़े सुखाने तो कभी गोलगप्पे खाने के बहाने वे मिलते रहे। जॉब की वजह से प्रणव बार-बार छुट्टी नहीं ले सकता था, तो उसने अब कोई ठोस कदम उठाने की ठानी। उसने अपनी माँ से बात करके उनको सत्या के घर रिश्ता ले जाने के लिए मना लिया। असल समस्या सत्या के भाई के मानने की थी। और वही हुआ जिसका उन दोनों को डर था।

"देख लिया अम्मा लड़की की ज़ात को थोड़ी सी आज़ादी और छूट देने का नतीजा? हमारी इज़्ज़त मिट्टी में मिलाने पर तुल गई है। उन छोटी जात वालों की आज इतनी हिम्मत बढ़ गई कि हमसे सम्बन्ध जोड़ने के सपने देखने लगे।" सक्षम क्रोध में फुँफकार रहा था।

"भैया, उनकी मांजी इतने मान से हाथ मांगने आई थीं। इसमें क्या ग़लत है। इज़्ज़त मिट्टी में मिलाने जैसा किया क्या है मैंने।" कभी भैया से नज़र मिलाकर बात न करने वाली सत्या में आज अपने प्रेम के लिए डटकर खड़े होने की हिम्मत आ गई थी।

अब तो सक्षम पागल हाथी की तरह बेक़ाबू हो गया। आव देखा न ताव, सत्या के चेहरे पर थप्पड़ों की बरसात कर दी। सुमित्रा देवी तो काँप गयीं सक्षम का रौद्र रूप देखकर। पति के जाने के बाद बेटे के भरोसे रहने की वजह से वैसे ही निर्बल हो गयीं थीं। लेकिन बेटी की हालत देखी नहीं गई तो जैसे-तैसे छुड़ाकर कमरे में ले गईं। दरवाज़ा बन्द किया और बेटी के मुँह से निकलता ख़ून साफ किया। सत्या रोते हुए उनसे लिपट गई।

"अम्मा मैंने कुछ गलत नहीं किया। बस आप एक बार प्रणव से मिल लो। फिर जो आप कहोगी, वही करूंगी।"

सुमित्रा देवी को अपनी परवरिश पर भरोसा था। सत्या कोई भी ग़लत कदम नहीं उठा सकती थी।

सत्या को मौसी से मिलाने ले जाने के बहाने वे घर से निकल तो गई थीं, लेकिन मन में धड़का लगा हुआ था।

जैसे-तैसे वे एक कोचिंग सेंटर के आगे आकर रुकीं। सत्या माँ का हाथ पकड़े जल्दी से अंदर दाख़िल हो गई।

"मुआफ़ कीजिये माँ जी, किसी रेस्त्रां या पब्लिक प्लेस पर कोई देख लेता, तो आप पर आफ़त आ जाती। मैं प्रणव हूँ। एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर हूँ। मैं जिस जाति में जन्मा, वह मैंने नहीं चुनी। लेकिन अपना कर्म ज़रूर चुना। मैं अपना देश नहीं छोड़ना चाहता था, लेकिन आप आशीर्वाद दें, तो हम शादी करके विदेश में सेटल हो सकते हैं। अगर सक्षम भैया सत्या के लिए कोई अच्छा लड़का ढूंढ देते, तो भी मुझे तसल्ली होती लेकिन जिन लगभग अनपढ़, छोटे-मोटे जॉब करने वाले लड़के वे देख रहे हैं, लगता है बस जाति ही सर्वोपरि है, कम दहेज में पीछा छूट जाए जल्दी, बस यही चाहते हैं। अब आपको तय करना है, सत्या के लिए क्या भला है। मेरे बारे में जो चाहे छान-बीन करा सकती हैं।"

प्रणव तो पहली ही नज़र में सुमित्रा देवी को भा गया था। सुंदर, सुशील, संस्कारी और सत्या को इतना चाहने वाला। उसे ढेरों आशीर्वाद देकर संतुष्ट मन से वे घर रवाना हुईं।

एक बार हिम्मत करके बेटे से बात करने की ठानी।

"सक्षम बेटा, वह लड़का बहुत नेक है,अच्छी जॉब पर है, पढ़े-लिखे सम्पन्न परिवार से है। उन दसवीं, बारहवीं फ़ेल रिश्तों से कई गुना बेहतर है, जो तुम देख रहे हो आजकल।"

"तुम न बिल्कुल सठिया गयी हो अम्मा। पैसे देखें या जात-बिरादरी, कितना ही सम्पन्न हो जाए, रहेगा तो हमसे छोटी जात का ही। लोग क्या कहेंगे, बाप नहीं रहा तो बहन को किसी के भी पल्ले बांध दिया. फिर मेरी सताक्षी भी तो है, अभी देखते-देखते बड़ी हो जाएगी, इसकी शादी में भी दिक्कतें आएंगी बुआ के लच्छन देखकर।"

उन्होंने फिर भी बेटी के लिये धीमा सा प्रतिरोध दिखाया लेकिन जब सुमित्रा देवी ने देखा कि बेटा किसी सूरत तैयार नहीं होगा, जैसे तैसे बहन को खपा देने की तैयारी में है कहीं भी, तो उनके अंदर की ममता जाग गई। जाने कैसे इतनी हिम्मत आ गई कि प्रणव से मिलकर कोर्ट मैरिज की तैयारी का कह आईं। प्रिया अपने पति के विरुद्ध नहीं जाएगी, वे जानती थीं इसलिये किसी से कुछ नहीं कहा।अपने गहने और पति की पेंशन से जोड़ी रकम सत्या को देकर उसे प्रणव के पास ले गईं।

सत्या और प्रणव को अपनी क़िस्मत पर यक़ीन नहीं आ रहा था। आख़िर को उनकी तपस्या सफल हुई थी।

सक्षम अपमान का घूँट पीकर रह गया था। सत्या अब क़ानूनन प्रणव की पत्नी थी।

आज उनकी सिंगापुर की फ्लाइट थी। सुमित्रा देवी आशीर्वाद देने एयरपोर्ट जाने की तैयारी कर रही थीं।

"कहां जा रही हैं मां?" सक्षम ने पूछा।

"बस एक काम था। अभी आती हूं।"

"सत्या से मिलने जा रही हैं? मुझे भी ले चलिये। दामाद जी से और उससे माफी भी मांगना है। पता नहीं फिर कब मुलाक़ात हो।" सक्षम उदास हो गया था।

मां का दिल पिघल गया। अब वे ख़ुश थीं। सक्षम की गाड़ी में बैठकर वे रवाना हो गईं।

दोनों एयरपोर्ट पर इंतज़ार कर रहे थे। प्रणव का फोन लग नहीं रहा था, न प्रणव का। तभी सक्षम के फोन पर पुलिस स्टेशन से कॉल आया। उसकी बहन और जीजा की गाड़ी को रास्ते में एक ट्रक कुचलता हुआ निकल गया था। हिट एंड रन का केस बना। दोनों मौक़े पर ही ख़त्म हो गए थे। ड्राइवर ट्रक सहित फ़रार था। रोज़ इतने तो रोड एक्सीडेंट होते हैं, एक और सही।

बरसों सिसकियां, आहें भरती रहीं वे। दस साल बीत चुके थे।

"सत्तो ये कैसे कपड़े पहने हैं तुमने, अब बच्ची नहीं रहीं तुम।" सुमित्रा देवी ने पोती की माइक्रो स्कर्ट देखते हुए कहा।

"ओफ्फोह दादी, तुम मेरी हर बात में टांग अड़ाने क्यों आ जाती हो, पूजाघर या अपने कमरे में क्यों नहीं पड़ी रहतीं?" सताक्षी तुनककर बोली।

"देखा बेटा, यह संस्कार हैं तुम्हारी बिटिया के, बड़ो से बात करने की तमीज़ नहीं है बिल्कुल।" उन्होंने बेटे से कहा।

"अम्मा क्यों खामखाह बच्ची के पीछे पड़ी रहती हो, छोटी है अभी और सत्तो सत्तो कहना बन्द करो, सताक्षी है वह।" सक्षम ने हमेशा की तरह बेटी का पक्ष लिया और माँ को झिड़क दिया।

"ले बेटा, तेरे लिये लेटेस्ट मॉडल का फोन, और लैपटॉप। अपने रिसर्च पेपर्स आराम से तैयार कर और जिन जगहों की ट्रिप प्लान करना है, मुझे बता देना, एडवांस बुकिंग हो जाएगी, फ्रेंड्स को और तुम्हें दिक़्क़त नहीं होगी कुछ।" दुनिया भर का लाड़ लहजे में समाते हुए सक्षम ने सताक्षी के सिर पर हाथ फेरा।

"ओह पापा, यू आर द बेस्ट, लव यू...." वह पापा के गले लग गई फिर एक कंटीली नज़र दादी पर डालकर स्कूटी की चाबी उठाए सताक्षी फुर्र हो गयी।

और सुमित्रा देवी अपने पति की फोटो के सामने जा बैठीं।

"आपकी पोती बहुत होशियार है, पढ़-लिखकर बहुत आगे जायेगी। मुझे खुशी है इस बात की। सन्तान होती ही वह शै है, जो पत्थर को पानी कर दे। औलाद की खुशी की ख़ातिर ही माता-पिता सब-कुछ करते हैं। बस यही दुःख मेरे साथ जायेगा कि अगर आप कुछ समय और हमारे साथ होते तो आज मेरी सत्या भी कम से कम ज़िंदा तो होती। बाप की जगह कोई नहीं ले सकता। दुनिया की आँखों में धूल झोंकी जा सकती है, लेकिन मुझे तो पता है न, वह एक्सीडेंट नहीं हत्याएं थीं, बस अपनी नाक ऊंची रखने के लिए। बस भगवान बाप के कर्मों की सज़ा सताक्षी को न दे।"

सुमित्रा देवी ने सताक्षी को ख़ूब आशीष दिए और आंसुओं से भीगी अंतिम हिचकी ली। वे अब अपनी सत्या से मिलने और इंतज़ार नहीं कर सकती थीं।

- नाज़िया खान

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